सुगमता
69विवेकचूड़ामणि · कड़ी 71 / 85

सचेतन — 69 "दो गवाह — श्रीकृष्ण का वचन, और आपकी नींद"

1 सितंबर 2026 · विवेकचूड़ामणि

नमस्कार।
पिछली कड़ी में तीन उत्तर मिले थे — और वादा था दो गवाहों का।
एक गवाह — स्वयं भगवान श्रीकृष्ण।
दूसरा गवाह — इतना पास, कि आप चौंक जाएँगे —
आपकी अपनी, हर रात की, गहरी नींद।
आज दोनों की गवाही सुनते हैं।
पहला गवाह — श्रीकृष्ण का वचन
श्लोक २३५ हमें गीता के पास ले जाता है।
गीता में भगवान पहले कहते हैं — "सब प्राणी मुझमें स्थित हैं।"
और फिर, अगली ही साँस में, एक अचरज भरा वाक्य —
"और देख — न मैं प्राणियों में स्थित हूँ... न प्राणी मुझमें स्थित हैं!"
अर्जुन जैसा श्रोता भी यहाँ ठिठक जाए!
"अभी तो कहा — सब मुझमें! और अभी कहा — कुछ मुझमें नहीं! यह क्या?"
चलिए — इसे एक जानी-पहचानी जगह से समझते हैं।
आकाश और बादल
ऊपर देखिए। विशाल आकाश। और उसमें तैरते बादल।
पूछिए — बादल कहाँ हैं?
"आकाश में!" — सही बात। बादल आकाश में ही तो हैं। और कहाँ होंगे?
पर अब गहरा सवाल —
क्या बादल आकाश में ऐसे "रखे" हैं — जैसे संदूक में कपड़े?
क्या बादल आकाश को छूते हैं? गीला करते हैं? मैला करते हैं? धकेलते हैं?
नहीं!
घने से घना काला बादल आए — आकाश को एक बूँद नहीं लगती।
बादल बरस कर मिट जाए — आकाश में एक छेद नहीं होता।
तो सच क्या हुआ?
बादल आकाश में हैं भी — और आकाश को छूते भी नहीं।
"में हैं" — क्योंकि आकाश के सिवा उनके होने की कोई जगह नहीं।
"छूते नहीं" — क्योंकि आकाश इतना निर्लेप है कि कुछ उस पर टिकता ही नहीं।
यही श्रीकृष्ण का रहस्य है —
"सब मुझमें" — क्योंकि मेरे (ब्रह्म के) सिवा किसी के होने की जगह नहीं।
"कुछ मुझमें नहीं" — क्योंकि मैं आकाश से भी निर्लेप हूँ; जगत मुझ पर चढ़ता नहीं, मुझे छूता नहीं।
जगत ब्रह्म पर टिका दिखता है — पर ब्रह्म पर कोई बोझ नहीं।
जैसे रस्सी पर साँप "टिका" था — पर रस्सी पर साँप का कोई वज़न नहीं था!
दूसरा गवाह — आपकी अपनी नींद
अब श्लोक २३६ — और यह गवाह तो रोज़ रात आपके घर आता है।
शास्त्र एक सीधी कसौटी रखता है —
"जो सचमुच सत्य है — वह हर अवस्था में मिलना चाहिए।"
सोना सुबह भी सोना, दोपहर भी, रात भी। सत्य छुट्टी नहीं लेता।
अब जाँचिए —
यह जगत — जागने में है। ठीक।
सपने में? — वहाँ तो दूसरा ही जगत होता है! वहाँ के पहाड़, वहाँ के लोग — जागने पर सब गायब।
और गहरी नींद में?
अब ध्यान से —
गहरी नींद में — कौन सा जगत मिलता है?
न यह वाला... न सपने वाला... कोई भी नहीं!
न घर, न परिवार, न धन, न चिंता, न तारे, न धरती।
पूरा जगत — हर रात — पूरी तरह अनुपस्थित!
तो शास्त्र पूछता है —
"अगर जगत अपने बल पर सत्य होता — तो नींद में कहाँ चला जाता है?"
"सत्य तो वह — जो कभी अनुपस्थित न हो!"
"और जगत? — रोज़ रात ग़ैरहाज़िर!"
निष्कर्ष — जगत की सत्ता उधार की है। अपनी नहीं।
जैसे सपना — दिखते समय पूरा सच लगता है, पर अपने बल पर सच नहीं —
वैसे यह जगत — दिखता है, पर अपने बल पर सत् नहीं। इसका बल — ब्रह्म से उधार है।
और मज़ेदार बात — नींद में जगत गया... पर आप नहीं गए!
तभी तो सुबह कहते हैं — "मैं आराम से सोया।"
जगत आया-गया। साक्षी बना रहा।
गवाही पूरी हुई — सत्य जगत नहीं... सत्य वह है, जो जगत के आने-जाने में भी बना रहता है।
एक सावधानी — फिर वही ज़रूरी बात
यहाँ फिर वही बात साफ़ कर लें, जो पहले भी कही थी —
"जगत अपने बल पर सत् नहीं" — इसका अर्थ यह नहीं कि रोटी मत कमाओ, कर्तव्य छोड़ दो, किसी का दुख अनदेखा करो।
सपने में भी प्यास लगे — तो सपने का पानी पीते हैं!
जब तक जागना नहीं हुआ — जगत का व्यवहार पूरी ईमानदारी और करुणा से निभाना है।
फ़र्क बस पकड़ का है —
नाटक के पात्र की तरह — भूमिका पूरे मन से, पर यह याद रखते हुए कि मैं पात्र से बड़ा हूँ।
तब काम भी अच्छा होता है — और बोझ भी नहीं रहता।
आज का अभ्यास
आज रात, बिस्तर पर लेटते समय, एक वाक्य मन में लीजिए —
"अब थोड़ी देर में यह पूरा जगत — मेरे लिए — अनुपस्थित हो जाएगा।"
"और सुबह लौट आएगा।"
"जो रोज़ जाता-आता है — वह मैं नहीं।"
"जो उसके जाने-आने को जानता है — वह मैं हूँ।"
इसी भाव के साथ नींद को आने दीजिए।
आखिरी बात
दो गवाहियाँ पूरी हुईं —
श्रीकृष्ण का वचन — बादल आकाश में हैं, पर आकाश को छूते नहीं।
और नींद की कसौटी — जगत रोज़ रात ग़ैरहाज़िर; साक्षी हाज़िर।
अगली कड़ी — इस अध्याय की आखिरी —
जहाँ मिलेगी चाँदनी रात की सीपी — और वह वाक्य, जो पूरे अध्याय को एक मोती में बाँध देगा।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ श्रीकृष्ण का रहस्य — सब मुझमें (मेरे सिवा जगह नहीं), पर कुछ मुझमें नहीं (मैं निर्लेप हूँ) ✅ बादल आकाश में हैं — पर आकाश को न छूते हैं, न मैला करते हैं ✅ नींद की कसौटी — सत्य हर अवस्था में मिले; जगत रोज़ रात ग़ैरहाज़िर — साक्षी हाज़िर ✅ जगत की सत्ता उधार की है — सपने की तरह; बल ब्रह्म से मिला है ✅ पर व्यवहार पूरी ईमानदारी से — भूमिका पूरे मन से, पात्र से बड़े रहकर
🙙 जगत आया-गया — साक्षी बना रहा।

श्लोक (मूल आधार)
श्लोक २३५ — परमार्थ-तत्त्व के ज्ञाता भगवान श्रीकृष्ण ने निश्चय किया है — "न मैं प्राणियों में स्थित हूँ, न प्राणी मुझमें स्थित हैं।"
श्लोक २३६ — यदि विश्व सत्य होता, तो गहरी नींद में भी मिलना चाहिए था; पर वहाँ इसकी कुछ भी प्रतीति नहीं होती — इसलिए यह स्वप्न के समान असत् और मिथ्या है।