“हम जीवन भर कुछ न कुछ करते रहते हैं…काम, पूजा, जप, ध्यान, सेवा… लेकिन एक सवाल है—क्या केवल करने से अज्ञान मिट जाता है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंइसका बहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत्॥ सरल अर्थ “कर्म—यानी कोई भी क्रिया,अज्ञान को नहीं मिटा सकती,क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं […]
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सचेतन- 05: सत् — सत्य और कर्म की शुद्धि
बहुत सुंदर और सारगर्भित बात है — “क्यों है मनुष्य जन्म कीमती?”इसका उत्तर वेदांत बहुत गहराई से देता है,क्यों है मनुष्य जन्म अनमोल? इस सृष्टि में लाखों योनियाँ हैं —पर केवल मनुष्य ही वह प्राणी हैजिसमें सत्-चित्-आनन्द का विकास संभव है। सत् — सत्य और कर्म की शुद्धि “सत्” का अर्थ है —जो सदा है, […]
सचेतन, पंचतंत्र की कथा-50 : सूअर और सियार की कथा
आयु, कर्म, धन, विद्या, और मृत्यु पहले से ही तय होते हैं नमस्कार! आज के सचेतन एपिसोड में आपका स्वागत है। आज हम एक दिलचस्प कहानी सुनेंगे, जो हमें जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सबक सिखाती है। यह कहानी एक भील, एक सूअर और एक सियार की है। किसी जंगल में एक भील नाम का शिकार […]
सचेतन 218: शिवपुराण- वायवीय संहिता – कर्म मन:प्रेरित क्रिया होती है।
कर्म आपकी भावना पर आधारित होता है जिसका स्वतः फल मिलता है। हमारी सर्वव्यापी चेतन ही हमारी प्रकृति है या कहें की यह महेश्वर की शक्ति यानी माया है जो आपको आवृत करके रखती है। और यही आवरण कला है। जब हम कला कहते हैं तो यह कला न की ज्ञान हैं, न शिल्प हैं, […]
