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  • प्रार्थना का महत्व

    प्रार्थना क्या है?

    प्रार्थना एक आध्यात्मिक अभ्यास है जिसमें हम किसी उच्च शक्ति, ईश्वर, ब्रह्मांड, या अपनी आंतरिक आत्म से जुड़ने का प्रयास करते हैं। यह हमारी भावनाओं, विचारों, और इच्छाओं को व्यक्त करने का एक तरीका है। प्रार्थना आभार, क्षमा, मार्गदर्शन, या शांति के लिए हो सकती है।

    प्रार्थना का महत्व

    प्रार्थना के कई लाभ हैं, जिनमें शामिल हैं:

    • शांति और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार: अध्ययनों से पता चला है कि प्रार्थना तनाव, चिंता, और अवसाद को कम करने में मदद कर सकती है। यह आत्म-सम्मान और आशावाद को भी बढ़ा सकती है।
    • अर्थ और उद्देश्य की भावना: प्रार्थना हमें जीवन में अर्थ और उद्देश्य की भावना प्रदान कर सकती है। यह हमें हमारे मूल्यों से जुड़ने और एक बड़ी चीज से जुड़ने में मदद कर सकती है।
    • कठिन परिस्थितियों से निपटने में मदद: प्रार्थना हमें कठिन परिस्थितियों से निपटने और चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्रदान कर सकती है। यह हमें आशा और साहस दे सकती है।
    • रिश्तों में सुधार: प्रार्थना हमें दूसरों के साथ मजबूत संबंध बनाने में मदद कर सकती है। यह हमें करुणा, सहानुभूति, और क्षमा की भावना विकसित करने में मदद कर सकती है।
  • प्रार्थना कैसे करें?

    प्रार्थना करने का कोई एक सही तरीका नहीं है। यह एक व्यक्तिगत अनुभव है जो आपकी अपनी मान्यताओं और आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।

    यहां कुछ सुझाव दिए गए हैं जो आपको प्रभावी ढंग से प्रार्थना करने में मदद कर सकते हैं:

    • एक शांत जगह ढूंढें: जहां आप बिना किसी रुकावट के प्रार्थना कर सकें।
    • एक आरामदायक स्थिति में बैठें या लेटें: अपनी आँखें बंद करें और गहरी सांस लें।
    • अपने मन को शांत करें: कुछ मिनटों के लिए ध्यान करें और अपने विचारों को शांत करें।
    • अपने दिल को खोलें: ईश्वर, ब्रह्मांड, या अपनी आंतरिक आत्म से बात करें।
    • अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करें: ईमानदार और खुले रहें।
    • आभार व्यक्त करें: उन सभी चीजों के लिए धन्यवाद जिनके लिए आप आभारी हैं।
    • क्षमा मांगें: यदि आपने किसी को चोट पहुंचाई है तो क्षमा मांगें।
    • मार्गदर्शन और सहायता के लिए पूछें: यदि आपको इसकी आवश्यकता है तो मार्गदर्शन और सहायता के लिए पूछें।
    • शांति और प्रेम के लिए प्रार्थना करें: अपने लिए, अपने प्रियजनों के लिए, और पूरी दुनिया के लिए शांति और प्रेम की प्रार्थना करें।
    • विश्वास रखें: विश्वास रखें कि आपकी प्रार्थना सुनी जा रही है।
  • सचेतन 2.103 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – प्रार्थना से तीखी लपटोंवाले अग्निदेव शान्तभाव से जलने लगे

    “हनुमान जी की लंका में लीला”

    नमस्कार श्रोताओं! स्वागत है आपका “धर्म कथाएं” सचेतन के इस विचार के सत्र में। आज हम एक ऐसी कथा सुनाने जा रहे हैं जिसमें हनुमान जी के अद्वितीय पराक्रम और उनकी भक्ति का वर्णन है। ये वो समय है जब हनुमान जी ने लंका में प्रवेश किया और सीता माता से भेंट की। तो आइए, इस अद्भुत कथा की यात्रा शुरू करते हैं।

    हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर राक्षसों ने उन्हें नगर में घुमाना शुरू किया। मृगनयनी सीता माता ने जब इस दृश्य को देखा, तो उनकी प्रार्थना से तीखी लपटोंवाले अग्निदेव शान्तभाव से जलने लगे, मानो वे हनुमान के मंगल की सूचना दे रहे हों। अग्नि की शिखाएं मानो प्रदक्षिणा कर रही थीं।

    हनुमान जी के पिता वायुदेवता भी उस समय शीतल और सुखद बर्फीली हवा के समान बहने लगे, मानो वे देवी सीता के लिये स्वास्थ्यकारी हों।

    उधर, पूँछ में आग लगाये जाने पर हनुमान जी सोचने लगे…

    हनुमान जी (सोचते हुए) बोले अहो! यह आग सब ओर से प्रज्वलित होने पर भी मुझे जलाती क्यों नहीं है? इसमें इतनी ऊँची ज्वाला उठती दिखायी देती है, फिर भी यह मुझे पीड़ा नहीं दे रही। ऐसा लगता है जैसे मेरी पूँछ के अग्रभाग में बर्फ का ढेर-सा रख दिया गया हो।

    हनुमान जी को याद आया कि श्रीराम के प्रभाव से समुद्र लांघते समय सागर में पर्वत का प्रकट होना भी आश्चर्यजनक था। तो क्या अग्निदेव भी श्रीराम के उपकार के लिये शीतलता नहीं प्रकट करेंगे?

    निश्चय ही भगवती सीता की दया, श्रीरघुनाथ जी के तेज तथा वायुदेवता की मैत्री के प्रभाव से अग्निदेव हनुमान जी को जला नहीं रहे थे।

    तदनन्तर, महाकपि हनुमान ने सोचा…

    मेरे जैसे पराक्रमी पुरुष का यहाँ इन नीच निशाचरों द्वारा बाँधा जाना कैसे उचित हो सकता है? मुझे अवश्य इसका प्रतिकार करना चाहिए।

    हनुमान जी ने अपने बंधनों को तोड़ा और बड़े वेग से ऊपर उछले। गर्जना करते हुए वे पर्वत-शिखर के समान ऊँचे नगरद्वार पर पहुँच गए, जहाँ राक्षसों की भीड़ नहीं थी।

    हनुमान जी ने पर्वताकार होते हुए भी क्षणभर में बहुत छोटे और पतले हो कर अपने सारे बन्धनों को निकाल फेंका। बन्धनों से मुक्त होते ही वे फिर पर्वत के समान विशालकाय हो गए।

    उन्होंने जब इधर-उधर दृष्टि डाली, तो फाटक के सहारे रखा हुआ एक काले लोहे का परिघ दिखायी दिया। महाबाहु पवनपुत्र ने उस परिघ को लेकर वहाँ के समस्त रक्षकों को फिर मार गिराया।

    राक्षसों को मारकर रणभूमि में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले हनुमान जी पुनः लंकापुरी का निरीक्षण करने लगे। जलती हुई पूँछ से जो ज्वालाओं की माला-सी उठ रही थी, उससे अलंकृत हुए वे वानरवीर तेजःपुञ्ज से देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे थे।

    इस अद्भुत कथा को सुनने के लिए आपका धन्यवाद। “प्रकाश की गूंज” में हम फिर मिलेंगे एक नई आध्यात्मिक यात्रा के साथ। तब तक, ज्ञान और धैर्य की राह पर चलते रहें।

    हनुमान जी ने अंततः समुद्र पार कर लंका से वापस लौटने का निर्णय लिया और सीता माता के संदेश को श्रीराम तक पहुँचाया। उनकी इस वीरता और साहस की कथा आज भी हमारे दिलों में जीवित है।

    तो दोस्तों, यह थी हनुमान जी की वीरता की एक झलक। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलने वाले को किसी भी परिस्थिति में हार नहीं माननी चाहिए। आशा है, आपको यह कथा पसंद आई होगी। 

    श्रोताओं, यह थी हनुमान जी की लंका में लीला की अद्भुत कथा। उनके पराक्रम और भक्ति ने हमें सिखाया कि सच्चे भक्त और वीर को कोई भी बंधन रोक नहीं सकता। अगले एपिसोड में हम एक और रोचक कहानी लेकर आएंगे। तब तक के लिए, नमस्कार!

  • सचेतन 2.102 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – राक्षसों द्वारा हनुमान जी की पूँछ में आग लगाना और उनका प्रतिकार

    हनुमान जी और लंका में पूंछ में आग की कथा

    नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका “धार्मिक कथाएँ” सचेतन के इस विचार के सत्र में। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं रामायण की एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक कथा – “राक्षसों द्वारा हनुमान जी की पूँछ में आग लगाना और उनका प्रतिकार।” तो चलिए, इस रोचक कथा की ओर बढ़ते हैं।

    राक्षसों का हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाना एक प्रसिद्ध घटना है, जिसे सुनकर हर कोई हनुमान जी की वीरता और साहस का प्रशंसक बन जाता है। कथा का आरंभ होता है जब हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका पहुँचते हैं और उन्हें रावण की अशोक वाटिका में पाते हैं।

    शांत और गहरी भावना चारों ओर थी, हनुमान जी को बंदी बना लिया गया और उन्हें रावण के सामने प्रस्तुत किया गया। रावण का छोटा भाई महात्मा विभीषण, जो धर्म और नीति का पालन करता था, ने रावण से कहा कि दूत का वध करना अनुचित है। रावण ने विभीषण की बात मानी और कहा, ‘तुम्हारा कहना ठीक है। दूत का वध नहीं करना चाहिए, परंतु इसे दंड अवश्य दिया जाना चाहिए। वानरों को अपनी पूंछ बहुत प्रिय होती है। अतः इसकी पूँछ में आग लगा दो।

    रावण की आज्ञा से राक्षसों ने हनुमान जी की पूँछ में पुराने सूती कपड़े लपेट दिए और उस पर तेल छिड़ककर आग लगा दी। जैसे ही आग लगी, हनुमान जी का शरीर विशाल हो गया, और वे क्रोध से भर उठे। उनका मुख प्रातःकाल के सूर्य की भाँति तेजस्वी हो गया और वे जलती हुई पूँछ से ही राक्षसों को पीटने लगे।

    हनुमान जी ने अपनी जलती हुई पूँछ से राक्षसों को मारा, परंतु राक्षसों ने उन्हें पुनः कसकर बाँध दिया। यह देख समस्त निशाचर प्रसन्न हो गए। वीरवर हनुमान जी ने विचार किया, ‘यद्यपि मैं बँधा हुआ हूँ, तो भी इन राक्षसों का मुझपर जोर नहीं चल सकता। मैं बन्धनों को तोड़कर ऊपर उछल जाऊँगा और इन्हें मारूँगा। मैं श्रीराम के हित के लिए यहाँ आया हूँ, तो भी ये दुरात्मा राक्षस मुझे बाँध रहे हैं। इससे मैं जो कुछ कर चुका हूँ, उसका बदला नहीं पूरा हुआ है।

    हनुमान जी ने अपने बल और बुद्धि का प्रयोग करते हुए बन्धनों को तोड़ दिया और पूरी लंका में आग लगा दी। लंका की हर गली और घर में आग फैल गई, और राक्षसों में हाहाकार मच गया। हनुमान जी ने अपनी पूँछ की आग से लंका को जलाकर रावण के अहंकार को धूल में मिला दिया।

    यह हनुमान जी और लंका में पूंछ में आग की कथा है यह “प्रकाश की गूंज” और भगवान हनुमान जी की उस अद्भुत कथा है, जब लंका में राक्षसों ने उनकी पूंछ में आग लगा दी थी। 

    यह वह समय था जब हनुमान जी लंका में देवी सीता की खोज में लगे थे। उन्होंने रावण के अद्भुत महल और लंका की विशाल संरचना का अवलोकन किया था। लेकिन जब राक्षसों ने उन्हें पकड़ा और उनकी पूंछ में आग लगाने का निर्णय लिया, तो हनुमान जी ने सोचा…

    मैं युद्धस्थल में अकेला ही इन समस्त राक्षसों का संहार करने में पूर्णतः समर्थ हूँ, किंतु इस समय श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिये मैं ऐसे बन्धन को चुपचाप सह लूँगा। ऐसा करने से मुझे पुनः समूची लंका में विचरने और इसके निरीक्षण करने का अवसर मिलेगा; क्योंकि रात में घूमने के कारण मैंने दुर्ग रचना की विधि पर दृष्टि रखते हुए इसका अच्छी तरह अवलोकन नहीं किया था। अतः सबेरा हो जाने पर मुझे अवश्य ही लंका देखनी है। भले ही ये राक्षस मुझे बारंबार बाँधे और पूँछ में आग लगाकर पीड़ा पहुँचायें। मेरे मन में इसके कारण तनिक भी कष्ट नहीं होगा।

    और फिर क्या था, राक्षसों ने हनुमान जी को पकड़कर उनकी पूंछ में आग लगा दी और उन्हें लंका नगरी में घुमाने लगे। वे शंख और भेरी बजाकर हनुमान जी के अपराधों की घोषणा करते हुए उन्हें शहर में घुमा रहे थे।

    शत्रुदमन हनुमान जी बड़ी मौज से आगे बढ़ने लगे। समस्त राक्षस उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। महाकपि हनुमान् जी राक्षसों की उस विशाल पुरी में विचरते हुए उसे देखने लगे। उन्होंने वहाँ बड़े विचित्र विमान देखे। परकोटे से घिरे हुए कितने ही भूभाग, पृथक्-पृथक् बने हुए सुन्दर चबूतरे, घनीभूत गृहपंक्तियों से घिरी हुई सड़कें, चौराहे, छोटी-बड़ी गलियाँ और घरों के मध्यभाग—इन सबको वे बड़े गौर से देखने लगे। सब राक्षस उन्हें चौराहों पर, चार खंभेवाले मण्डपों में तथा सड़कों पर घुमाने और जासूस कहकर उनका परिचय देने लगे।

    इस बीच, लंका की राक्षसियों ने सीता जी को जाकर यह अप्रिय समाचार दिया कि हनुमान जी की पूंछ में आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाया जा रहा है। यह सुनकर सीता जी शोक में डूब गईं और अग्निदेव की उपासना करने लगीं।

    सीता जी (शांत और दृढ़ स्वर) कहती हैं अग्निदेव! यदि मैंने पति की सेवा की है और यदि मुझमें कुछ भी तपस्या तथा पातिव्रत्य का बल है तो तुम हनुमान के लिये शीतल हो जाओ। यदि बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम के मन में मेरे प्रति किंचिन्मात्र भी दया है अथवा यदि मेरा सौभाग्य शेष है तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ। यदि धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी मुझे सदाचार से सम्पन्न और अपने से मिलने के लिये उत्सुक जानते हैं तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ। यदि सत्यप्रतिज्ञ आर्य सुग्रीव इस दुःख के महासागर से मेरा उद्धार कर सकें तो तुम हनुमान् के लिये शीतल हो जाओ।

    और सचमुच, सीता जी की पवित्रता और उनकी प्रार्थना के बल से अग्निदेव हनुमान जी की पूंछ के लिए शीतल हो गए। हनुमान जी की पूंछ में जलते हुए भी उन्हें कोई कष्ट नहीं हुआ और उन्होंने लंका को जलाने का निर्णय लिया।

    हनुमान जी ने अपनी पूंछ को लहराते हुए लंका में आग लगा दी। जल्द ही पूरी लंका धधक उठी, और राक्षसों का नगर जलने लगा।

    इस प्रकार, हनुमान जी ने अपनी शक्ति और बुद्धिमता का परिचय दिया और लंका को जलाकर रावण को संदेश दिया कि श्रीरामचन्द्रजी की शक्ति अपरमित है। यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए धैर्य, साहस और बुद्धिमता का मार्ग अपनाना चाहिए।