सचेतन — 81 "सेना के बीच राजा — और हथेली का पानी"
नमस्कार।
भावना की माला आज पूरी होती है।
पिछली कड़ी में मोती मिले — चिप्पियों से परे, लहरों से परे, बिना लहर का सरोवर।
आज अंतिम मोती। और फिर —
माला पहनने की विधि।
और अंत में एक वचन — जो सुनकर हृदय भर आता है।
सोने का मोती
श्लोक २६३ माला का सबसे चमकीला मोती है। सुनार की दुकान फिर याद कीजिए।
सोना — कभी कंगन दिखता है, कभी हार, कभी झुमका।
नाम बदलते हैं। रूप बदलते हैं। दाम तक बदलते हैं!
पर सोना?
सोना अपनी ओर से कभी नहीं बदला।
कंगन गलाओ — सोना वही। हार तोड़ो — सोना वही।
श्लोक कहता है —
वह सत् भी ऐसा ही है — स्वयं सदा निर्विकार; पर भ्रम से अनेक नाम-रूप-गुण बनकर भासता है।
वह सोना — तू ही है। ऐसी भावना कर।
तो अब जब जीवन के रूप बदलें — बचपन जाए, जवानी ढले, हालात पलटें —
धीरे से याद कर लीजिए —
"गहने बदल रहे हैं... सोना नहीं।"
अब — माला पहनने की विधि
श्लोक २६५ बहुत ज़रूरी बात कहता है।
शास्त्र कहता है — यह सब सिर्फ़ मेरे कहने से मत मान।
"अपनी बुद्धि से, युक्तियों से, स्वयं विचार कर।"
देखिए — यह हमारी परंपरा की सबसे बड़ी शान है।
जैसे कक्षा में अच्छा शिक्षक कहता है — "रटो मत। सवाल हल करके देखो। खुद जाँचो।"
वैसे शास्त्र कहता है — जाँचो। परखो। तर्क से कसो।
और जब खुद जाँच लोगे — तब जो बोध होगा, वह कैसा होगा?
श्लोक का शब्द सुनिए — "कर-अम्बु-वत्" —
"हथेली में रखे पानी जैसा।"
ज़रा सोचिए — हथेली का पानी!
न किताब में छपा हुआ। न किसी और की गवाही। न दूर का वादा।
अपनी हथेली में। आँखों के सामने। छलकता हुआ। अपना।
याद है — मन शुद्ध होने पर मुक्ति हथेली के आँवले जैसी थी?
अब बोध हथेली के पानी जैसा।
शास्त्र बार-बार हथेली की ओर क्यों इशारा करता है?
क्योंकि वह कहना चाहता है — सत्य दूर नहीं है। वह तुम्हारे हाथ में है।
सेना के बीच राजा
और अब श्लोक २६६ — इस अध्याय का सबसे सुंदर चित्र।
एक राजा युद्ध के मैदान में है।
चारों ओर सेना — हाथी, घोड़े, रथ, हज़ारों सैनिक। धूल। शोर। हलचल।
और बीच में — राजा।
अब बताइए —
क्या राजा सेना के बीच है? — हाँ।
क्या राजा सेना है? — नहीं!
सेना घटती-बढ़ती है — राजा वही।
सैनिक बदलते हैं — राजा वही।
और सबसे बड़ी बात — सारी सेना जिसके लिए है — वह राजा है। पर राजा सेना में गिना नहीं जाता।
शास्त्र कहता है —
यह शरीर — हड्डी, मांस, साँस, मन, बुद्धि — यह पूरा संघात एक सेना है।
और उसके बीच विराजमान स्वयं-प्रकाश तत्व — राजा।
हमारे विद्यालय के बच्चों के लिए इससे प्यारी बात क्या होगी —
किसी की सेना में हाथी कम हैं, किसी के घोड़े धीमे हैं, किसी का रथ पुराना है —
पर राजा? — हर सीने में एक जैसा। पूरा। महाराजा।
सेना से राजा की क़ीमत मत आँकिए — अपनी भी नहीं, किसी और की भी नहीं।
राजा की तरह रहिए — सेना के बीच, सेना का काम लेते हुए —
पर यह जानते हुए — मैं सेना नहीं, राजा हूँ।
और अंतिम वचन — फिर लौटना नहीं
श्लोक २६७ इस अध्याय को एक वचन के साथ पूरा करता है।
वह परब्रह्म कहाँ विराजमान है? — बुद्धि की गुफा में।
यानी कहीं दूर पहाड़ों की गुफा में नहीं —
आपके भीतर की गुफा में। सबसे पास। हृदय के भी भीतर।
और वचन यह है —
"जो इस गुफा में उससे एक होकर रहना सीख जाता है —
उसका फिर शरीर की गुफा में प्रवेश नहीं होता।"
यानी — जन्म-मरण का चक्कर पूरा।
जैसे पका फल डाल से उतरकर फिर डाल पर नहीं लौटता —
जैसे जागा हुआ उसी सपने में फिर नहीं गिरता —
वैसे जो अपने सच में ठहर गया — वह फिर भटकता नहीं।
घर पहुँच गया। सदा के लिए।
आज का अभ्यास
आज का अभ्यास — राजा की बैठक।
दिन में एक बार, दो मिनट, सीधे बैठिए। जैसे सिंहासन पर।
और धीरे-धीरे भावना कीजिए —
"यह शरीर मेरी सेना है — मैं इसका ध्यान रखूँगा।"
"यह मन मेरा सिपाही है — मैं इसे प्रेम से सिखाऊँगा।"
"पर मैं? — मैं सेना नहीं। मैं बीच में विराजमान राजा हूँ।"
"निर्विकार। स्वयं-प्रकाश। वह ब्रह्म — मैं ही हूँ।"
और फिर उठकर, उसी शान से, दिन का काम कीजिए।
राजा की तरह — शांत, प्रेम से, बिना डरे।
आखिरी बात
ब्रह्म-भावना का अध्याय पूरा हुआ। एक साँस में —
गहने बदलते हैं — सोना नहीं।
बोध कैसा हो? — हथेली के पानी जैसा — जाँचा हुआ, अपना।
आप कौन हैं? — सेना के बीच राजा।
और वचन? — जो अपने सच में ठहर गया — वह फिर नहीं भटकता।
बस एक ही काम बाकी है — रोज़ का पानी। रोज़ की भावना।
"वह ब्रह्म — मैं ही हूँ।"
यह था सचेतन।
अपने आप को पहचानिए — और पहचान में ठहर जाइए।
नमस्कार। 🙏
श्लोक (मूल आधार)
श्लोक २६१ — जो एक होकर भी अनेकों का कारण है, अन्य सब कारणों का निषेध करने वाला है, पर स्वयं कार्य-कारण भाव से परे है — वह ब्रह्म तू ही है, ऐसी भावना कर।
श्लोक २६२ — जो निर्विकल्प, महान, अविनाशी है; क्षर (शरीर) और अक्षर (जीव) से विलक्षण है; नित्य, अव्यय आनंदस्वरूप और निष्कलंक है — वह ब्रह्म तू ही है, ऐसी भावना कर।
श्लोक २६३ — जो स्वयं सदा निर्विकार है — सोने के समान — पर भ्रम से नाना नाम, रूप, गुण और विकारों के रूप में भासता है — वह ब्रह्म तू ही है, ऐसी भावना कर।
श्लोक २६४ — जो अनपर (जिससे परे कोई नहीं) रूप से प्रकाशमान, पर से भी परे, प्रत्यक्, एकरस, सबका अंतरात्मा, सच्चिदानंदस्वरूप, अनंत और अव्यय है — वह ब्रह्म तू ही है, ऐसी भावना कर।
श्लोक २६५ — इस कहे हुए विषय को प्रसिद्ध युक्तियों द्वारा अपनी बुद्धि से स्वयं विचार; इससे हथेली के जल के समान संशय-रहित तत्त्वबोध हो जाएगा।
श्लोक २६६ — सेना के बीच राजा के समान, इस शरीर-संघात के मध्य स्थित स्वयं-प्रकाश विशुद्ध तत्त्व (बोधमात्र) को जानकर, सदा उसी रूप से अपने स्वरूप में स्थित रह और सम्पूर्ण दृश्य को ब्रह्म में लीन कर।
श्लोक २६७ — वह सत्-असत् से विलक्षण, अद्वितीय, सत्य परब्रह्म बुद्धिरूपी गुफा में विराजमान है; जो इस गुफा में उससे एकरूप होकर रहता है, उसका फिर शरीररूपी गुफा में प्रवेश नहीं होता — वह फिर जन्म नहीं लेता।
