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  • सचेतन 2.61: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – भयानक रूप से सामने आने वाली ही राक्षिसी होती है

    हमारे साथ कोई वीभत्स तरीके से अपने व्यवहार का प्रदर्शन करता है तो वही क्रूर रूप वाली राक्षसियों  की संज्ञा होती है 
    सीता को भिन्न भिन्न राक्षसियों ने अपनी क्रूरता से उनको डराया और कहा यदि तुम मेरी कही हुई इस बात को नहीं मानोगी तो हम सब मिलकर तुम्हें इसी मुहूर्त में अपना आहार बना लेंगी। 
    किसी राक्षस के क्रूरता या हँसी या फिर से वीभत्स तरीके से अपने व्यवहार का प्रदर्शन करना। आपको यह प्रसंग उन सारे दृष्टिकोण को प्रकाशित कर सकता है की कभी कभी हमड़े जीवन में भी कोई हम सभी को डराया होगा। यही डर को हम पैशाचिक की परिभाषाएँ भी देते हैं। जब हमारे साथ कोई वीभत्स तरीके से यानी भयानक रूप से सामने आता है तो वही राक्षसी प्रवीर्ति कहलाता है। 
    सीता जी के सामने तदनन्तर दूसरी राक्षसी सामने आयी। उसके लम्बे लम्बे स्तन लटक रहे थे। उसका नाम विकटा था। वह कुपित हो मुक्का तानकर डाँटती हुई सीता से बोली – अत्यन्त खोटी बुद्धिवाली मिथिलेशकुमारी! अबतक हमलोगों ने अपने कोमल स्वभाववश तुम पर दया आ जाने के कारण तुम्हारी बहुत-सी अनुचित बातें सह ली हैं॥इतने पर भी तुम हमारी बात नहीं मानती हो। हमने तुम्हारे हित के लिये ही समयोचित सलाह दी थी। देखो, तुम्हें समुद्र के इस पार ले आया गया है, जहाँ पहुँचना दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। यहाँ भी रावण के भयानक अन्तःपुर में तुम लाकर रखी गयी हो। मिथिलेशकुमारी! याद रखो, रावण के घर में कैद हो और हम-जैसी राक्षसियाँ तुम्हारी चौकसी कर रही हैं। मैथिलि! साक्षात् इन्द्र भी यहाँ तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते। अतः मेरा कहना मानो, मैं तुम्हारे हितकी बात बता रही हूँ। आँसू बहाने से कुछ होने-जाने वाला नहीं है। यह व्यर्थ का शोक त्याग दो। सदा छायी रहने वाली दीनता को दूर करके अपने हृदय में प्रसन्नता और उल्लास को स्थान दो। सीते! राक्षसराज रावण के साथ सुखपूर्वक क्रीडाविहार करो। भीरु! हम सभी स्त्रियाँ जानती हैं कि नारियों का यौवन टिकने वाला नहीं होता। जबतक तुम्हारा यौवन नहीं ढल जाता, तबतक सुख भोग लो। मदमत्त बना देने वाले नेत्रों से शोभा पाने वाली सुन्दरी! तुम राक्षसराज रावण के साथ लङ्का के रमणीय उद्यानों और पर्वतीय उपवनों में विहार करो। देवि! ऐसा करने से सहस्रों स्त्रियाँ सदा तुम्हारी आज्ञा के अधीन रहेंगी। महाराज रावण समस्त राक्षसों का भरण-पोषण करने वाले स्वामी हैं। तुम उन्हें अपना पति बना लो। मैथिलि! याद रखो, मैंने जो बात कही है, यदि उसका ठीक-ठीक पालन नहीं करोगी तो मैं अभी तुम्हारा कलेजा निकालकर खा जाऊँगी। 
    अब चण्डोदरी नामवाली राक्षसी की बारी आयी। उसकी दृष्टिसे  ही क्रूरता टपकती थी। उसने विशाल त्रिशूल घुमाते हुए यह बात कही— महाराज रावण जब इसे हरकर ले आये थे, उस समय भय के मारे यह थर-थर काँप रही थी, जिससे इसके दोनों स्तन हिल रहे थे। उस दिन इस मृगशावकनयनी मानव-कन्या को देखकर मेरे हृदय में यह बड़ी भारी इच्छा जाग्रत् हुई—इसके जिगर, तिल्ली, विशाल वक्षःस्थल, हृदय, उसके आधार स्थान, अन्यान्य अंग तथा सिर को मैं खा जाऊँ। इस समय भी मेरा ऐसा ही विचार है.
    तदनन्तर प्रघसा नामक राक्षसी बोल उठी—’फिर तो हमलोग इस क्रूर-हृदया सीता का गला घोंट दें; अब चुपचाप बैठे रहने की क्या आवश्यकता है? इसे मारकर महाराज को सूचना दे दी जाय कि वह मानव कन्या मर गयी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समाचार को सुनकर महाराज यह आज्ञा दे देंगे कि तुम सब लोग उसे खा जाओ। 
    तत्पश्चात् राक्षसी अजामुखी ने कहा—’मुझे तो व्यर्थ का वाद-विवाद अच्छा नहीं लगता। आओ, पहले इसे काटकर इसके बहुत-से टुकड़े कर डालें। वे सभी टुकड़े बराबर माप-तौल के होने चाहिये। फिर उन टुकड़ों को हमलोग आपस में बाँट लेंगी। साथ ही नाना प्रकार की पेय-सामग्री तथा फूल-माला आदि भी शीघ्र ही प्रचुर मात्रा में मँगा ली जाय। 
    तदनन्तर राक्षसी शूर्पणखा ने कहा—’अजामुखी ने जो बात कही है, वही मुझे भी अच्छी लगती है। समस्त शोकों को नष्ट कर देने वाली सुरा को भी शीघ्र मँगवा लो। उसके साथ मनुष्य के मांस का आस्वादन करके हम निकुम्भिला देवी के सामने नृत्य करेंगी’।
    उन विकराल रूपवाली राक्षसियों के द्वारा इस प्रकार धमकायी जाने पर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता धैर्य छोड़कर फूट-फूटकर रोने लगीं।
  • सचेतन 2.60: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – स्वामी ही गुरु हैं, और उनमें ही अनुरक्तता होना चाहिए

    सीता जी को क्रमशः त्रिजटा तत्पश्चात् एकजटा आदि राक्षसीयों ने क्रोध से लाल आँखें डराया और रावण के प्रति झुकाने की कोशिश भी किया और कहा की ‘देवि! मैंने तुमसे उत्तम, यथार्थ और हित की बात कही है। सुन्दर मुसकानवाली सीते! तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।

    सीताजी ने राक्षसियों की बात मानने से इनकार कर दिया तथा राक्षसियों ने उन्हें मारने-काटने की धमकी भी दिया। लेकिन सीता जी की अनुरक्त यानी उनका मोहित होना सिर्फ़ रामचंद्र जी के प्रति था।

    तदनन्तर विकराल मुखवाली उन समस्त राक्षसियों ने जो कटुवचन सुनने के योग्य नहीं थीं, उन सीता से अप्रिय तथा कठोर वचन कहना आरम्भ किया— सीते! रावण का अन्तःपुर समस्त प्राणियों के लिये मनोरम है। वहाँ बहुमूल्य शय्याएँ बिछी रहती हैं। उस अन्तःपुर में तुम्हारा निवास हो, इसके लिये तुम क्यों नहीं अनुमति देतीं? तुम मानुषी हो, इसलिये मनुष्य की भार्या का जो पद है, उसी को तुम अधिक महत्त्व देती हो; किंतु अब तुम राम की ओर से अपना मन हटा लो, अन्यथा कदापि जीवित नहीं रहोगी। तुम त्रिलोकी के ऐश्वर्य को भोगने वाले राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाकर आनन्दपूर्वक विहार करो।अनिन्द्य सुन्दरि! तुम मानवी हो, इसीलिये मनुष्य जातीय राम को ही चाहती हो; परंतु राम इस समय राज्य से भ्रष्ट हैं। उनका कोई मनोरथ सफल नहीं होता है तथा वे सदा व्याकुल रहते हैं। 

    राक्षसियों की ये बातें सुनकर कमलनयनी सीता ने आँसूभरे नेत्रों से उनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा – तुम सब मिलकर मुझसे जो यह लोकविरुद्ध प्रस्ताव कर रही हो, तुम्हारा यह पापपूर्ण वचन मेरे हृदय में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहर पाता है। एक मानवकन्या किसी राक्षस की भार्या नहीं हो सकती। तुम सब लोग भले ही मुझे खा जाओ; किंतु मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकती। मेरे पति दीन हों अथवा राज्यहीन–वे ही मेरे स्वामी हैं, वे ही मेरे गुरु हैं, मैं सदा उन्हीं में अनुरक्त हूँ और रहूँगी। जैसे सुवर्चला सूर्य में अनुरक्त रहती हैं। जैसे महाभागा शची इन्द्र की सेवा में उपस्थित होती हैं, जैसे देवी अरुन्धती महर्षि वसिष्ठ में, रोहिणी चन्द्रमा में, लोपामुद्रा अगस्त्य में, सुकन्या च्यवन में, सावित्री सत्यवान् में, श्रीमती कपिल में, मदयन्ती सौदास में, केशिनी सगर में तथा भीमकुमारी दमयन्ती अपने पति निषधनरेश नल में अनुराग रखती हैं, उसी प्रकार मैं भी अपने पतिदेव इक्ष्वाकुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीराम में अनुरक्त हूँ।

    सीता जी सिर्फ़  श्रीराम में मंत्रमुग्ध, आसक्त और प्रेम में बंधी हुई थी। 

    सीता की बात सुनकर राक्षसियों के क्रोध की सीमा न रही। वे रावण की आज्ञा के अनुसार कठोर वचनों द्वारा उन्हें धमकाने लगीं। अशोकवृक्ष में चुपचाप छिपे बैठे हुए वानर हनुमान् जी सीता को फटकारती हुई राक्षसियों की बातें सुनते रहे। वे सब राक्षसियाँ कुपित हो वहाँ काँपती हुई सीता पर चारों ओर से टूट पड़ीं और अपने लम्बे एवं चमकीले ओठों को बारम्बार चाटने लगीं। उनका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वे सब-की-सब तुरंत हाथों में फर से लेकर बोल उठीं—’यह राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाने योग्य है ही नहीं। उस भयानक राक्षसियों के बारम्बार डाँटने और धमकाने पर सर्वांगसुन्दरी कल्याणी सीता अपने आँसू पोंछती हुई उसी अशोकवृक्ष के नीचे चली आयीं (जिसके ऊपर हनुमान जी छिपे बैठे थे)। विशाललोचना वैदेही शोक-सागर में डूबी हुई थीं। इसलिये वहाँ चुपचाप बैठ गयीं। किंतु उन राक्षसियों ने वहाँ भी आकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया। वे बहुत ही दुर्बल हो गयी थीं। उनके मुख पर दीनता छा रही थी और उन्होंने मलिन वस्त्र पहन रखा था। उस अवस्था में उन जनकनन्दिनी को चारों ओर खड़ी हुई भयानक राक्षसियों ने फिर धमकाना आरम्भ किया। तदनन्तर विनता नामकी राक्षसी आगे बढ़ी। वह देखने में बड़ी भयंकर थी। उसकी देह क्रोध की सजीव प्रतिमा जान पड़ती थी। उस विकराल राक्षसी के पेट भीतर की ओर धंसे हुए थे। वह बोली- सीते! तूने अपने पति के प्रति जितना स्नेह दिखाया है, इतना ही बहुत है। भद्रे ! अति करना तो सब जगह दुःख का ही कारण होता है । मिथिलेशकुमारी! तुम्हारा भला हो। मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि तुमने मानवोचित शिष्टाचार का अच्छी तरह पालन किया है। अब मैं भी तुम्हारे हित के लिये जो बात कहती हूँ, उसपर ध्यान दो उसका शीघ्र पालन करो। समस्त राक्षसोंका भरण-पोषण करनेवाले महाराज रावणको तुम अपना पति स्वीकार कर लो। वे देवराज इन्द्रके समान बड़े पराक्रमी तथा रूपवान् हैं।दीन-हीन मनुष्य राम का परित्याग करके सबसे प्रिय वचन बोलने वाले, उदार और त्यागी रावण का आश्रय लो।विदेहराजकुमारी! तुम आज से  समस्त लोकों की स्वामिनी बन जाओ और दिव्य अंगराग तथा दिव्य आभूषण धारण करो। शोभने! जैसे अग्नि की प्रिय पत्नी स्वाहा और इन्द्र की प्राणवल्लभा शची हैं, उसी प्रकार तुम रावण की प्रेयसी बन जाओ। विदेहकुमारी! श्रीराम तो दीन हैं। उनकी आयु भी अब समाप्त हो चली है। उनसे तुम्हें क्या मिलेगा!

  • सचेतन 2.59: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – राक्षसियों का सीताजी को समझाना

    जो स्त्री अपने से प्रेम नहीं करती, उसकी कामना करने वाले पुरुष के शरीर में केवल ताप ही होता है और अपने प्रति अनुराग रखने वाली स्त्री की कामना करने वाले को उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है।

    रावण ने विभिन्न राक्षसियों को अनुकूल-प्रतिकूल उपायों से, साम, दान और भेदनीति से तथा दण्ड का भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करने के लिए कहा। राक्षसियों को इस प्रकार बारम्बार आज्ञा देकर काम और क्रोध से व्याकुल हुआ राक्षसराज रावण जानकीजी की ओर देखकर गर्जना करने लगा। तदनन्तर राक्षसियों की स्वामिनी मन्दोदरी तथा धान्यमालिनी नाम वाली राक्षस-कन्या शीघ्र रावण के पास आयीं और उसका आलिंगन करके बोलीं- महाराज राक्षसराज! आप मेरे साथ क्रीडा कीजिये। इस कान्तिहीन और दीन-मानव-कन्या सीता से आपको क्या प्रयोजन है? महाराज! निश्चय ही देवश्रेष्ठ ब्रह्माजी ने इसके भाग्य में आपके बाहुबल से उपार्जित दिव्य एवं उत्तम भोग नहीं लिखे हैं।

    प्राणनाथ! जो स्त्री अपने से प्रेम नहीं करती, उसकी कामना करने वाले पुरुष के शरीर में केवल ताप ही होता है और अपने प्रति अनुराग रखने वाली स्त्री की कामना करने वाले को उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है।

    प्रेम सबसे उत्कृष्ट गुण या अच्छी आदत, सबसे गहरे पारस्परिक स्नेह से लेकर सबसे सरल आनंद तक, मजबूत और सकारात्मक भावनात्मक और मानसिक स्थितियों की एक श्रृंखला को शामिल करता है। प्यार को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों माना जाता है, इसका गुण मानवीय दया , करुणा और स्नेह का प्रतिनिधित्व करता है – “दूसरे की भलाई के लिए निःस्वार्थ, वफादार और परोपकारी चिंता” – और इसका गुण घमंड , स्वार्थ के समान मानवीय नैतिक दोष का प्रतिनिधित्व करता है। , शोक-प्रचार , और अहंभाव , संभावित रूप से लोगों को एक प्रकार के उन्माद , जुनूनीपन , या सह-निर्भरता की ओर ले जाता है ।

     जब राक्षसी ने ऐसा कहा और उसे दूसरी ओर वह हटा ले गयी, तब मेघ के समान काला और बलवान् राक्षस रावण जोर-जोर से हँसता हुआ महल की ओर लौट पड़ा। 

    अशोकवाटिका से प्रस्थित होकर पृथ्वी को कम्पितसी करते हुए दशग्रीव ने उद्दीप्त सूर्य के सदृश प्रकाशित होने वाले अपने भवन में प्रवेश किया।तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नागों की कन्याएँ भी रावण को सब ओर से घेरकर उसके साथ ही उस उत्तम राजभवन में चली गयीं। इस प्रकार अपने धर्म में तत्पर, स्थिरचित्त और भय से काँपती हुई मिथिलेशकुमारी सीता को धमकाकर काममोहित रावण अपने ही महल में चला गया। 

    शत्रुओं को रुलाने वाला राजा रावण सीताजी से पूर्वोक्त बातें कहकर तथा सब राक्षसियों को उन्हें वश में लाने के लिये आदेश दे वहाँ से निकल गया।अशोकवाटिका से निकलकर जब राक्षसराज रावण अन्तःपुर को चला गया, तब वहाँ जो भयानक रूप वाली राक्षसियाँ थीं, वे सब चारों ओर से दौड़ी हुई सीता के पास आयीं।विदेहकुमारी सीता के समीप आकर क्रोध से व्याकुल हुई उन राक्षसियों ने अत्यन्त कठोर वाणी द्वारा उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया- सीते! तुम पुलस्त्यजी के कुल में उत्पन्न हुए सर्वश्रेष्ठ दशग्रीव महामना रावण की भार्या बनना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं समझती? 

    तत्पश्चात् एकजटा नाम वाली राक्षसी ने क्रोध से लाल आँखें करके कृशोदरी सीता को पुकारकर कहा –विदेहकुमारी! पुलस्त्यजी छ: *प्रजापतियों में चौथे हैं और ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। इस रूप में उनकी सर्वत्र ख्याति है।
* मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु–ये छः प्रजापति हैं। 

    पुलस्त्यजी के मानस पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हैं। वे भी प्रजापति के समान ही प्रकाशित होते हैं।विशाललोचने! ये शत्रुओं के रुलाने वाले महाराज रावण उन्हीं के पुत्र हैं और समस्त राक्षसों के राजा हैं। तुम्हें इनकी भार्या हो जाना चाहिये। सर्वांगसुन्दरी! मेरी इस कही हुई बातका तुम अनुमोदन क्यों नहीं करती? 

    इसके बाद बिल्ली के समान भूरे आँखों वाली हरिजटा नाम की राक्षसी ने क्रोध से आँखें फाड़कर कहना आरम्भ किया—’अरी! जिन्होंने तैंतीसों* देवताओं तथा देवराज इन्द्र को भी परास्त कर दिया है, उन राक्षसराज रावण की रानी तो तुम्हें अवश्य बन जाना चाहिये।
* बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस देवता हैं।

    उन्हें अपने पराक्रम पर गर्व है। वे युद्ध से पीछे न हटने वाले शूरवीर हैं। ऐसे बल-पराक्रमसम्पन्न पुरुष की भार्या बनना तुम क्यों नहीं चाहती हो? महाबली राजा रावण अपनी अधिक प्रिय और सम्मानित भार्या मन्दोदरी को भी, जो सबकी स्वामिनी हैं, छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे। तुम्हारा कितना महान् सौभाग्य है। वे सहस्रों रमणियों से भरे हुए और अनेक प्रकार के रत्नों से सुशोभित उस अन्तःपुर को छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे (अतः तुम्हें उनकी प्रार्थना मान लेनी चाहिये)।

  • सचेतन 2.58: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – रावण आभूषणों से विभूषित होकर भी श्मशानचैत्य (मरघट में बने हुए देवालय)- की भाँति सीता जी को भयंकर प्रतीत होता था।

    विभिन्न राक्षसियों का अनुकूल-प्रतिकूल उपायों से, साम, दान और भेदनीति से तथा दण्ड का भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करना। 

    कल मैंने बात किया था की काम (प्रेम) बड़ा टेढ़ा होता है और जिसके प्रति आप जैसे भी बँध जाते हैं वैसे ही उसके प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है।रावण के मन में सीता के प्रति काम (प्रेम) तो विस्तृत बो रहा था जब की सीता हमेंशा रावण को धिक्कार करती रहती थी और अहसास दिलाती थी की वो मैं धर्मात्मा श्रीराम की धर्मपत्नी और महाराज दशरथ की पुत्रवधू हूँ। रावण को कहती थी की पापी ! मुझसे पाप की बातें करते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गल जाती है ? दशमुख रावण! मेरा तेज ही तुझे भस्म कर डालने के लिये पर्याप्त है। केवल श्रीराम की आज्ञा न होने से और अपनी तपस्या को सुरक्षित रखने के विचार से मैं तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ। मैं मतिमान् श्रीराम की भार्या हूँ, मुझे हर ले आने की शक्ति तेरे अंदर नहीं थी। निःसंदेह तेरे वध के लिये ही विधाता ने यह विधान रच दिया है। तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, कुबेर का भाई है और तेरे पास सेनाएँ भी बहुत हैं, फिर श्रीराम को छल से दूर हटाकर क्यों तूने उनकी स्त्री की चोरी की है? 

    पर्वत के समान विशालकाय राक्षसराज रावण अपनी दोनों परिपुष्ट भुजाओं से उसी प्रकार शोभा पा रहा था, मानो दो शिखरों से मन्दराचल सुशोभित हो रहा हो। प्रातःकाल के सूर्य की भाँति अरुण-पीत कान्तिवाले दो कुण्डल उसके कानों की शोभा बढ़ा रहे थे, मानो लाल पल्लवों और फूलों से युक्त दो अशोक वृक्ष किसी पर्वत को सुशोभित कर रहे हों। 

    वह अभिनव शोभा से सम्पन्न होकर कल्पवृक्ष एवं मूर्तिमान् वसन्त के समान जान पड़ता था। आभूषणों से विभूषित होने पर भी श्मशानचैत्य* (मरघट में बने हुए देवालय)-की भाँति भयंकर प्रतीत होता था। प्राचीनकाल में नगर की श्मशानभूमि के पास एक गोलाकार देवालय-सा बना रहता था, जहाँ राजा की आज्ञा से प्राणदण्ड के अपराधियों का जल्लादों के द्वारा वध कराया जाता था। जब वहाँ किसी को प्राणदण्ड देने का अवसर आता, तब उस देवालय को लीप-पोतकर फूलों की बन्दनवारों से सजाया जाता था। उस विभूषित श्मशानचैत्य को देखते ही लोग यह सोचकर भयभीत हो उठते थे कि आज यहाँ किसी के जीवन का अन्त होने वाला है। इस तरह जैसे वह श्मशानचैत्य विभूषित होने पर भी भयंकर लगता था, उसी प्रकार रावण सुन्दर शृङ्गार करके भी सीता को भयानक प्रतीत होता था; क्योंकि वह उनके सतीत्व को नष्ट करना चाहता था।

    रावण ने क्रोध से लाल आँखें करके विदेहकुमारी सीता की ओर देखा और फुफकारते हुए सर्प के समान लम्बी साँसें खींचकर कहा- अन्यायी और निर्धन मनुष्य का अनुसरण करने वाली नारी! जैसे सूर्यदेव अपने तेज से प्रातःकालिक संध्या के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार आज मैं तेरा विनाश किये देता हूँ।मिथिलेशकुमारी से ऐसा कहकर शत्रुओं को रुलाने वाले राजा रावण ने भयंकर दिखायी देने वाली समस्त राक्षसियों की ओर देखा। 

    राक्षस प्राचीन काल के प्रजाति का नाम है।राक्षस वह है जो आर्य व्यवहार ,व्यवस्था, विचार का शत्रु, विधान और मैत्री में विश्वास नहीं रखता और परायाधन परायी स्त्री व वस्तुओं को हडप करना चाहता है। मानव जाति के समाज को बरबाद करने में ही अपना यश मानने वाला तथा यज्ञकार्य का नाश करके ब्राह्मण वर्ण के युवकों के मांस का भक्षण करने वाला वर्ग राक्षस था। राक्षस दक्ष प्रजापति के वंशज थे। वे सुरसा के पुत्र थे जो स्वयं दक्ष प्रजापति की पुत्री हैं। कहते हैं की रावण ने रक्ष प्रथा या रक्ष पंथ की स्थापना की थी। रक्ष पंथ को मानने वाले गरीब, कमजोर, विकास के पीछे रह गए लोगों को साथ रखते और उनकी नही मानने वालो का भक्षण करते थे। रक्ष पंथ में मानने वाले भी राक्षस कहलाते थे। राक्षस को अक्सर बदसूरत, भयंकर दिखने वाले और विशाल प्राणियों के रूप में चित्रित किया गया था, और रावण ने तरह तरह के अतृप्त नरभक्षी के रूप में दिखाया देने वाले राक्षसियों से कहा- तुम सब लोग मिलकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करो।

    उसने एकाक्षी (एक आँखवाली), एककर्णा (एक कान वाली), कर्णप्रावरणा (लंबे कानों से अपने शरीर को ढक लेने वाली), गोकर्णी (गौके-से कानों वाली), हस्तिकर्णी (हाथी के समान कानों वाली), लम्बकर्णी (लम्बे कान वाली), अकर्णिका (बिना कान की), हस्तिपदी (हाथी के-से पैरों वाली), अश्वपदी (घोड़े के समान पैरवाली), गोपदी (गाय के समान पैरवाली), पादचूलिका (केशयुक्त पैरों वाली), एकाक्षी, एकपादी (एक पैर वाली), पृथुपादी (मोटे पैर वाली), अपादि का (बिना पैरों की), अतिमात्रशिरोग्रीवा (विशाल सिर और गर्दन वाली), अतिमात्रकुचोदरी (बहुत बड़े-बड़े स्तन और पेट वाली), अतिमात्रास्यनेत्रा (विशाल मुख और नेत्रवाली), दीर्घजिह्वानखा (लंबी जीभ और नखों वाली), अनासिका (बिना नाक की), सिंहमुखी (सिंह के समान मुखवाली), गोमुखी (गौ के समान मुखवाली) तथा सूकरीमुखी (सूकरी के समान मुखवाली)—इन सब राक्षसियों से कहा- ‘निशाचरियो ! तुम सब लोग मिलकर अथवा अलग-अलग शीघ्र ही ऐसा प्रयत्न करो, जिससे जनककिशोरी सीता बहुत जल्द मेरे वश में आ जाय। अनुकूल-प्रतिकूल उपायों से, साम, दान और भेदनीति से तथा दण्ड का भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करो।