सुगमता
82विवेकचूड़ामणि · कड़ी 84 / 85

सचेतन — 82 वासना- "जानने के बाद भी — पुरानी आदत क्यों खींचती है?"

1 अक्टूबर 2026 · विवेकचूड़ामणि

नमस्कार।
पिछले अध्याय में भावना की माला पूरी हुई — "वह ब्रह्म मैं ही हूँ।"
पर आज शास्त्र एक ऐसी बात कहता है — जो बहुत ईमानदार है। और बहुत ज़रूरी।
शास्त्र कहता है —
"आत्मा का ज्ञान हो जाने पर भी... एक चीज़ फिर भी खींचती रहती है।"
अरे! ज्ञान के बाद भी?
हाँ। और उस चीज़ का नाम है — वासना।
यानी — पुरानी आदत की खिंचावट।
आज से नया अध्याय — वासना-त्याग।
पहले समझिए — यह होता क्या है
हमारे विद्यालय की एक सच्ची सी कहानी सुनिए।
एक बच्चा साइकिल सीख रहा था। पीछे दो छोटे सहारे वाले पहिए लगे थे।
महीनों उन्हीं के भरोसे चलाया।
फिर एक दिन शिक्षक ने पहिए खोल दिए। और कहा —
"अब तुम अपने आप चला सकते हो। संतुलन तुम्हारे भीतर आ चुका है।"
बच्चे ने समझ लिया। बात सच भी थी।
पर जैसे ही साइकिल पर बैठा —
शरीर अपने आप पुराने ढंग से झुकने लगा! हाथ डगमगाए। मन घबराया —
"पहिए नहीं हैं! मैं गिर जाऊँगा!"
अब सोचिए — ज्ञान तो हो गया था न? पहिए हट गए — यह भी पता था।
फिर घबराहट क्यों?
क्योंकि महीनों की आदत शरीर में बैठी थी। वह एक दिन में नहीं गई।
शिक्षक ने क्या किया? — डाँटा नहीं। बस रोज़ दौड़ाया।
और हफ़्ते भर में — आदत ढीली पड़ गई। बच्चा हवा से बातें करने लगा!
यही वासना है।
सच जान लेने के बाद भी — पुराने ढंग की खिंचावट।
शास्त्र की ईमानदारी
श्लोक २६८ यही कहता है —
आत्म-वस्तु जान लेने पर भी — यह अनादि वासना बड़ी बलवती है।
वह बार-बार पुराना राग अलापती है —
"मैं कर्ता हूँ... मैं भोक्ता हूँ... मैंने किया... मुझे मिला... मेरा गया..."
रोज़ की ज़िंदगी में देखिए —
सत्संग में सुन आए — "मैं शरीर नहीं।" सिर हिलाया। बात जँची।
और घर पहुँचते ही किसी ने ज़रा सा ताना मारा —
भीतर आग! "मुझे कहा? मेरा अपमान?"
कहाँ गया ज्ञान? — कहीं नहीं गया। पर पुरानी आदत जन्मों की है — वह एक सुनने से नहीं जाती।
यह विज्ञान भी हम रोज़ देखते हैं —
पंखे का बटन बंद कर दो — पंखा फिर भी कुछ देर घूमता रहता है।
बिजली कट गई — पर पुराना घुमाव बाक़ी है।
वासना वही पुराना घुमाव है। बटन बंद हो चुका — घूमना धीरे-धीरे थमेगा।
तो निराश हों? — बिल्कुल नहीं!
यहीं इस श्लोक की सबसे सुंदर बात है। ध्यान से सुनिए।
मुनियों ने मुक्ति किसे कहा?
कोई चमत्कार? कोई बिजली सी कौंध? आसमान से रोशनी?
नहीं। श्लोक के शब्द हैं —
"वासना का क्षीण होते जाना — यही मुक्ति है।"
यानी मुक्ति कोई एक दिन की घटना नहीं — रोज़ की ढलान है!
जिस दिन ताने पर आग ज़रा कम भड़की — उस दिन आप ज़रा और मुक्त हुए!
जिस दिन "मेरा-मेरा" की पकड़ ज़रा ढीली हुई — उस दिन ज़रा और।
हमारे विद्यालय में हम यही तो कहते हैं —
छोटा कदम भी कदम है। आज कल से बेहतर — बस यही जीत है।
शास्त्र भी वही कह रहा है। कैसी प्यारी बात!
और उपाय?
श्लोक २६९–२७० उपाय भी दे देते हैं — दो पंक्तियों में।
पहला — देह-इंद्रियों में जो "मैं-मेरा" चिपका है — उसे आत्मनिष्ठा से हटाते चलो।
यानी — रोज़ अपने ठिकाने लौटो। "मैं देखने वाला हूँ।"
दूसरा — जब भी पुरानी आदत खींचे, एक सच्ची डोर पकड़ लो —
"सोऽहम्" — वह मैं हूँ।
जैसे साइकिल डगमगाए, तो शिक्षक की आवाज़ याद आती थी — "संतुलन तुम्हारे भीतर है!"
वैसे मन डगमगाए, तो यह आवाज़ — "वह मैं हूँ। कर्ता-भोक्ता की आदत पुरानी है — मैं नहीं।"
आज का अभ्यास
आज एक बहुत कोमल अभ्यास।
जब भी आज पुरानी आदत खींचे — गुस्सा, "मेरा-मेरा", कोई डर —
अपने आप को डाँटिए मत।
मुस्कुराकर कहिए —
"अरे... पंखा अभी घूम रहा है। बटन तो बंद हो चुका।"
"यह जन्मों की आदत है — आज ज़रा कम, कल और कम।"
"सोऽहम्... वह मैं हूँ।"
अपने आप से वैसा ही धीरज रखिए — जैसा उस साइकिल सीखते बच्चे से रखा जाता है।
आखिरी बात
ज्ञान के बाद भी आदत खींचती है — यह हार नहीं, नियम है।
और मुक्ति एक झटके की घटना नहीं —
वासना की रोज़ ढलती हुई ढलान है।
अगली कड़ी में शास्त्र गिनाएगा — तीन सबसे मोटी बेड़ियाँ।
और पहली बेड़ी का नाम सुनकर आप चौंकेंगे —
"लोग क्या कहेंगे!"
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए।
नमस्कार। 🙏
याद रखिए
✅ वासना = सच जान लेने के बाद भी पुराने ढंग की खिंचावट — सहारे-पहिए हटे, पर हाथ डगमगाते हैं ✅ बटन बंद होने पर भी पंखा कुछ देर घूमता है — जन्मों की आदत एक सुनने से नहीं जाती ✅ मुनियों की परिभाषा — वासना का क्षीण होना ही मुक्ति: यह घटना नहीं, रोज़ की ढलान है ✅ आज कल से ज़रा कम भड़के — तो आज आप ज़रा और मुक्त हुए ✅ उपाय — आत्मनिष्ठा में लौटना, और डगमगाते ही डोर पकड़ना: "सोऽहम् — वह मैं हूँ"
🙏 अपने आप से वही धीरज रखिए — जो साइकिल सीखते बच्चे से रखते हैं।

श्लोक (मूल आधार)
श्लोक २६८ — आत्म-वस्तु का ज्ञान हो जाने पर भी "मैं कर्ता-भोक्ता हूँ" रूप से दृढ़ यह अनादि, बलवती वासना संसार का कारण बनी रहती है; अंतर्मुख दृष्टि से आत्मस्वरूप में स्थित होकर उसे प्रयत्नपूर्वक दूर करना चाहिए। वासना की क्षीणता को ही मुनियों ने मुक्ति कहा है।
श्लोक २६९ — देह-इंद्रिय आदि अनात्म-वस्तुओं में जो "अहं-मम" भाव है — यही अध्यास है; विद्वान इसे आत्मनिष्ठा से दूर करे।
श्लोक २७० — अपने प्रत्यगात्मा को बुद्धि और उसकी वृत्तियों का साक्षी जानकर, "सोऽहम्" (वह मैं हूँ) — इस सद्वृत्ति से अनात्म में फैली आत्मबुद्धि का त्याग कर।