सुगमता
श्री शिव पुराण · कड़ी 142 / 243

सचेतन 159 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- जलदान, जलाशय-निर्माण और वृक्षारोपण की महिमा

जलदान **आनन्द की प्राप्ति के लिए करना चाहिए और वृक्ष लगाने वाले को पुत्र प्राप्ति का सुख मिलता है **

सनत्कुमार जी कहते हैं-व्यास जी! जलदान सबसे श्रेष्ठ है। वह सब दानों में सदा उत्तम है; क्योंकि जल सभी जीव समुदाय को तृप्त करने वाला जीवन कहा गया है।इसलिये बड़े स्नेह के साथ अनिवार्य रूप से प्रपादान (पौंसला चलाकर दूसरों को पानी पिलाने का प्रबन्ध) करना चाहिये। 

जलाशय का निर्माण इस लोक और परलोक में भी महान् आनन्द की प्राप्ति कराने वाला होता है- यह सत्य है, और यथा सत्य है। इसमें संशय नहीं है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह कुआँ, बावड़ी और तालाब बनवाये। कुएँ में जब पानी निकल आता है, तब वह पापी पुरुष के पापकर्म का आधा भाग हर लेता है तथा सत्कर्म में लगे हुए मनुष्य के सदा समस्त पापों को हर लेता है।

जिसके खुदवाये हुए जलाशय में गौ, ब्राह्मण तथा साधुपुरुष सदा पानी पीते हैं, वह अपने सारे वंश का उद्धार कर देता है। जिसके जलाशय में गर्मी के मौसम में भी अनिवार्यरूप से पानी टिका रहता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकट को नहीं प्राप्त होता। 

जिसके पोखर में केवल वर्षा-ऋतु में जल ठहरता है, उसे प्रतिदिन अग्निहोत्र करने का फल मिलता है-ऐसा ब्रह्माजी का कथन है।अग्निहोत्र का अर्थ है कि, ऐसा होम (आहुति) जिसे प्रतिदिन किया जा सकता है तथा उसकी अग्नि को बुझने नहीं दिया जाता है।

जिसके तड़ाग में शरत्काल तक जल ठहरता है, उसे सहस्त्र गोदान का फल मिलता है- इसमें संशय नहीं है। जिसके तालाब में हेमन्त और शिशिर-ऋतु तक पानी मौजूद रहता है, वह बहुत-सी सुवर्ण- मुद्रा की दक्षिणा से युक्त यज्ञ का फल पाता है। जिसके सरोवर में वसन्त और ग्रीष्मकाल तक पानी बना रहता है, उसे अतिरात्र और अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है-ऐसा मनीषी महात्माओं का कथन है।

अतिरात्र एक सम्पूर्ण रात्रि तक चलने वाला अनुष्ठान है जिसको एकाह सोम यज्ञ के नाम से जानते हैं।

प्राचीनकाल में कोई भी राजा चक्रवर्ती राजा यानी संपूर्ण धरती का भारतखंड का राजा बनने के लिए अश्‍वमेध यज्ञ करता था जिसमें देवयज्ञ करने के बाद अश्‍व की पूजा करके अश्‍व के मस्तक पर जयपत्र बांधकर उसके पीछे सेना को छोड़कर उसे भूमंडल पर छोड़ दिया जाता था।

मुनिवर व्यास! जीवोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले जलाशयके उत्तम फलका वर्णन किया गया। 

अब वृक्ष लगानेमें जो गुण हैं, उनका वर्णन सुनो। जो वीरान एवं दुर्गम स्थानों में वृक्ष लगाता है, वह अपनी बीती तथा आनेवाली सम्पूर्ण पीढ़ियोंको तार देता है। इसलिये वृक्ष अवश्य लगाना चाहिये। ये वृक्ष लगाने वाले के पुत्र होते हैं, इसमें संशय नहीं है। वृक्ष लगाने वाला पुरुष परलोक में जाने पर अक्षय लोकों को पाता है। 

पोखरा खुदानेवाला, वृक्ष लगानेवाला और यज्ञ कराने वाला जो द्विज है, वह तथा दूसरे-दूसरे सत्यवादी पुरुष-ये स्वर्गसे कभी नीचे नहीं गिरते।