सचेतन — 92 "ख़ज़ाने पर बैठा तीन सिर वाला साँप"
नमस्कार।
पिछली कड़ी में ग्रहण छँटा — चाँद निर्मल निकला।
आज शास्त्र एक कथा सुनाता है — बिल्कुल दादी-नानी की कहानियों जैसी।
गड़े ख़ज़ाने की कथा।
हमारे गाँवों में यह कहावत पुरानी है — "गड़े धन पर नाग बैठता है।"
श्लोक ३०३ इसी कहावत को उठाता है — और उसमें जीवन का सबसे बड़ा नक्शा छिपा देता है।
कथा — ख़ज़ाना और साँप
एक घर के आँगन में — ज़मीन के नीचे — एक ख़ज़ाना गड़ा है।
सोना-जवाहरात नहीं — उससे भी बड़ा।
आनंद का ख़ज़ाना। वह शांति, वह पूर्णता — जिसे हम ब्रह्मानंद कहते आए हैं।
और सबसे बड़ी बात — ख़ज़ाना आपका अपना है! आपके ही आँगन में!
पर...
उस ख़ज़ाने पर कुंडली मारे बैठा है — एक भयंकर साँप।
और साँप भी साधारण नहीं — तीन सिर वाला!
नाम है उसका — अहंकार।
जो भी ख़ज़ाने की ओर बढ़ता है — कोई न कोई सिर फुफकार उठता है।
तीनों सिर पहचानिए — ये रोज़ मिलते हैं
अब सबसे काम की बात। तीनों सिरों की पहचान — क्योंकि ये कहानी में नहीं, हमारे घर-विद्यालय में रोज़ फुफकारते हैं।
पहला सिर — अकड़ का सिर। (तम)
यह सबसे मोटा है। इसकी फुफकार —
"मैं ही सही! मैं किसी की नहीं सुनूँगा! झुकूँगा नहीं!"
घर के झगड़ों में, कक्षा की ज़िद में — यही सिर बोलता है।
दूसरा सिर — दौड़ का सिर। (रज)
इसकी फुफकार —
"मैं करके दिखाऊँगा! मैं सबसे आगे! मुझे और चाहिए, और, और!"
यह सिर दिन भर दौड़ाता है — और साँस नहीं लेने देता।
और तीसरा सिर — सबसे पतला, सबसे चालाक। (सत्त्व)
ध्यान से सुनिए — यह अच्छाई का घमंड है!
"मैं कितना अच्छा हूँ! मैं दान करता हूँ! मैं ही तो सेवा करता हूँ! मैं औरों जैसा नहीं!"
चौंक गए? — अच्छे काम का भी सिर?!
हाँ! क्योंकि अच्छाई सोना है — पर "मैं अच्छा" की फुफकार साँप की ही है।
पहले दो सिर काले हैं — दिख जाते हैं।
तीसरा उजला है — इसीलिए सबसे ख़तरनाक।
कितने भले लोग पहले दो सिर काटकर — तीसरे के डसे हुए घूमते हैं!
तलवार कौन सी?
तो साँप हटे कैसे? श्लोक कहता है —
विवेकी पुरुष "विज्ञान" की चमकती तलवार से तीनों सिर काट देता है।
विज्ञान — यानी वह अनुभव में उतरा हुआ ज्ञान, जो हम इक्यावन कड़ियों से माँज रहे हैं —
"जो दिखता है, वह मैं नहीं। जो देखता है, वह मैं हूँ।"
हर बार जब कोई सिर फुफकारे — यह तलवार चलाइए —
अकड़ बोले — "यह फुफकार है, मैं नहीं।" — एक सिर कटा।
दौड़ बोले — "यह फुफकार है, मैं नहीं।" — दूसरा कटा।
और "मैं कितना अच्छा" बोले — तो सबसे सावधानी से — "यह भी फुफकार ही है।" — तीसरा भी।
और साँप हटते ही — ख़ज़ाना आपका। जो सदा से आपका ही था।
विष की एक बूँद — श्लोक ३०४ की चेतावनी
अब एक ज़रूरी चेतावनी — और यह घर की, दवा की भाषा में है।
शास्त्र पूछता है —
"शरीर में विष की थोड़ी सी भी मात्रा रह जाए — तो पूरा आरोग्य कैसे होगा?"
हम सब जानते हैं — काँटा पूरा निकालना पड़ता है। ज़रा सी नोक भी भीतर रह गई — तो पकेगी।
घाव पूरा साफ़ करना पड़ता है — कोना भर मैल भी रह गया — तो फिर बिगड़ेगा।
वैसे ही — अहंकार की एक बूँद भी बड़ी बात है।
"थोड़ा सा तो चलता है..." — नहीं चलता!
क्योंकि बूँद फिर तालाब बनती है।
इसीलिए सफ़ाई पूरी — और जाँच रोज़।
और फल? — "यह आत्मा ही मैं हूँ"
श्लोक ३०५ फल बताता है —
अहंकार की पूरी निवृत्ति होते ही — उसके बनाए सौ भ्रम अपने आप गिर जाते हैं —
और भीतर एक सीधा, शांत बोध जागता है —
"अयम् अहम् अस्मि" — यह आत्मा ही मैं हूँ।
न फुफकार, न दौड़, न घमंड — बस ख़ज़ाने पर बैठा मालिक। शांत। तृप्त।
आज का अभ्यास
आज तीन सिरों की गिनती कीजिए।
शाम को बैठकर पूछिए —
"आज अकड़ का सिर कब फुफकारा?" — (किसी की न सुनी हो...)
"आज दौड़ का सिर कब?" — (बेचैनी, तुलना, "और चाहिए"...)
"और आज 'मैं अच्छा' का सिर?" — (यह सबसे ईमानदारी से खोजिए!)
जो सिर दिखे — डरिए मत। मुस्कुराइए —
"दिख गया! और जो दिख गया — वह मैं नहीं!"
फुफकार पहचानना ही — तलवार का पहला वार है।
आखिरी बात
ख़ज़ाना आपके ही आँगन में है — आपका अपना।
बीच में बस तीन फुफकारें हैं — अकड़, दौड़, और अच्छाई का घमंड।
तलवार आपके हाथ में है — "जो दिखता है, वह मैं नहीं।"
और विष की बूँद भी न बचे — क्योंकि बूँद तालाब बनती है।
पर अगली कड़ी में एक और चौंकाने वाली चेतावनी —
कटा हुआ साँप... फिर जी उठता है! कब? कैसे? — और माली की क्यारी में इसका उत्तर।
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
