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सचेतन :89 श्री शिव पुराण- अर्धनारीश्वर पुरुष और प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा ही काम है। रागात्मक प्रवृत्ति के लिए  शक्ति और शिव दोनों अभिभाज्य तरह से मौजूद होना चाहिए। राग यानी प्रेम उत्पन्न करने या बढ़ाने वाला प्रेममय प्रीतिवर्धक। ‘राग’ शब्द संस्कृत की ‘रंज्’ धातु से बना है। रंज् का अर्थ है रंगना। जिस तरह एक…

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सचेतन :87 श्री शिव पुराण- अर्धनारीश्वर रहस्य 

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमने बात किया था की कामवासना भी एक उपासना, साधना है। काम, जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। पुरुष का तात्पर्य विवेक संपन्न मनुष्य से है अर्थात विवेक शील मनुष्यों के लक्ष्यों की प्राप्ति ही पुरुषार्थ है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में…

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सचेतन :86 श्री शिव पुराण- कामदेव ने ही शिव व पार्वती के बीच प्रेम बनाया था  

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ आम तौर पर दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में, जिस चीज को लोग दैवी या ईश्वरीय मानते हैं, उसे अच्छा ही दर्शाया जाता है। लेकिन अगर आप शिव पुराण को ध्यान से पढ़ें, तो आप शिव की पहचान अच्छे या बुरे के रूप में नहीं कर सकते। वह सब कुछ हैं – वह…

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सचेतन :85 श्री शिव पुराण- सुरक्षित काम प्राकृतिक व्यवहार के लिए आवश्यक माना गया है

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ कामवासना भी एक उपासना, साधना है। काम पूर्ति से दिमाग की गन्दगी निकलकर जिन्दगी सुधर जाती है। काम, जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। पुरुषार्थ = पुरुष+अर्थ =पुरुष का तात्पर्य विवेक संपन्न मनुष्य से है अर्थात विवेक शील मनुष्यों के लक्ष्यों की प्राप्ति ही पुरुषार्थ है।…

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सचेतन :84 श्री शिव पुराण- कामदेव मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा देता है

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमारा मन कामरूप होने के कारण मदन स्वरूप है। दर्प यानी अहंकार, घमंड, गर्व, मन का एक भाव जिसके कारण व्यक्ति दूसरों को कुछ न समझे, अक्खड़पन।कंदर्प नाम का अर्थ “प्यार के देवता, कंदर्प का अर्थ है प्यार के स्वामी” होता है। हिंदू संस्कृति में पुराणों की चर्चा खूब मिलती है। इन्हीं…

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सचेतन :83 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: कामदेव का जन्म

#RudraSamhita   श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता के इस संवाद में ब्रह्माजी ने मुनिश्रेष्ठ नारद जी को अपने मानसपुत्र तथा सप्तर्षियों में से एक मरीचि जो वायु और कश्यप ऋषि के पिता हैं और उन्होंने कामदेव का नाम कैसे रखा उसके बारे में बताया। ब्रह्मा जी मुनिश्रेष्ठ नारद जी से कहते हैं की हमारे…

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सचेतन :82 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: पुरुष जन्म लेते ही अपने मन को भी मथने लगते हैं 

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता से यह संवाद ब्रह्माजी और मुनिश्रेष्ठ नारद जी के बीच हो रहा है।  ब्रह्मा जी कहते हैं- मुनिश्रेष्ठ हे नारद जी! तदन्नतर मेरे अभिप्राय को जानने वाले मरीचि आदि मेरे पुत्र सभी मुनियों ने उस पुरुष का उचित नाम रखा। दक्ष आदि प्रजापतिओं ने उसका मुंह…

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सचेतन :81 श्री शिव पुराण- हम वास्तव में कौन हैं? 

#RudraSamhita   https://sachetan.org/ मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में केशव ने बताया है की काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।   द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । वास्तव में राग-द्वेष का अर्थ ‘अहम्’-(मैं-पन-) से है। अहं या…

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सचेतन :80 श्री शिव पुराण- राग-द्वेष पर विजय पाने के उपाय

मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं के बारे में केशव ने बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।

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सचेतन :79 श्री शिव पुराण- द्वेष से दुःख होता है

केशव के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं के बारे में बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।
एक गरीब आत्म छवि होना ईर्ष्या का एक और कारण है। सामान्य और असामान्य: ईर्ष्या सबसे अच्छा दो मुख्य उदाहरण है। परिवार ईर्ष्या, सहोदर स्पर्द्धा ईर्ष्या के इस प्रकार के एक ट्रेडमार्क विशेषता है। असामान्य ईर्ष्या अक्सर, रुग्ण मानसिक रोग, हो गया हो या चिंतित ईर्ष्या के कारण होता है। ईर्ष्या दो लोगों के एक सामाजिक या व्यक्तिगत संबंधों का हिस्सा है।
द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । विशेष— योगशास्त्र में द्वेष उस भाव को कहा गया है जो दुःख का साक्षात्कार होने पर उससे या उसके कारण से हटने या बचने की प्रेरणा करता है। द्वेष का भाव चिढ़, शत्रुता, वैर से है।