सचेतन — 78 "वही देवदत्त यह है — महावाक्य की कुंजी"
नमस्कार।
महावाक्य-विचार की यह अंतिम कड़ी है।
अब तक की सीढ़ियाँ —
तीन शब्द मिले। जुगनू-सूरज की आपत्ति उठी। पहनावों का भेद खुला। और नेति-नेति की छैनी चली।
अब आखिरी और सबसे बारीक बात —
"वह तू है" — इस वाक्य को ठीक-ठीक पढ़ें कैसे? क्या छोड़ें, क्या रखें?
और इसका उत्तर देगा — मेले में मिला एक पुराना मित्र।
पहले — समस्या को ठीक से समझें
श्लोक २४९ कहता है — इस वाक्य में इशारा पकड़ने के तीन ढंग हो सकते हैं। दो गलत, एक सही।
पहला ढंग — पूरा शब्द छोड़ दो।
जैसे "गंगा पर घर" में — "गंगा" (धारा) को पूरा छोड़कर "किनारा" पकड़ा था।
पर यहाँ यह नहीं चलेगा! "तू" को पूरा छोड़ दें — तो वाक्य बचा किसके लिए? सुनने वाला ही गया!
दूसरा ढंग — पूरा शब्द पकड़े रहो।
सीधा अर्थ ज्यों का त्यों — "पाँच परतों वाला यह जीव = माया वाला ईश्वर।"
यह भी नहीं चलेगा — जुगनू-सूरज वाली आपत्ति फिर खड़ी! विरोध साफ़ है।
तो तीसरा ढंग — और यही सही है —
"कुछ छोड़ो — कुछ रखो।"
शब्द का विरोधी हिस्सा छोड़ दो — और सच्चा हिस्सा पकड़ लो।
"यह कैसे होता है?" — चलिए, मेले में।
मेले में देवदत्त — श्लोक २५० की कथा
बीस वर्ष पहले की बात।
काशी में आपका एक घनिष्ठ मित्र था — देवदत्त।
दुबला-पतला युवक। काला घुँघराला बाल। विद्यार्थी। साथ पढ़े, साथ घूमे।
फिर जीवन ने राहें बाँट दीं। बीस वर्ष — कोई खबर नहीं।
आज आप हरिद्वार के मेले में हैं। भीड़ ठसाठस।
अचानक — सामने से एक अधेड़ पुरुष आता दिखा।
भारी शरीर। बाल आधे सफ़ेद। चेहरे पर वर्षों की रेखाएँ। साथ में परिवार।
आँखें मिलीं... एक पल... दो पल...
और अचानक भीतर बिजली कौंधी —
"अरे! वही देवदत्त... यह है!"
दौड़कर गले मिले! बीस वर्ष एक पल में पिघल गए!
अब रुकिए — और इस वाक्य की कारीगरी देखिए
"वही देवदत्त यह है।"
ज़रा तौलिए — इस वाक्य में कितना विरोध भरा है!
"वही" — यानी बीस वर्ष पहले वाला, काशी वाला, दुबला, काले बालों वाला युवक।
"यह" — यानी आज वाला, हरिद्वार वाला, भारी, सफ़ेद बालों वाला अधेड़।
काशी ≠ हरिद्वार! तब ≠ अब! दुबला ≠ भारी! युवक ≠ अधेड़!
सीधे अर्थ में यह वाक्य उतना ही बेतुका है — जितना "जुगनू = सूरज"!
पर क्या आपने वाक्य बोलते समय एक पल भी उलझन महसूस की?
नहीं! झट पहचान लिया!
कैसे? — क्योंकि मन ने बिजली की तेज़ी से वही तीसरा ढंग चला दिया —
विरोधी हिस्से छोड़ दिए — तब-अब, काशी-हरिद्वार, दुबला-भारी — "ये तो हालात हैं, बदलते रहते हैं" —
और सच्चा हिस्सा पकड़ लिया — वह व्यक्ति! वह देवदत्त — जो दोनों रूपों के भीतर एक है!
देखा? — यह कारीगरी आपको आती है! जन्म से आती है!
अब यही कुंजी — महावाक्य पर
श्लोक २५० कहता है — ठीक यही ढंग "तत् त्वम् असि" पर लगाओ।
"तत्" — वह — कहते ही जुड़ता है: माया का मुकुट, सृष्टि की शक्ति, दूर-ऊपर-विराट...
छोड़ दो — यह पहनावा है।
"त्वम्" — तू — कहते ही जुड़ता है: पाँच परतें, छोटापन, भूलें, जन्म-मरण...
छोड़ दो — यह भी पहनावा है।
और जो बचा — दोनों तरफ़?
इधर — शुद्ध चेतना। उधर — शुद्ध चेतना।
जैसे "तब" और "अब" के पीछे एक देवदत्त —
वैसे "वह" और "तू" के पीछे — एक अखंड चैतन्य।
"असि" — है! — दोनों एक हैं!
और अब वाक्य में कोई विरोध नहीं। कोई बेतुकापन नहीं।
पहचान — पूरी। मिलन — पूरा।
जैसे मेले में मित्र से गले मिले थे — वैसे इस वाक्य में जीव ब्रह्म से गले मिलता है!
और अंतिम श्लोक — सौ महावाक्यों की एक टेक
श्लोक २५१ अध्याय पूरा करता है —
"इसी प्रकार लक्ष्य पकड़कर विद्वान अखंड-भाव जान लेते हैं।
और सैकड़ों महावाक्य — यही एक बात कहते हैं।"
जी हाँ — "तत्त्वमसि" अकेला नहीं है!
"अहं ब्रह्मास्मि" — मैं ब्रह्म हूँ। "अयमात्मा ब्रह्म" — यह आत्मा ब्रह्म है। "प्रज्ञानं ब्रह्म" — चेतना ही ब्रह्म है।
अलग-अलग वेदों से, अलग-अलग ऋषियों की वाणी से —
पर टेक एक। जैसे सौ नदियाँ — सागर एक।
हज़ारों वर्षों में, सैकड़ों द्रष्टाओं ने, अपने-अपने अनुभव से — एक ही सत्य दोहराया।
एक मत के इतने स्वतंत्र गवाह — इससे बड़ी गवाही और क्या होगी!
आज का अभ्यास
आज का अभ्यास — देवदत्त की नज़र से महावाक्य पढ़ना।
रात को शांत बैठकर, धीरे-धीरे —
"'वह' में से मुकुट छोड़ा... 'तू' में से पाँच परतें छोड़ीं..."
"इधर चेतना... उधर चेतना..."
"जैसे तब का और अब का देवदत्त — एक..."
"वैसे वह और मैं — एक। तत् त्वम् असि।"
और जैसे मेले में मित्र से गले मिले थे —
वैसे इस भाव से एक पल गले मिलिए। फिर सो जाइए।
आखिरी बात
महावाक्य-विचार पूरा हुआ। पूरे अध्याय का सार —
तीन शब्द — वह तू है।
आपत्ति — जुगनू-सूरज। उत्तर — फ़र्क पहनावों का।
विधि — नेति-नेति की छैनी।
और कुंजी — देवदत्त की पहचान: विरोधी छोड़ो, सच्चा पकड़ो।
और यह सब — सैकड़ों महावाक्यों की एक ही टेक।
अब सुनना हुआ पूरा — आगे शास्त्र कहेगा: इसे जीओ। इसमें ठहरो।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए — मेले की उस पहचान की तरह — एक पल में, पूरे हृदय से।
नमस्कार। 🙏
