सुगमता
60विवेकचूड़ामणि · कड़ी 63 / 85

सचेतन — 60 "पाँचों पर्दे हटे — अब बचा कौन?"

12 अगस्त 2026 · विवेकचूड़ामणि

नमस्कार।
आज का दिन बड़ा है।
बहुत कड़ियों पहले हमने एक बावड़ी देखी थी — याद है?
साफ़ पानी — जिस पर काई की परतें जमी थीं।
उस दिन से हम परतें हटा रहे हैं। एक-एक करके।
और आज...
आज आखिरी परत भी हट चुकी है।
तो आज वह घड़ी है — जिसके लिए यह पूरी यात्रा थी।
आज शास्त्र उत्तर देता है — बचा कौन?
पहले पूरी यात्रा एक साँस में
आँखें बंद कर लीजिए चाहें तो। और गिनते चलिए।
पहला पर्दा — शरीर। घड़े जैसा — दिखता है, जानता नहीं। यह मैं नहीं।
दूसरा पर्दा — साँस। धौंकनी जैसी — चलती है, पर कुछ नहीं जानती। यह भी मैं नहीं।
तीसरा पर्दा — मन। बादल जैसा — बनता, बिगड़ता, आता, जाता। यह भी मैं नहीं।
चौथा पर्दा — बुद्धि। लालटेन के काँच जैसी — चमक उधार की। यह भी मैं नहीं।
पाँचवाँ पर्दा — सुख की लहर। तालाब के चाँद जैसी — झलक, असल नहीं। यह भी मैं नहीं।
पाँच बार कहा — "नहीं... नहीं... नहीं... नहीं... नहीं..."
और अब वही पुराना डर सामने खड़ा है —
प्रिया वाला डर, प्याज़ वाला डर —
"सब परतें उतार दीं... तो कहीं भीतर कुछ भी नहीं तो नहीं?"
शास्त्र का उत्तर — यात्रा का मुकुट
शास्त्र मुस्कुराकर एक ही सवाल पूछता है। ज़रा ठहरकर सुनिए।
"अच्छा... यह बताओ —
शरीर को 'मैं नहीं' — कहा किसने?
साँस को परखा — किसने?
मन को आते-जाते देखा किसने?
बुद्धि की उधारी पकड़ी किसने?
सुख की लहर को उठते-गिरते जाना किसने?"
रुकिए... सोचिए...
हर पर्दे को नकारने वाला... हर परत को परखने वाला... हर बार जागा हुआ...
कोई तो था — जो पाँचों बार मौजूद था!
शास्त्र कहता है —
"वही। वही बचा है। वही तू है।"
साक्षी। देखने वाला। जानने वाला। शुद्ध बोध।
अँधेरे कमरे में सब चीज़ें ढूँढ़ने वाली टॉर्च... नहीं — दीये की बात करें —
दीया कमरे की हर चीज़ दिखाता है।
पर दीये को दिखाने के लिए दूसरा दीया नहीं चाहिए।
दीया अपने प्रकाश से खुद प्रकाशित है।
वैसे ही — आप।
शरीर, साँस, मन, बुद्धि, सुख — सबको आपने जाना।
और आपको जानने के लिए किसी और की ज़रूरत नहीं — आप स्वयं-प्रकाश हैं।
खालीपन का डर झूठा निकला —
परतों के पीछे शून्य नहीं — सूरज था।
श्लोक २१३ — अपनी पहचान का पत्र
अब शास्त्र, जैसे राज-मुहर लगाकर, आपकी असली पहचान का पत्र पढ़ता है।
सुनिए — यह आपके बारे में है —
आप स्वयं-प्रकाश हैं — अपने आप से जगमगाते, किसी उधार की रोशनी के मोहताज नहीं।
आप पाँचों कोशों से अलग हैं — पर्दों के बीच रहकर भी पर्दों से परे।
आप तीनों अवस्थाओं के साक्षी हैं — जागना आया-गया, सपना आया-गया, गहरी नींद आई-गई... और आप? आप तीनों में मौजूद रहे। तभी तो सुबह कह पाते हैं — "खूब सोया!"
आप निर्विकार हैं — निहाई जैसे अडिग। बचपन से आज तक — वही "मैं"।
आप निर्मल हैं — आग जैसे। लोहे के बीच रहकर भी — हथौड़े से अछूते।
आप सत्-स्वरूप हैं — जो सदा है। था। रहेगा।
और शास्त्र की आखिरी आज्ञा —
"बुद्धिमान वही है — जो इसे किताब की बात न रहने दे —
जो इसे अपनी पहचान बना ले।"
एक सामाजिक सत्य — यात्रा के अंत में
एक पल के लिए इसे दुनिया पर रखिए।
यह पहचान अगर सच है — तो सिर्फ़ आपकी नहीं है।
हर आदमी के भीतर — हर परत के पीछे — यही स्वयं-प्रकाश साक्षी बैठा है।
मज़दूर के भीतर वही। सेठ के भीतर वही। अपने के भीतर वही। पराए के भीतर वही।
परतें अलग-अलग हैं — कोई मोटी, कोई पतली, कोई उजली, कोई मैली।
पर दीया सबमें एक जैसा जल रहा है।
जिसने अपना दीया पहचान लिया — वह दूसरों की परतों पर अटकना छोड़ देता है।
वह परतों के पार देखने लगता है।
इसी नज़र से घर बदलते हैं। समाज बदलते हैं।
आज का अभ्यास
आज का अभ्यास — पूरी यात्रा का सार। हमारा सूत्र, पूरे विस्तार से।
रात को सोने से पहले, धीरे-धीरे, एक-एक पंक्ति —
"शरीर दिखता है — मैं देखने वाला हूँ।" "साँस चलती है — मैं जानने वाला हूँ।" "विचार आते हैं — मैं साक्षी हूँ।" "बुद्धि सोचती है — मैं प्रकाश हूँ।" "सुख-दुख लहरें हैं — मैं सागर हूँ।"
और अंत में, पूरी शांति से —
"जो दिखता है, वह मैं नहीं। जो देखता है, वह मैं हूँ।"
इसी के साथ सो जाइए।
आखिरी बात
बावड़ी की सारी काई हट गई।
और पानी... पानी तो सदा से साफ़ था।
पाँच पर्दे हटे — और पीछे मिला स्वयं-प्रकाश साक्षी।
न कभी जन्मा, न कभी बदला, न कभी मैला हुआ।
वह कोई दूर की चीज़ नहीं — वह आप हैं। इसी पल। यहीं।
पंचकोश की यात्रा आज पूरी हुई।
पर विवेकचूड़ामणि की यात्रा अभी जारी है —
क्योंकि पहचान हो जाना एक बात है... और उसमें ठहर जाना दूसरी।
वह आगे की कथा है।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए — आप पहचाने जा चुके हैं।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ पाँचों को "मैं नहीं" कहने वाला — पाँचों बार मौजूद था: वही साक्षी, वही आप ✅ दीया सबको दिखाता है — खुद को दिखाने के लिए दूसरा दीया नहीं चाहिए: आप स्वयं-प्रकाश हैं ✅ आप तीनों अवस्थाओं के साक्षी — जागना, सपना, नींद आए-गए; आप रहे ✅ परतों के पीछे शून्य नहीं — सूरज है ✅ और वही दीया हर आदमी के भीतर जल रहा है — परतें अलग, प्रकाश एक
🙏 जो दिखता है, वह मैं नहीं। जो देखता है, वह मैं हूँ।

श्लोक — मूल आधार

श्लोक २१२ — श्रुति के अनुकूल युक्तियों से पाँचों कोशों का निषेध कर देने पर, उस निषेध की सीमा-रूप जो शुद्ध बोधस्वरूप साक्षी है — वही आत्मा शेष बचती है।
श्लोक २१३ — जो आत्मा स्वयं-प्रकाश है, पाँचों कोशों से अलग है, तीनों अवस्थाओं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) की साक्षी है, निर्विकार, निर्मल और सत्-स्वरूप है — बुद्धिमान पुरुष उसे ही अपना वास्तविक आत्मा जाने।