सचेतन 227: शिवपुराण- वायवीय संहिता – आत्म ज्ञान का मार्ग सिद्धि कर्मों से खुलता है

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सचेतन 227: शिवपुराण- वायवीय संहिता – आत्म ज्ञान का मार्ग सिद्धि कर्मों से खुलता है

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प्राणियों का यह समागम भी संयोग-वियोग से युक्त हैं

आपने आपको और स्वयं के गुण और शरीर को भी समझने के लिए विवेक चाहिए जिसको पार्थक्य ज्ञान कहते हैं। और मुनियों द्वारा वायु देवता से पूछे गये प्रश्न -बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर से व्यतिरिक्त किसी आत्मा नामक वस्तु की वास्तविक स्थिति कहाँ है?  और आत्मा क्या है? उसके जबाब में वायुदेवता ने कहा की आत्म विषय को जानने के लिए सर्वव्यापी चेतना और बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर को पृथक मानना अवश्य है। लेकिन यह भी निश्चित है की अध्यात्म का ज्ञान शरीर को जानने से आरंभ होता है लेकिन आत्म विषय शरीर से अलग है। 

आत्मा नामक कोई पदार्थ निश्चय ही विद्यमान है। उसकी सत्ता या मौजूदगी हेतु 

सत्पुरुष बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर को आत्मा नहीं मानते; क्योंकि यह सब हमारी स्मृति (बुद्धि का ज्ञान) है जो अनियत और अनिश्चित है। 

इसीलिये वेदों और वेदान्तों में आत्मा को पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण कर्ता, सम्पूर्ण ज्ञेय पदार्थो में व्यापक तथा अन्तर्यामी कहा जाता है। ज्ञानी पुरुष निरन्तर विचार करके उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर पाते हैं। आत्मतत्त्व का साक्षात्कार हेतु शरीर की शुद्धि आवश्यक है जो योग, ध्यान, आराधना और प्रार्थना से संभव है। 

जैसे पानी से सींचा हुआ खेत अंकुर उत्पन्न करता है, और ज्ञान से सींचा हुआ शरीर आत्मा दर्शन कर पता है। ज्ञान से साक्षात्कार करके कोई भी इस शरीर रूप में जन्म नहीं लेना चाहेगा क्योंकि ये शरीर अत्यन्त दुःख के आलय माने जाते हैं। इनकी मृत्यु अनिवार्य होती है।उसी प्रकार अज्ञान से आप्लावित हुआ कर्म नूतन शरीर को जन्म देता है। 

भूतकाल में कितने ही शरीर नष्ट हो गये और भविष्य काल में सहस्रों शरीर आनेवाले हैं, वे सब आ-आकर जब जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं, तब पुरुष उन्हें छोड़ देता है। कोई भी जीवात्मा किसी भी शरीर में अनन्त काल तक रहने का अवसर नहीं पाता। यहाँ स्त्रियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवों से जो मिलन होता है, वह पथिक को मार्ग में मिले हुए दूसरे पथिकों के समागम के ही समान है।

जैसे महासागर में एक काष्ठ कहीं से और दूसरा काष्ठ कहीं से बहता आता है, वे दोनों काष्ठ कहीं थोड़ी देर के लिये मिल जाते हैं और मिलकर फिर बिछुड़ जाते हैं। उसी प्रकार प्राणियों का यह समागम भी संयोग-वियोग से युक्त हैं। ब्रह्माजी से लेकर स्थावर पशु प्राणियों तक सभी जीव कहे गये हैं। उन सभी पशुओं के लिये ही यह दृष्टान्त या दर्शनशास्त्र कहा गया है। यह जीव पाशों में बँधता और सुख-दुःख भोगता है, इसलिये ‘पशु’ कहलाता है। यह ईश्वर की लीला का साधन-भूत है, ऐसा ज्ञानी महात्मा कहते हैं और यहाँ से आत्म ज्ञान का मार्ग खुलता है जो “सिद्धि कर्मों से निरूपण होता है।

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