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सचेतन 2.63: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना

स्वप्न- आपके विचार का एक “सेंसर” की तरह है जो एक अंतरात्मिक बल के अधीन रहता है  सीता जी ने कहा की इन राक्षसियों के संरक्षण में रहकर तो मैं अपने श्रीराम को कदापि नहीं पा सकती, इसलिये महान् शोक से घिर गयी हूँ और इससे तंग आकर अपने जीवन का अन्त कर देना चाहती…