सुगमता
76विवेकचूड़ामणि · कड़ी 78 / 85

सचेतन — 76 "राजा की पोशाक, सैनिक की ढाल"

23 सितंबर 2026 · विवेकचूड़ामणि

नमस्कार।
पिछली कड़ी में सवाल खड़ा हुआ था — जुगनू और सूरज एक कैसे?
और कुंजी मिली थी — एकता इशारे वाले अर्थ में है।
आज शास्त्र उस विरोध की जड़ पकड़ता है।
आज का श्लोक कहता है —
"यह सारा विरोध असली नहीं है — पहनावे का है।"
और इसे समझाने के लिए ले चलता है — राज-दरबार में।
पहले — विरोध कहाँ से आया?
श्लोक २४५ दो शब्दों में पूरी गुत्थी खोल देता है।
"जीव और ब्रह्म का विरोध वास्तविक नहीं — उपाधि के कारण है।"
उपाधि — यह शब्द हम जानते हैं — ओढ़ा हुआ चोला। पहनावा।
और फिर शास्त्र दोनों के चोले गिनाता है —
ईश्वर का चोला — माया।
यह पूरी सृष्टि-रचना की शक्ति — जिसके सहारे वह जगत का स्वामी, पालनहार, सर्वशक्तिमान कहलाता है।
और जीव का चोला — पंचकोश।
अरे! यह तो हमारी पुरानी पहचान है! वही पाँच परतें —
शरीर, साँस, मन, बुद्धि, सुख की परत — जिन्हें हमने एक-एक करके परखा था!
तो गुत्थी साफ़ हुई —
"छोटा जीव" — चेतना नहीं, चेतना का पाँच-परतों वाला पहनावा है।
"बड़ा ईश्वर" — चेतना नहीं, चेतना का माया वाला पहनावा है।
पहनावे अलग-अलग — पहनने वाला?
रुकिए... पहले दरबार चलते हैं।
राज-दरबार की कथा
एक राज-दरबार सजा है।
ऊँचे सिंहासन पर राजा — सिर पर मुकुट, कंधे पर राजसी दुशाला, हाथ में राजदंड।
और नीचे द्वार पर सैनिक — हाथ में ढाल, कमर में तलवार, तनी हुई मुद्रा।
कितना फ़र्क! एक आज्ञा देता — एक आज्ञा ढोता। एक स्वामी — एक सेवक।
अब कथा में एक मोड़ —
शाम हुई। दरबार उठा।
राजा भीतर गया — मुकुट उतारा। दुशाला उतारा। राजदंड रखा।
सैनिक घर गया — ढाल टाँगी। तलवार खोली। वर्दी उतारी।
और अब दोनों नदी किनारे नहाने पहुँचे — साधारण धोती में।
अब बताइए —
कौन राजा? कौन सैनिक?
पहचान ही नहीं सकते!
क्योंकि "राजा" आदमी का नाम नहीं था — मुकुट-राज्य-दंड का नाम था।
"सैनिक" भी आदमी का नाम नहीं — ढाल-तलवार-वर्दी का नाम था।
श्लोक २४६ के यही शब्द हैं —
"राज्य राजा की उपाधि है, ढाल सैनिक की — दोनों के हटते ही — न राजा बचता है, न सैनिक।"
बचते हैं — दो एक जैसे मनुष्य।
अब यही बात जीव-ईश्वर पर
अब कथा को ऊपर उठाइए।
ईश्वर से माया का मुकुट उतार लीजिए — सृष्टि-रचना, पालन, संहार — सब शक्तियाँ अलग रखिए —
बचा क्या? — शुद्ध चेतना।
जीव से पंचकोश की वर्दी उतार लीजिए — शरीर, साँस, मन, बुद्धि, सुख की परत — यह तो हम कर ही चुके हैं! —
बचा क्या? — शुद्ध चेतना।
अब दोनों "बचे हुओं" को आमने-सामने रखिए —
इधर शुद्ध चेतना... उधर शुद्ध चेतना...
फ़र्क बताइए?
नहीं बता सकते! क्योंकि फ़र्क पहनावों में था — पहनने वाले में नहीं!
जुगनू-सूरज वाला सारा विरोध — मुकुट और ढाल का विरोध था।
नदी किनारे — दोनों एक।
समाज के लिए — इस कथा का आईना
एक पल रुकिए। यह कथा हमारे समाज का कितना बड़ा आईना है!
हम एक-दूसरे को कैसे देखते हैं?
पहनावों से।
कुर्सी देखकर झुकते हैं। वर्दी देखकर डरते हैं। कपड़े देखकर तौलते हैं। पद देखकर पूजते हैं।
और पहनावा उतरते ही? —
कुर्सी से उतरा आदमी अचानक "कोई नहीं" हो जाता है!
कितना खोखला है यह सब — अगर आदर पहनावे का था, आदमी का नहीं!
शास्त्र की यह कथा सिखाती है —
पहनावे का काम कीजिए — पहनावे की पूजा मत कीजिए।
राजा राज-काज करे, सैनिक रक्षा करे — भूमिकाएँ ज़रूरी हैं।
पर भीतर यह याद रहे —
नदी किनारे सब एक हैं। और वही असली है।
जो समाज यह याद रखता है — वहाँ पद घमंड नहीं बनता, और छोटा काम शर्म नहीं।
आज का अभ्यास
आज दो बार यह नज़र आज़माइए।
पहली बार — किसी "बड़े" को देखकर।
मन में कहिए — "यह पद उतार दूँ... तो भीतर वही चेतना — जो मुझमें।"
डर आधा उतर जाएगा।
दूसरी बार — किसी "छोटे" को देखकर।
मन में कहिए — "यह हालत उतार दूँ... तो भीतर वही चेतना — जो मुझमें।"
आदर अपने आप जग जाएगा।
एक ही अभ्यास — डर भी काटता है, घमंड भी।
आखिरी बात
विरोध सुलझ गया —
जीव और ईश्वर का फ़र्क — वर्दी और मुकुट का फ़र्क है।
पहनावे उतरे — दोनों जगह एक ही शुद्ध चेतना।
पर अब पूछेंगे — "पहनावे उतारें कैसे? कौन सी विधि है?"
अगली कड़ी में शास्त्र वह विधि देगा — वेदों की सबसे प्रसिद्ध टेक —
"नेति... नेति..." — यह नहीं... यह भी नहीं...
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏

याद रखिए
✅ जीव-ब्रह्म का विरोध असली नहीं — उपाधि (पहनावे) का है ✅ ईश्वर का पहनावा — माया; जीव का पहनावा — पंचकोश ✅ मुकुट-दंड उतरे तो राजा नहीं; ढाल-वर्दी उतरे तो सैनिक नहीं — बचते हैं दो एक जैसे मनुष्य ✅ दोनों पहनावे उतारो — इधर भी शुद्ध चेतना, उधर भी: फ़र्क बताना असंभव ✅ समाज के लिए — पहनावे का काम करो, पहनावे की पूजा नहीं; नदी किनारे सब एक
🙏 फ़र्क मुकुट और ढाल का था — आदमी का नहीं।

श्लोक — मूल आधार

श्लोक २४५ — उन दोनों (जीव-ब्रह्म) का विरोध वास्तविक नहीं — उपाधि के कारण है, और उपाधि सत्य नहीं। ईश्वर की उपाधि माया है, जीव की उपाधि पंचकोश।
श्लोक २४६ — ये दोनों की उपाधियाँ हैं; इनके भली प्रकार हट जाने पर न (उपाधिवाला) परमात्मा रहता है, न जीव — जैसे राज्य राजा की उपाधि है और ढाल सैनिक की; दोनों के हटने पर न राजा है, न योद्धा।