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सचेतन 2.60: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – स्वामी ही गुरु हैं, और उनमें ही अनुरक्तता होना चाहिए

सीता जी को क्रमशः त्रिजटा तत्पश्चात् एकजटा आदि राक्षसीयों ने क्रोध से लाल आँखें डराया और रावण के प्रति झुकाने की कोशिश भी किया और कहा की ‘देवि! मैंने तुमसे उत्तम, यथार्थ और हित की बात कही है। सुन्दर मुसकानवाली सीते! तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा। सीताजी…