सचेतन — 85 "एक ही टेक — 'अपना अध्यास हटाओ'"
नमस्कार।
पिछले अध्याय में चंदन महका — सुगंध दबी थी, मरी नहीं थी।
आज से नया अध्याय — अध्यास-निरास।
अध्यास — यह शब्द हम जानते हैं। गलत ओढ़ाव।
रस्सी पर साँप ओढ़ाया। आत्मा पर "मैं शरीर हूँ" ओढ़ाया।
और निरास — यानी उतारना।
पर इस अध्याय की सबसे अनोखी बात पहले सुन लीजिए —
शंकराचार्य जी इसमें एक ही पंक्ति नौ बार दोहराते हैं —
"स्वाध्यासापनयं कुरु" — अपना अध्यास दूर करो!
नौ बार! श्लोक-दर-श्लोक! वही टेक!
क्यों?
नौ बार क्यों?
हमारे विद्यालय का कोई भी शिक्षक इसका उत्तर जानता है।
जब बच्चे को कोई ज़रूरी बात सिखानी हो — तो कितनी बार कहते हैं?
एक बार? — नहीं!
रोज़ कहते हैं। हर मौक़े पर कहते हैं। प्यार से, फिर-फिर कहते हैं।
"हाथ धोकर खाना।" — रोज़। "सड़क देखकर पार करना।" — रोज़।
क्योंकि शिक्षक जानता है — ज़रूरी बात दोहराने से ही भीतर उतरती है।
शंकराचार्य जी — जगद्गुरु — यहाँ वही करते हैं!
वे जानते हैं — पाठ एक बार पढ़ाया जा चुका। अब रटाई नहीं — रोपाई चाहिए।
इसलिए हर श्लोक अलग बात कहता है — पर अंत वही —
"...इसलिए — अपना अध्यास दूर करो।"
जैसे ढोलक की थाप। जैसे माँ की लोरी की टेक।
यह टेक ही आज के अध्याय की आत्मा है।
पहली बात — मन को ठिकाने पर रखो
श्लोक २७८ कहता है —
निरंतर अपने आत्मस्वरूप में टिके रहने से — मन शांत होते-होते विलीन हो जाता है, और वासनाएँ क्षीण।
इसे एक घर के उदाहरण से लीजिए।
बच्चा जब तक बाज़ार में है — मचलेगा। यह चाहिए, वह चाहिए।
पर घर पहुँचते ही? — शांत। अपनी जगह। अपना कोना।
मन भी ऐसा ही है —
बाहर भटकता मन — बाज़ार का बच्चा। हज़ार माँगें।
आत्मा में टिका मन — घर लौटा बच्चा। चुपचाप, तृप्त।
रोज़ घर लौटने का अभ्यास — यही पहला उपाय।
"...इसलिए अपना अध्यास दूर करो।"
दूसरी बात — साबुन का रहस्य
अब श्लोक २७९ — और यह तो घर-घर का विज्ञान है!
श्लोक कहता है — मन के तीन रंग हैं —
तम — आलस, अँधेरा, "पड़े रहो।" रज — दौड़-भाग, बेचैनी, "और चाहिए!" सत्त्व — शांति, उजाला, सद्भाव।
और सफ़ाई की सीढ़ी बताता है —
दौड़-भाग से आलस कटता है। शांति से दौड़-भाग कटती है। और अंत में — शुद्ध शांति में वह शांति का अभिमान भी घुल जाता है।
उलझ गए? — रुकिए। साबुन याद कीजिए!
कपड़े पर मैल है।
मैल को कौन हटाता है? — साबुन।
पर सोचिए — साबुन भी तो एक तरह की चिकनाई ही है! वह भी कपड़े पर लगता है!
फिर? — पानी साबुन को भी बहा देता है।
और बचता है — साफ़ कपड़ा। जो पहले से ही नीचे था!
बस यही सीढ़ी है —
आलस का मैल — मेहनत के साबुन से। बेचैनी का साबुन — शांति के पानी से।
और अंत में शांति का हल्का सा झाग भी — शुद्ध स्वरूप में घुल जाता है।
यानी अच्छे गुण भी सीढ़ियाँ हैं — छत नहीं। चढ़ो, और आगे बढ़ो।
"...इसलिए शुद्ध सत्त्व का सहारा लेकर — अपना अध्यास दूर करो।"
तीसरी बात — रोटी की चिंता किसे सौंपें?
और श्लोक २८० एक बहुत बड़ी गाँठ खोलता है।
साधक के मन में एक चिंता खटकती रहती है —
"अगर मैं भीतर की ओर लगूँगा... तो मेरा क्या होगा? शरीर का क्या होगा? रोटी का क्या होगा?"
शास्त्र कहता है —
"प्रारब्ध शरीर का पोषण करता है — यह निश्चय करके, धैर्य धारण करो।"
यानी — जो हिस्सा चल पड़ा है, वह अपनी चाल चलेगा। शरीर को जो मिलना है, वह मिलेगा।
इसे ऐसे समझिए —
रेलगाड़ी में बैठे यात्री को क्या गाड़ी खींचनी पड़ती है?
नहीं! गाड़ी अपनी चाल चल रही है।
यात्री का काम है — आराम से बैठना, और अपने पड़ाव की तैयारी करना।
पर हम क्या करते हैं? — डिब्बे में बैठे-बैठे भी सिर पर गठरी उठाए रहते हैं!
"कहीं गाड़ी को भारी न लगे!"
अरे! गठरी नीचे रखिए! गाड़ी ही उठा रही है — गठरी भी, आपको भी!
चिंता की गठरी उतारिए — और धैर्य से अपने असली काम में लगिए।
"...इसलिए धैर्य का सहारा लेकर — अपना अध्यास दूर करो।"
आज का अभ्यास
आज दिन में तीन बार — शंकराचार्य जी की टेक अपनाइए।
कुछ भी हो — गुस्सा आए, चिंता घेरे, आलस पकड़े —
बस मुस्कुराकर भीतर कहिए —
"यह ओढ़ाव है... और मेरा एक ही काम है —"
"अपना अध्यास दूर करो।"
नौ बार के गुरु की टेक — अब आपकी टेक।
आखिरी बात
आज तीन उपाय मिले —
मन को घर लौटाओ। गुणों की साबुन-सीढ़ी चढ़ो। और चिंता की गठरी गाड़ी पर रखो।
और टेक वही — "अपना अध्यास दूर करो।"
अगली कड़ी में इस टेक के अगले मोती — और उनमें विज्ञान की वह कसौटी —
जो तीन गवाहों से सच परखती है।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ शंकराचार्य जी एक टेक नौ बार दोहराते हैं — क्योंकि ज़रूरी बात दोहराने से ही भीतर उतरती है ✅ आत्मा में टिका मन = घर लौटा बच्चा — शांत, तृप्त; भटकता मन = बाज़ार का बच्चा ✅ साबुन मैल हटाता है, फिर पानी साबुन को भी बहा देता है — गुण सीढ़ियाँ हैं, छत नहीं ✅ प्रारब्ध शरीर का पोषण करता है — डिब्बे में बैठकर गठरी सिर पर मत रखिए ✅ टेक याद रखिए — "अपना अध्यास दूर करो"
🙏 गठरी गाड़ी पर रखिए — और अपने पड़ाव की तैयारी कीजिए।
श्लोक (मूल आधार)
श्लोक २७८ — निरंतर आत्मस्वरूप में स्थित रहने से योगी का मन विलीन हो जाता है और वासनाओं का क्षय हो जाता है — इसलिए अपना अध्यास दूर करो।
श्लोक २७९ — रज और सत्त्व से तम का, सत्त्व से रज का, और शुद्ध सत्त्व से सत्त्व (के अभिमान) का नाश होता है — इसलिए शुद्ध सत्त्व का आश्रय लेकर अपना अध्यास दूर करो।
श्लोक २८० — "प्रारब्ध ही शरीर का पोषण करता है" — ऐसा निश्चय कर, निश्चल होकर, धैर्य धारण कर, यत्नपूर्वक अपना अध्यास दूर करो।
