सचेतन- 37 –आत्मबोध – “निरंतर अभ्यास ही अज्ञान की बीमारी की औषधि है”
क्या आपने कभी महसूस किया है कि
आप सही बात समझते हैं…
फिर भी वही पुरानी बेचैनी,
वही प्रतिक्रिया,
वही डर लौट आता है?
हम कहते हैं—
“मैं आत्मा हूँ”
* “मैं ब्रह्म हूँ”*
लेकिन ज़रा-सी परिस्थिति बदलते ही
हम फिर वही पुराने “मैं” बन जाते हैं।
आत्मबोध में आज का विचार
यही प्रश्न उठाता है—
समझ आ जाने के बाद भी
मन अशांत क्यों रहता है?
और साथ ही
इसका बहुत व्यावहारिक उत्तर भी देता है।
शंकराचार्य कहते हैं—
निरंतर अभ्यास से बनी
“मैं ब्रह्म हूँ” की भावना
अज्ञान और उससे पैदा हुई
मन की अशांति को
वैसे ही नष्ट कर देती है
जैसे औषधि रोग को।
आज का यह विचार बहुत सीधा है,
और उतना ही गहरा।
समस्या कहाँ है?
अधिकतर साधकों की समस्या यह नहीं है कि
उन्हें वेदांत समझ में नहीं आया।
समस्या यह है कि—
-
ज्ञान है, पर स्थिर नहीं
-
समझ है, पर आदतें पुरानी हैं
-
सत्य पता है, पर प्रतिक्रिया स्वतः हो जाती है
इसी को शंकराचार्य कहते हैं—
👉 अविद्या-विक्षेप**
** यानि अज्ञान से पैदा हुई
पुरानी मानसिक आदतें।
ज्ञान से अज्ञान तो चला गया,
लेकिन उसकी गूँज अभी बाकी है।
निरंतर अभ्यास क्यों ज़रूरी है?
विचार में एक बहुत महत्वपूर्ण शब्द है—
निरंतर
मतलब—
कभी-कभी नहीं,
केवल ध्यान में नहीं,
सिर्फ़ शांति के समय नहीं—
👉 हर परिस्थिति में।
ख़ासकर गृहस्थ जीवन में।
संन्यासी के लिए
अहंकार को टक्कर देने वाली स्थितियाँ कम होती हैं।
लेकिन गृहस्थ—
-
बच्चे के सामने माता-पिता बनता है
-
दफ़्तर में अधिकारी
-
घर में पति या पत्नी
-
समाज में कोई पहचान
हर जगह
“मैं” बार-बार बदलता है।
इसलिए गृहस्थ के लिए
निदिध्यासन सबसे अधिक आवश्यक है।
“ब्रह्मैव अस्मि” को कैसे जिएँ?
“मैं ब्रह्म हूँ”
को केवल वाक्य की तरह दोहराना पर्याप्त नहीं।
इसे परिस्थिति के अनुसार जीना है।
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अगर क्रोध आ रहा है →
“मैं शान्त हूँ”*
* -
अगर डर है →
“मैं सुरक्षित हूँ”*
* -
अगर कमी महसूस हो रही है →
“मैं पूर्ण हूँ”*
* -
अगर अपेक्षा टूट रही है →
“मैं तृप्त हूँ”
यही है
निदिध्यासन।
औषधि का उदाहरण
शंकराचार्य एक सुंदर उदाहरण देते हैं—
रसायनम् इव**
** यानि औषधि की तरह।
जब बीमारी होती है—
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दवा तुरंत असर नहीं करती
-
बीमारी उतरती है धीरे-धीरे
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बीच में सावधानी ज़रूरी होती है
ठीक वैसे ही—
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वेदांत ज्ञान = सही दवा
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निदिध्यासन = नियमित सेवन
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पुरानी आदतें = ठीक होने का समय
दवा लेने के बाद भी
लापरवाही करेंगे
तो रोग लौट सकता है।
इसीलिए कहा गया—
👉 निरंतर अभ्यास।
स्वीकार ही समाधान है
जब हम दूसरों को बदल नहीं सकते—
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बच्चों को
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जीवनसाथी को
-
समाज को
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परिस्थितियों को
तब समाधान है—
👉 स्वीकार।
स्वीकार का अर्थ हार मानना नहीं,
बल्कि भीतर से कहना—
“मैं जैसा हूँ, पूर्ण हूँ।”
* “दूसरे जैसे हैं, उन्हें स्वीकार करता हूँ।”*
यही है
अहं ब्रह्मैव अस्मि की वास्तविक साधना।
आत्मबोध के आज का विचार
हमें यह स्पष्ट करता है—
-
ज्ञान एक बार मिलता है
-
स्थिरता अभ्यास से आती है
-
शांति आदत बनने से आती है
“मैं ब्रह्म हूँ”
** को सोच नहीं,
स्वभाव** बनाना है।
जैसे औषधि
धीरे-धीरे रोग हरती है,
वैसे ही—
👉 निरंतर आत्म-स्मरण
मन की बीमारी को हर लेता है।यही है
सचेतन जीवन। 🙏