सुगमता
उपनिषद् · कड़ी 10 / 28

सचेतन- 21:तैत्तिरीय उपनिषद्: ब्रह्मांड की रचना

25 सितम्बर 2025 · उपनिषद्

पुरुष के त्याग (बलिदान) से ही सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, वायु और दिशाएँ उत्पन्न हुईं। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद भी उसी पुरुष से प्रकट हुए।
अर्थात: हर कोश को ऐसे समझो, जैसे वह एक जीवित व्यक्ति हो, जिसके अंग-प्रत्यंग हों।

**🌱 तैत्तिरीयोपनिषद् में प्रयोग   **

  • अन्नमय कोश (शरीर)

  • इसे “अन्नपुरुष” कहा गया।

  • सिर, हाथ, पैर, हृदय आदि का रूप देकर दिखाया गया कि शरीर भोजन से बना है।

  • प्राणमय कोश (जीवन-शक्ति)

  • इसे “प्राणपुरुष” कहा गया।

  • इसमें प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान – पाँच प्राण को अंग माना गया।

  • मनोमय कोश (मन)

  • इसे “मनःपुरुष” कहा गया।

  • यहाँ विचार, भावना, संकल्प और इंद्रियों को अंग माना गया।

  • विज्ञानमय कोश (विवेक-बुद्धि)

  • इसे “विज्ञानपुरुष” कहा गया।

  • इसमें श्रद्धा (आस्था), सत्य, धर्म और कर्तृत्व को अंग माना गया।

  • आनन्दमय कोश (परमानन्द)

  • इसे “आनन्दपुरुष” कहा गया।

  • इसमें आनन्द, प्रेम, करुणा और शांति को अंग माना गया।

मान लीजिए कोई बच्चा पूछे — “बुद्धि क्या होती है?”
यदि हम कहें “निर्णय करने की शक्ति”, तो वह अमूर्त लगेगा।
लेकिन यदि हम इसे “एक राजा” के रूपक में समझाएँ —
जैसे राजा अपनी प्रजा को नियंत्रित करता है, वैसे ही बुद्धि हमारे मन, प्राण और शरीर को नियंत्रित करती है — तो बच्चा तुरंत समझ जाएगा।

यही है पुरुष-रूपक – दार्शनिक सत्यों को “व्यक्ति-आकृति” का रूप देकर समझाना।

पुरुष-रूपक उपनिषद् की एक शैली है जिसमें प्रत्येक कोश को पुरुष (मानव-आकृति) मानकर उसके सिर, अंग और हृदय बताए जाते हैं, ताकि अमूर्त सत्य को मूर्त और समझने योग्य रूप दिया जा सके।

जैसे पहले कहा गया –

  • अन्नमय कोश (शरीर) = एक आवरण है।

  • प्राणमय कोश = शरीर में प्राण का आवरण।

  • मनोमय कोश = विचार और भावना का आवरण।