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सचेतन- 28: तैत्तिरीय उपनिषद् आनन्दमिमांसा का रहस्य-2

उपनिषद् का रहस्य सरल उपमा में कल्पना करो — लेकिन चाहे दीपक कितने भी बढ़ जाएँ, वे सूर्य के प्रकाश के सामने तुच्छ हैं।दीपक = सीमित सुख।सूर्य = ब्रह्मानन्द (अनंत सुख)। भौतिक और दैवी सुख — इंद्रिय और मन पर आधारित, सीमित और नश्वर।ब्रह्मानन्द — आत्मा और ब्रह्म की एकता से उत्पन्न, असीम और शाश्वत। […]

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सचेतन- 27: तैत्तिरीय उपनिषद् आनन्दमिमांसा का रहस्य

तैत्तिरीयोपनिषद् का लक्ष्य यह दिखाना है कि — मनुष्य जिसे “सुख” समझता है (धन, शरीर, पद, कला, सौंदर्य, शक्ति आदि), वह सब सीमित और क्षणभंगुर है। अगर उस सुख को धीरे-धीरे 100–100 गुना बढ़ाते चलें, तब भी उसका एक अंत है।लेकिन आत्मा का आनंद (ब्रह्मानन्द) — उसके परे है, और अनंत है।भौतिक और दैवी सुख […]

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सचेतन- 26:तैत्तिरीय उपनिषद् आनन्द की सीढ़ियाँ (आनन्दमिमांसा)

‘मीमांसा’ शब्द का अर्थ है गंभीर मनन, विचार-विमर्श, या किसी विषय के मूल तत्त्वों का गहन ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला विवेचन। मीमांसा दर्शन का मुख्य उद्देश्य धर्म के सार को समझना और मानव कर्तव्य को स्पष्ट करना है। 1. मानव-सुख (Manuṣyānanda) कल्पना करो कि एक 25 वर्ष का युवा है — […]