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सचेतन 243: शिवपुराण- वायवीय संहिता – मंत्रयोग में मातृका शक्ति स्वरूप है

मंत्र साधना में वर्ण का महत्व सर्वोपरि है  मंत्र,वर्ण या अक्षर ‘शब्द-ब्रह्म’ या ‘वाग्-शक्ति’ के स्वरुप हैं और इनका सूक्ष्म रुप ‘विमर्श-शक्ति’ है। आपका विमर्श-शक्ति यानी चिंतन से उत्पन्न शब्द और ज्ञान आपकी ‘परा वाक्’ कही जाती है और जिसमें स्फुरणा यानी अंतःप्रेरणा या आपके भीतर की स्वाभाविक प्रेरणा  होती है। यह स्वाभाविक प्रेरणा ही…