सुगमता
53विवेकचूड़ामणि · कड़ी 56 / 85

सचेतन — 53 "आग और लोहा — छूकर भी अछूती"

27 जुलाई 2026 · विवेकचूड़ामणि

नमस्कार।
पिछली कड़ी में हमने चोलों की बात की।
चोले बदलते हैं — पहनने वाला नहीं। बर्तन टूटते हैं — मिट्टी नहीं।
लेकिन एक सवाल फिर भी मन में रह जाता है —
"ठीक है, आत्मा अलग है। पर वह तो शरीर-मन के भीतर ही बैठी है न?"
"इतने पास रहकर... वह मैली कैसे नहीं होती? उस पर असर कैसे नहीं पड़ता?"
बहुत अच्छा सवाल।
और आज शास्त्र इसका जवाब देता है — एक ऐसे उदाहरण से,
जो लोहार की भट्ठी से निकलकर सीधे हृदय में उतरता है।
लोहार की भट्ठी चलिए
गाँव के लोहार की भट्ठी।
लोहार ने लोहे का एक टुकड़ा आग में डाला।
थोड़ी देर में लोहा लाल हो गया। दहकता हुआ। जैसे खुद आग बन गया हो।
अब लोहार ने उसे निहाई पर रखा। और हथौड़ा चलाया।
ठक! ठक! ठक!
लोहा मुड़ रहा है। पिट रहा है। लंबा हो रहा है। कभी दराँती बन रहा है, कभी कुदाल।
और हर चोट पर चिंगारियाँ उड़ रही हैं।
अब मेरा सवाल सुनिए। ध्यान से।
हथौड़ा किस पर पड़ रहा है?
लोहे पर।
और आग पर?
ज़रा रुकिए... सोचिए...
आग तो लोहे के कण-कण में है। लोहा उसी से तो लाल है।
पर क्या हथौड़े की चोट आग को लगती है?
नहीं।
लोहा मुड़ता है — आग नहीं मुड़ती। लोहा पिटता है — आग नहीं पिटती। लोहा दराँती बनता है — आग दराँती नहीं बनती।
आग लोहे के भीतर रहकर भी —
छूकर भी अछूती।
अब श्लोक का अर्थ खुलता है
शास्त्र कहता है —
आत्मा — वह आग है।
शरीर, मन, बुद्धि — वह लोहा हैं।
आत्मा की चेतना से ही तो शरीर "जीवित" दिखता है, मन "जानता" दिखता है —
जैसे आग से ही लोहा "दहकता" दिखता है।
इतने पास हैं दोनों — कि अलग करना मुश्किल लगता है।
देखने वाला कहता है — "लोहा जल रहा है!"
पर सच यह है — जलना आग का है, आकार लोहे का।
वैसे ही —
जीवन में चोटें पड़ती हैं। हथौड़े चलते हैं।
बीमारी की चोट — शरीर पर पड़ती है। अपमान की चोट — मन पर पड़ती है। भूल का पछतावा — बुद्धि पर पड़ता है।
और आत्मा?
वह इन सबके भीतर रहकर भी — अछूती। ज्यों की त्यों। सदा एकरूप।
लोहा दराँती बने या कुदाल — आग वही।
शरीर बच्चा हो या बूढ़ा, मन खुश हो या दुखी — चेतना वही।
गीता माँ की एक और बात
याद हैं गीता माँ? सत्तर पार की, घुटनों के दर्द वाली?
एक दिन उनकी पड़ोसन ने पूछा —
"माँ जी, इतना दर्द, इतनी तकलीफ़... फिर भी आपके चेहरे पर इतनी शांति कैसे?"
गीता माँ मुस्कुराईं। और बोलीं —
"बहू, लोहार की भट्ठी देखी है?"
"हथौड़ा लोहे पर पड़ता है — आग पर नहीं।"
"वैसे ही — दर्द इस शरीर पर पड़ता है... मुझ पर नहीं।"
"मैं तो वह हूँ जो दर्द को भी जानती है।"
पड़ोसन देखती रह गई।
एक अनपढ़ बुज़ुर्ग महिला ने — विवेकचूड़ामणि का श्लोक १९३ जी कर दिखा दिया था।
यही तो असली पढ़ाई है — जो जीवन में उतर जाए।
एक सावधानी
यहाँ एक बात साफ़ कर लें।
इसका मतलब यह नहीं कि दर्द को अनदेखा करें। इलाज न कराएँ।
लोहार भी तो लोहे की देखभाल करता है — उसे सँवारता है, धार देता है।
शरीर की देखभाल कीजिए। मन का इलाज कीजिए। पूरी लगन से।
फ़र्क बस समझ का है —
चोट लोहे पर है — यह जानते हुए सँभालिए।
चोट मुझ पर है — यह मानकर टूटिए मत।
दर्द वही रहेगा — पर दुख हल्का हो जाएगा।
यह बात हमने पहले भी कही थी — आज उसकी जड़ मिल गई।
आज का अभ्यास
आज जब भी कोई चोट लगे — शरीर की, या मन की —
कोई ताना, कोई थकान, कोई चिंता —
बस आँख बंद करके भट्ठी को याद कीजिए।
और मन में कहिए —
"हथौड़ा लोहे पर है... आग पर नहीं।"
"चोट चोले पर है... मुझ पर नहीं।"
"मैं आग हूँ — छूकर भी अछूती।"
तीन साँसें। बस।
और देखिए — चोट का वज़न कितना उतर जाता है।
आखिरी बात
आत्मा सदा एकरूप है। अपने स्वभाव से शुद्ध।
चोले के बीच रहती है — पर चोले की नहीं होती।
जैसे —
मिट्टी घड़ों में — पर घड़ों के टूटने से परे। आग लोहे में — पर हथौड़े की चोट से परे। आप शरीर-मन में — पर हर चोट, हर बदलाव से परे।
और वही पुराना सूत्र, आज एक नए प्रकाश में —
जो पिटता है, वह मैं नहीं। जो जानता है, वह मैं हूँ।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ लोहा लाल दिखता है — पर दहक आग की है; शरीर-मन जीवित दिखते हैं — पर चेतना आत्मा की है ✅ हथौड़ा लोहे पर पड़ता है — आग पर नहीं; चोट चोले पर पड़ती है — आत्मा पर नहीं ✅ आत्मा भीतर रहकर भी अछूती — सदा एकरूप, सदा शुद्ध ✅ देखभाल पूरी कीजिए — पर टूटिए मत: दर्द लोहे का, जानना आग का
🙏 जो पिटता है, वह मैं नहीं। जो जानता है, वह मैं हूँ।
श्लोक (मूल आधार)
श्लोक १९३ — वह परम आत्मा स्वभाव से सदा एकरूप है; फिर भी उपाधि के संग से उसके गुणों वाली-सी दिखने लगती है — जैसे लोहे के बदलते रूपों में व्याप्त अविकारी अग्नि उन्हीं जैसी दिखती है, पर स्वयं नहीं बदलती।