सुगमता
73विवेकचूड़ामणि · कड़ी 75 / 85

सचेतन — 73"गूँगे का गुड़ — और नमक की गुड़िया"

10 सितंबर 2026 · विवेकचूड़ामणि

नमस्कार।
ब्रह्म-निरूपण की यह अंतिम कड़ी है।
अब तक के इशारे — सत्, अद्वितीय, ठोस चेतना, अक्रिय सूरज, बिना नाम-रूप की स्वयं-ज्योति, तिकड़ी से परे अखंड।
आज अंतिम श्लोक — और उसमें तीन बातें। तीनों अनोखी।
पहली — जिसे न छोड़ा जा सकता है, न पकड़ा।
दूसरी — जो मन और वाणी की पहुँच से बाहर है।
तीसरी — जो पूर्ण है। भरा-पूरा।
और रास्ते में मिलेंगे दो पुराने मित्र — गूँगे का गुड़, और नमक की गुड़िया।
पहली बात — न छोड़ने योग्य, न पकड़ने योग्य
श्लोक कहता है — ब्रह्म अहेय है और अनुपादेय।
अहेय — जिसे छोड़ा न जा सके। अनुपादेय — जिसे ग्रहण न किया जा सके, पकड़ा न जा सके।
अजीब बात है न? दुनिया की हर चीज़ या तो रखी जाती है, या छोड़ी जाती है!
पर ज़रा सोचिए —
छोड़ते किसे हैं? — जो अलग हो। घर छोड़ा, गाँव छोड़ा — क्योंकि वे हमसे अलग थे।
पर ब्रह्म तो आपका अपना स्वरूप है!
अपने आप को कोई कैसे छोड़े?
भागकर कहाँ जाएँगे? — जहाँ जाएँगे, "आप" साथ जाएँगे!
छाया से आगे कोई दौड़ पाया है?
और पकड़ते किसे हैं? — जो बाहर हो। आम पकड़ा, धन पकड़ा — क्योंकि वे बाहर थे।
पर ब्रह्म बाहर की चीज़ नहीं — पकड़ने वाला ही वह है!
मुट्ठी सब कुछ पकड़ लेती है — पर मुट्ठी अपने आप को नहीं पकड़ सकती!
आँख सब देखती है — अपने को नहीं। मुट्ठी सब पकड़ती है — अपने को नहीं।
तो निष्कर्ष कितना सुंदर है —
ब्रह्म खोया नहीं जा सकता — इसलिए कभी चिंता मत करना।
और ब्रह्म पकड़ा नहीं जा सकता — इसलिए पकड़ने की दौड़ छोड़ देना।
वह पाने की चीज़ नहीं — होने की बात है। और वह तो आप हैं ही।
दूसरी बात — मन-वाणी से परे — गूँगे का गुड़
फिर श्लोक कहता है — ब्रह्म मन और वाणी का विषय नहीं।
वाणी उसे कह नहीं सकती। मन उसे सोच नहीं सकता।
"तो फिर यह इतनी कड़ियाँ, इतने शब्द — किसलिए?"
इसका उत्तर हमारी बोली के एक अमर मुहावरे में है —
गूँगे का गुड़।
एक गूँगे आदमी को किसी ने गुड़ खिलाया।
आँखें बंद... चेहरा खिल गया... रोम-रोम मिठास!
लोगों ने पूछा — "कैसा लगा? बता तो!"
वह क्या करे? बोल नहीं सकता!
बस मुस्कुराता है... आँखों से चमकता है... हाथ हृदय पर रखता है...
स्वाद पूरा — शब्द शून्य।
तो क्या उसे गुड़ का पता नहीं चला? — सबसे ज़्यादा उसी को चला!
बस — जानना पूरा था, कहना असंभव।
ब्रह्म ऐसा ही है —
अनुभव में पूरा उतरता है — शब्दों में नहीं समाता।
और अब वह सवाल — "तो ये सारे शब्द किसलिए?"
शब्द — गुड़ की दुकान तक ले जाने के लिए हैं।
दुकान का पता शब्द बता सकते हैं। रास्ता शब्द दिखा सकते हैं।
पर स्वाद? — स्वाद के लिए तो गुड़ मुँह में रखना पड़ेगा।
इसीलिए शास्त्र सुनना ज़रूरी है — और सुनकर बैठना, ठहरना, डूबना — उससे भी ज़रूरी।
तीसरी बात — नमक की गुड़िया
अब अप्रमेय — जिसे नापा न जा सके। इसके लिए एक बहुत प्यारी कथा।
एक बार नमक की एक गुड़िया बनी।
उसने सुना — "सागर बहुत गहरा है!"
गुड़िया ने ठाना — "मैं नापकर आऊँगी! कितना गहरा है — बताकर रहूँगी!"
चल पड़ी। किनारे पहुँची। पानी में पैर रखा...
पैर घुल गए।
और उतरी... कमर घुल गई।
और गहरे... और गहरे...
और फिर लौटकर बताने वाला कोई बचा ही नहीं।
तो क्या गुड़िया हार गई? मर गई?
नहीं!
गुड़िया सागर हो गई।
नाप नहीं पाई — क्योंकि नापने वाली खुद नाप में घुल गई।
अब वह सागर की गहराई जानती है — पूरी की पूरी — क्योंकि वही गहराई है!
यही ब्रह्म को "जानने" का ढंग है —
बुद्धि उसे नाप नहीं सकती — पर उसमें घुल सकती है।
और घुलना ही — असली जानना है।
बूँद सागर को समझ नहीं सकती — सागर होकर जान सकती है।
और अंत में — पूर्ण
श्लोक का अंतिम शब्द — ब्रह्म पूर्ण है। भरा-पूरा। महान तेज।
पूर्ण — यानी जिसमें कोई कमी नहीं। कोई खाली जगह नहीं।
और यहीं इस अध्याय का सबसे मीठा फल है —
हम जीवन भर क्यों दौड़ते हैं? — क्योंकि भीतर एक कमी खटकती रहती है।
"कुछ और मिल जाए... कुछ और हो जाऊँ... तब पूरा होऊँगा।"
पर शास्त्र कहता है —
आपका स्वरूप पूर्ण है। कमी स्वरूप में नहीं — सिर्फ़ भूल में है।
घड़े के भीतर का आकाश भी उतना ही आकाश है — उसमें आकाश की कोई कमी नहीं!
जिस दिन यह बैठ गया — दौड़ धीमी होती है, और तृप्ति शुरू।
समाज के लिए भी सोचिए — तृप्त आदमी न लूटता है, न कुचलता है।
लूट-खसोट भूखे मन से आती है — और यह ज्ञान मन की भूख की जड़ काटता है।
आज का अभ्यास
आज रात, सोने से पहले, गूँगे का अभ्यास कीजिए।
दो मिनट शांत बैठिए।
कुछ कहिए मत — मन में भी नहीं। कुछ माँगिए मत। कुछ नापिए मत।
बस अपने "होने" के पास बैठिए — जैसे गूँगा गुड़ के स्वाद के पास बैठा था।
शब्द चुप — स्वाद चालू।
और उठते समय बस एक भाव —
"मैं पूर्ण से आया हूँ... पूर्ण में हूँ... पूर्ण ही हूँ।"
आखिरी बात
ब्रह्म-निरूपण पूरा हुआ। पूरे अध्याय का सार तीन वाक्यों में —
छोड़ नहीं सकते — क्योंकि वह आप हैं। पकड़ नहीं सकते — क्योंकि पकड़ने वाला वही है।
कह नहीं सकते — पर चख सकते हैं। गूँगे के गुड़ की तरह।
नाप नहीं सकते — पर घुल सकते हैं। नमक की गुड़िया की तरह।
और वह — पूर्ण है। और वही आप हैं।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ छोड़ नहीं सकते — अपने आप को कौन छोड़े; पकड़ नहीं सकते — मुट्ठी अपने को नहीं पकड़ती ✅ ब्रह्म पाने की चीज़ नहीं — होने की बात है; और वह आप हैं ही ✅ गूँगे का गुड़ — स्वाद पूरा, शब्द शून्य; शब्द दुकान तक ले जाते हैं, स्वाद चखने से मिलता है ✅ नमक की गुड़िया — सागर नाप नहीं पाई, सागर हो गई; घुलना ही असली जानना है ✅ पूर्ण — कमी स्वरूप में नहीं, भूल में है; और तृप्त मन न लूटता है, न कुचलता है
🙏 कह नहीं सकते — पर चख सकते हैं। नाप नहीं सकते — पर घुल सकते हैं।
श्लोक (मूल आधार)
श्लोक २४२ — वह ब्रह्म न छोड़ने योग्य है, न ग्रहण करने योग्य; मन-वाणी की पहुँच से बाहर; अप्रमेय (नाप से परे), आदि-अंत से रहित, परिपूर्ण और महान तेजोमय है।