सचेतन — 90 "तख़्ती बदलो या नाम — बच्चा वही रहता है"
नमस्कार।
अहंपदार्थ-निरूपण की यह अंतिम कड़ी है।
दो कड़ियों की खोज याद कीजिए —
छोटा "मैं" — बुलबुला। असली "मैं" — आसमान, जो तस्वीर में भी वही, नींद में भी वही।
तो अब शास्त्र अंतिम बात कहता है — और वह एक आज्ञा है। बड़ी कोमल आज्ञा —
"तो अब... इन बदलने वाली चीज़ों का अभिमान छोड़ो — और शांति पा लो।"
आज देखते हैं — क्या-क्या छोड़ना है। और छोड़ते ही क्या मिलता है।
नई तख़्ती की कहानी
हमारे विद्यालय में एक बार नई बच्ची का दाख़िला हुआ।
काग़ज़ों में एक उलझन थी — घरवालों ने बताया कि बच्ची का नाम बदला गया है।
छोटे में कुछ और नाम था। अब कुछ और।
पहले दिन वह सहमी सी खड़ी थी। एक बच्चे ने भोलेपन से पूछ लिया —
"तुम्हारा नाम बदल गया... तो क्या तुम भी बदल गई?"
बच्ची चुप।
पर पास खड़ी शिक्षिका मुस्कुराई। उसने बच्ची का हाथ थामा और सबसे कहा —
"अच्छा बताओ — हमारी कक्षा के दरवाज़े की तख़्ती पिछले साल बदली थी न?
पुरानी टूट गई थी — नई लगी। नए रंग की। नए अक्षरों वाली।
तो क्या कक्षा बदल गई? तुम्हारी पढ़ाई बदल गई? दोस्ती बदल गई?"
बच्चे एक साथ बोले — "नहीं!"
"बस! नाम तख़्ती है। इंसान कमरा है।
तख़्ती सौ बार बदलो — कमरे का उजाला वही रहता है।"
उस दिन से वह बच्ची कक्षा की सबसे चहकती बच्ची बन गई।
श्लोक २९८ ठीक यही कहता है —
"कुल, गोत्र, नाम, रूप, आश्रम — इन सबका अभिमान छोड़ो।"
ये सब तख़्तियाँ हैं — दरवाज़े पर लगी। भीतर के उजाले पर नहीं।
तख़्तियों की लड़ाई — समाज का आईना
अब एक पल समाज की ओर देखिए। थोड़ा दुखता हुआ सच।
हमारे समाज के आधे झगड़े किस पर हैं?
तख़्तियों पर!
"मेरा कुल ऊँचा — तेरा नीचा।"
"मेरा गोत्र — तेरा गोत्र।"
"मेरा नाम बड़ा — तू कौन?"
लोग तख़्तियों के लिए लड़ मरे — और भीतर का उजाला, जो सबमें एक था, किसी ने नहीं देखा।
शंकराचार्य जी हज़ार साल से भी पहले कह गए —
कुल-गोत्र-नाम का अभिमान — छोड़ो। ये आत्मा के नहीं — इस बदलते शरीर के पते हैं।
और शरीर? — वह ख़ुद पानी के बुलबुले सा है।
बुलबुले के पते पर घमंड कैसा?
जो घर ही किराए का है — उसके दरवाज़े की तख़्ती पर लड़ाई कैसी?
सोचिए — जिस दिन विद्यालय की यह छोटी सी सीख समाज सीख ले —
"तख़्ती दरवाज़े पर है — उजाले पर नहीं" —
उस दिन आधे झगड़े अपने आप बुझ जाएँ।
और एक बारीक बात — "करने वाला" भी तख़्ती है
श्लोक २९८ एक कदम और भीतर जाता है।
कहता है — सिर्फ़ कुल-नाम ही नहीं —
"कर्तापन-भोक्तापन" भी छोड़ो।
यानी — "मैंने किया! मैंने पाया! मैं करने वाला!" — यह भाव भी एक तख़्ती है।
सबसे भीतर वाली तख़्ती। सोने के अक्षरों वाली। पर तख़्ती ही।
याद कीजिए — सूरज कुछ "करता" नहीं — उसकी उपस्थिति में सब होता है।
आप भी — करने-धरने के सारे मेले को देखने वाले हैं।
काम पूरे मन से कीजिए — पर "कर्ता" की तख़्ती हृदय पर मत ठोकिए।
काम हल्का हो जाएगा — और नींद गहरी।
और छोड़ते ही क्या मिलता है? — शांति
अब श्लोक २९७ का मीठा फल।
शास्त्र कहता है — यह अभिमान छोड़कर, अपने को तीनों कालों में अबाधित, अखंड बोध जानकर —
"उपैहि शान्तिम्" — शांति पा लो।
ध्यान दीजिए — शांति "बना लो" नहीं कहा। "पा लो" कहा!
क्योंकि शांति बनानी नहीं पड़ती —
वह तख़्तियों के बोझ के नीचे दबी रखी है। बोझ हटा — शांति हाज़िर।
जैसे बच्चा दिन भर भारी बस्ता ढोकर घर आए — और बस्ता उतारते ही —
"आह!"
वह "आह" ही शांति है। कुछ नया नहीं मिला — बोझ उतरा।
कुल का बस्ता। नाम का बस्ता। "मैं कर्ता" का सबसे भारी बस्ता।
उतारिए — और "आह" कहिए।
आज का अभ्यास
आज रात — बस्ता उतारने का अभ्यास।
सोने से पहले, एक-एक तख़्ती उतारिए — जैसे स्कूल से लौटा बच्चा बस्ता उतारता है —
"आज का नाम-मान... उतारा।"
"कुल-परिवार की तख़्ती... उतारी।"
"'मैंने यह किया, वह किया'... यह भी उतारा।"
और फिर एक लंबी साँस —
"आह... अब सिर्फ़ मैं। अखंड। शांत।"
उसी हल्केपन में सो जाइए।
आखिरी बात
अहंपदार्थ की खोज पूरी हुई। तीन कड़ियों का सार —
छोटा "मैं" — बुलबुला। असली "मैं" — आसमान।
प्रमाण — तस्वीर, विज्ञान, और नींद।
और आज की आज्ञा — तख़्तियाँ उतारो — शांति पा लो।
नाम तख़्ती है। कुल तख़्ती है। "कर्ता" भी तख़्ती है।
और आप? — भीतर का वह उजाला, जो हर तख़्ती के बदलने पर भी वही रहा।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए — तख़्ती को नहीं, उजाले को।
नमस्कार। 🙏
