सचेतन — 71 "ब्रह्म कैसा है? — पहली झलक"
नमस्कार।
पिछले अध्याय में हमने जाना — जगत ब्रह्म से अलग नहीं। जो दिखा, वह भी वही।
तो अब मन में स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है —
"अच्छा... तो वह ब्रह्म — है कैसा?"
"उसकी पहचान क्या? उसका स्वरूप क्या?"
आज से नया अध्याय — ब्रह्म-निरूपण। यानी ब्रह्म का चित्र।
पर एक बात पहले —
यह चित्र रंगों से नहीं बनेगा। क्योंकि जिसका कोई रूप नहीं, उसका चित्र कैसा?
यह चित्र बनेगा — इशारों से।
जैसे चाँद दिखाने के लिए उँगली उठाते हैं — उँगली चाँद नहीं होती, पर चाँद तक ले जाती है।
आज पहले चार इशारे।
पहला इशारा — सत्
ब्रह्म सत् है। यानी — जो सदा है।
कसौटी हम पहले सीख चुके हैं — तीन काल की कसौटी।
जो पहले भी था, अब भी है, बाद में भी रहेगा — वही पूरा सत्।
बचपन गया। जवानी जाएगी। यह जगत का रूप भी बदलता रहेगा।
पर इन सबके नीचे बहती सत्ता — वह "है" — कभी नहीं गई।
नदियाँ बदलती रहीं — बहना नहीं बदला।
वही सदा रहने वाला — ब्रह्म।
दूसरा इशारा — अद्वितीय
ब्रह्म अद्वितीय है। यानी — जिसका कोई दूसरा नहीं।
यह हम पिछले अध्याय से जानते हैं — पर आज एक नई गहराई से देखिए।
सोचिए — दो चीज़ें कब होती हैं?
जब बीच में कोई सीमा हो। यह घड़ा — वह घड़ा। यहाँ मेरा खेत खत्म — वहाँ तेरा शुरू।
पर जिसकी कोई सीमा ही नहीं — उसके बगल में "दूसरा" खड़ा कहाँ होगा?
आकाश के बगल में दूसरा आकाश रखिए तो!
नहीं रख सकते — असीम एक ही हो सकता है।
इसीलिए ब्रह्म का कोई जोड़ नहीं, कोई मुक़ाबला नहीं, कोई पड़ोसी नहीं।
एक। बस एक।
तीसरा इशारा — विज्ञानघन
अब सबसे सुंदर शब्द — ब्रह्म विशुद्ध विज्ञानघन है।
घन — यानी ठोस। ठसाठस भरा हुआ।
समझिए ऐसे —
नमक का ढेला लीजिए।
उसे कहीं से भी तोड़िए — ऊपर से, नीचे से, बीच से —
हर कण खारा।
ऐसा नहीं कि बाहर खारा, भीतर मीठा। नमक का ढेला — ठोस खारापन है।
वैसे ही —
ब्रह्म — ठोस जानपन है। ठोस चेतना।
उसमें कहीं भी जड़ता का एक कण नहीं। कोई कोना अँधेरा नहीं।
पूरा का पूरा — जानना ही जानना। चेतना ही चेतना।
और "विशुद्ध" — यानी उसमें कोई मिलावट नहीं। जैसे गंगोत्री का जल — स्रोत पर, बिना किसी मैल के।
चौथा इशारा — शांत और अक्रिय
ब्रह्म प्रशांत है — गहरा शांत। और अक्रिय — यानी कुछ करता नहीं।
"अरे! कुछ करता नहीं? तो जगत चलता कैसे है?"
यह उलझन बहुत सुंदर है। इसे सूरज से समझिए।
सुबह सूरज उगा।
कमल खिल गए। पंछी उड़ चले। किसान खेत चले। सारा जगत काम में जुट गया।
अब बताइए — सूरज ने क्या "किया"?
क्या उसने झुककर कमल की पंखुड़ियाँ खोलीं? पंछियों को धक्का दिया? किसान का हाथ पकड़ा?
कुछ नहीं!
सूरज बस है। अपनी जगह। अपने प्रकाश में।
और उसकी उपस्थिति मात्र से — सब कुछ होने लगता है।
यही अक्रिय होने का अर्थ है —
ब्रह्म कुछ करता नहीं — ब्रह्म की उपस्थिति में सब होता है।
घर में भी तो देखा होगा — घर के बड़े-बूढ़े बस आँगन में बैठे रहते हैं —
कुछ "करते" नहीं — पर उनके होने भर से पूरा घर सधा रहता है।
बिना हिले सब चलाना — यही सबसे बड़ी शक्ति है। और यही सबसे गहरी शांति।
और सब मिलाकर — आनंदरस
श्लोक का अंतिम शब्द — ब्रह्म निरंतर आनंदरस-स्वरूप है।
रस — यानी स्वाद।
जैसे गन्ने का हर कण मीठा — कहीं से भी चूसो, मिठास ही मिलेगी —
वैसे ब्रह्म का "हर कण" आनंद है।
आनंद उसे मिलता नहीं — जैसे हमें चीज़ों से मिलता है —
आनंद वह है।
और याद कीजिए तालाब का चाँद — हमारे हर छोटे सुख में जो मिठास झलकती है — वह इसी आनंदरस की एक बूँद है।
आज का अभ्यास
आज शाम, कुछ पल किसी शांत बड़े की तरह बैठिए — या सूरज की तरह।
कुछ मत कीजिए। कुछ मत सुधारिए। बस उपस्थित रहिए।
और भाव कीजिए —
"जो सदा है... जिसका दूसरा नहीं... जो ठोस चेतना है... जो बिना किए सब सँभालता है..."
"उसी की एक किरण — यह मेरा 'होना' है।"
बस इतनी सी बैठक — रोज़।
आखिरी बात
आज चार इशारे मिले —
सत् — जो सदा है। अद्वितीय — असीम एक। विज्ञानघन — नमक के डले सा ठोस जानपन। शांत-अक्रिय — सूरज सा, बिना किए सब करता हुआ।
और सबका रस — आनंद।
पर अगली कड़ी में इशारे और गहरे होंगे —
एक ऐसा तेज — जिसका न रूप, न नाम — और फिर भी सब उसी से चमकता है।
और वह अद्भुत बात — जहाँ जानने वाला, जानना और जानी जाने वाली चीज़ — तीनों एक हो जाते हैं।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ ब्रह्म का चित्र रंगों से नहीं — इशारों से बनता है; उँगली चाँद नहीं, पर चाँद तक ले जाती है ✅ सत् — जो तीनों कालों में है; अद्वितीय — असीम का दूसरा नहीं हो सकता ✅ विज्ञानघन — नमक के डले सा: हर कण खारा; ब्रह्म का हर कण चेतना ✅ अक्रिय — सूरज सा: कुछ करता नहीं, उपस्थिति से सब होता है ✅ आनंदरस — गन्ने सा: आनंद उसे मिलता नहीं, आनंद वह है
🙏 ब्रह्म कुछ करता नहीं — उसकी उपस्थिति में सब होता है।
श्लोक (मूल आधार)
श्लोक २३९ — परब्रह्म सत् है, अद्वितीय है, विशुद्ध विज्ञानघन है, निर्मल, शांत, आदि-अंत से रहित, अक्रिय और सदा आनंदरस-स्वरूप है।
