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सचेतन 182: श्री शिव पुराण- आशा ही जीवन है

यह भी बीत जाएगा 

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सचेतन 181: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- नरक की कल्पना

पाप या अपराध का दंड ज़रूर मिलता है पाप या गुनाह या सामान्य भाषा में कहे तो बुरे कार्यों कई प्रकर के होते हैं जैसे  हिंसा किसी जीव को मारना,उसे दुख देना हिंसा हैं, असत्य झूठ बोलना, चोरी किसी वस्तु को बिना आज्ञा ग्रहण करना,चुराना, कुशील व्यभिचार रूप गलत कार्यों को करना यहाँ तक की…

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सचेतन 180: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- समय जब अनुकूल नहीं हो तो मनुष्य प्रायः पाप या गुनाह कर लेते हैं

अनुकूलता आपका सर्वस्व बन जाये तो आप सब कुछ कर सकते हैं  समर्पण करने से हमारे अहंकार समाप्त हो जाते हैं और हम सामाजिक कल्याण हेतु उपयुक्त भी बन जाते हैं। समर्पण से ही किसी का विश्वास अर्जित किया जा सकता है। इसी विश्वास से प्राय: हम जीवन के सबसे अमूल्य अवसर प्राप्त करते हैं।…

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सचेतन 179: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- समर्पण जीवन का आवश्यक भाव है।

लघुता से प्रभुता मिले!  पूर्व कालीन दृष्टान्तों पर विचार करो— अपने शरीर की हड्डियों से वज्र बनाने के लिये दधीचि ऋषि ने जब स्वयं अपने को प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र को समर्पण कर दिया था, तब क्या उन्हें कष्ट हुआ था? नहीं। उन्होंने अपना जीवन त्याग दिया ताकि उनकी हड्डियों का उपयोग वज्र के निर्माण के…

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सचेतन 178: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दुःख और सुख- सृष्टि का नियम है

सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए! सच पूछो तो सुख और दुःख दोनों पर ही तुम्हारी सत्ता है। सत्ता द्वारा ही तुम उनमें से जो चाहो सो ग्रहण कर सकते हो। यह इच्छा योग्य नहीं कि हमें कभी दुःख मिले ही नहीं, किन्तु दुःख से सुख किस प्रकार उत्पन्न करना होता है इस कला की सामर्थ्य प्राप्त…

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सचेतन 177: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- सुख और दुख दोनों आपके पास है

क्या हमें कभी भी दुःखी होना चाहिए?  द्वेष करने से ही दुःख का साक्षात्कार होता है।     हम अनुकूलता या प्रतिकूलता की भावना को इन्द्रिय और नके विषय से महसूस करते हैं। इन्द्रिय यानी हमारे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण और उनके विषय यानी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।  यानी जब हमारी इन्द्रिय के…

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सचेतन 176: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- द्वेष करने से ही दुःख का साक्षात्कार होता है

 हम कब अनुकूलता या प्रतिकूलता की भावना को महसूस करते हैं? कभी भी किसी जन या पुरुष, देवता, ब्राह्मण और पितृगण से द्वेष करना पाप कहलाता है। द्वेष यानी चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति जैसे चिढ़, शत्रुता, वैर या फिर यूँ कहें की  द्वेष वह भाव है जब दुःख का साक्षात्कार होता है। दुःख…

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सचेतन 175: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- तुला-पुरुष दान का महत्व

सत्यभामा ने श्री कृष्ण को देवर्षि नारद को दान में दे दिया था  ब्राह्मणों को तथा पीड़ित याचकों को संकल्पपूर्वक धनादि वस्तुओं का दान करता है, उससे दाता मनस्वी बन जाता है यानी बुद्धिमान, समझदार, समझदार, स्व-नियंत्रित हो जाता है। लोक यानी समाज में जो-जो अत्यन्त अभीष्ट और प्रिय है, वह यदि घर में हो…

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सचेतन 174: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- सुख बांटने का जरिया है दान

सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया शान्ति पाठ के रूप में आप सभी ने सुना होगा “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः”  अर्थ – “सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः”।…

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सचेतन 173 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दान के लिए विवकेशीलता ज़रूरी है 

दान का उद्देश्य सामाजिक कल्याण होना चाहिए संकल्प पूर्वक कायिक, वाचिक और मानसिक रूप से दान देने का महात्म है। कहते हैं की जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी, अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे वैसी ही मूरत नज़र आती है।यहाँ दान की देने या लेने की भावना ही हमारा दृष्टिकोण…