सचेतन 145 : श्री शिव पुराण- ईश्वरीय गुण का आभास और दर्शन 

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सचेतन 145 : श्री शिव पुराण- ईश्वरीय गुण का आभास और दर्शन 

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 भक्तवत्सल यानी भगवान की सच्चे दिल से भक्ति करना।

ईश्वरीय गुण का आधार शिव हैं जिसमें सृष्टि का निर्माण, उसका पालन करना और संहार कर्ता के रूप में महसूस किया जाता है। यह गुण एक व्यक्तित्व पर्सनालिटी का निर्माण करता है जिसको आप शारीरिक रूप से यानी भौतिक रूप में नहीं देख सकते हैं यह व्यक्तित्व का एक अभौतिक पहलू है। 

जब शिव के स्वरूप को सगुण और निर्गुण रूप से समझते हैं तो आपका ईश्वरीय गुण  या आपका व्यक्तित्व वास्तविक रूप में आपकी आत्मा से ही पता चलता है। आप शरीर को देखकर ईश्वरीय गुण का निर्धारण नहीं कर सकते हैं। ये शरीर आपका है पर आप शरीर नहीं हैं। 

जिस मानव का हार्ट ट्रान्सप्लांट किया जाता है उसका स्वभाव दान किये व्यक्ति जैसा नहीं बन जाता है। हार्ट प्राप्त किये हुए व्यक्ति का व्यक्तित्व ठीक वैसा ही रहता है जैसा कि पहले था। 

ईश्वरीय गुण का आभास और दर्शन आपको भृकुटि के मध्यम से हो सकता है। भारतीय संस्कृति में भृकुटि के मध्य तिलक लगाना अथवा बौद्ध धर्म में तीसरी आँख का उल्लेख, यह आत्मा का ही प्रतीक हैं हालांकि इन नयनों से आत्मा दिखती नहीं है किन्तु इसकी आंतरिक शक्ति का आभास आप अभ्यास करके जागृत कर सकते हैं।  यही आत्मिक शक्ति हमें सदियों तक बढ़ते रहने में सहायक रहती है

आत्मिक शक्ति का आभास होते ही आप महसूस करेंगे की मैं ही सच्चिदानंद निर्विकार परमब्रह्म और परमात्मा हूं। 

ईश्वरीय गुण से विकसित व्यक्तित्व हमेंशा आपको सृष्टि की रचना, सृष्टि के पालन और संहार का कर्ता के रूपन में प्रेरित करेगी। इसका अर्थ है ईश्वरीय गुण को बना कर रखना और प्रलयरूप यानी जीवन के कठिन से कठिन समय में भी अपने गुणों को नहीं छोड़ना।

ईश्वरीय गुण से विकसित व्यक्तित्व के कारण ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम का धारण और तीन रूपों में विभक्त करके शिव की पहचान भी संभव है। 

आपको भक्तवत्सल बनने का समझ आएगा।  भक्तवत्सल यानी भगवान की सच्चे दिल से भक्ति करना। और आपको यह लगेगा की भगवान हमसब के कष्टों का हरण करने के लिए है। चाहे वो किसी भी धर्म सम्प्रदाय के हो महिला, वृद्ध, कुबड़ा, अँधा यहां तक कि उनका शत्रु ही क्यों न हो सबके लिए आप एक समान गुण का प्रदर्शन करना शुरू कर देंगे। 

आपके उदहारण के लिए भगवान श्रीकृष्ण को ले लीजिए सबसे पहले उनके पालक माता पिता अपने पूर्व जन्म में वसु थे, (हिन्दू धर्म में आठ वसु हैं जो इन्द्र या विष्णु के रक्षक देव हैं। ‘वसु’ शब्द का अर्थ ‘वसने वाला’ या ‘वासी’ है।)  उनके संतान नहीं थी और उन्होंने भगवान की कठोर तपस्या की। तब भगवान ने उन्हें पुत्र रूप में पालित होने का वचन दिया जिससे दोनों का जीवन धन्य हुआ.

ईश्वरीय गुण से विकसित व्यक्तित्व होने के कारण आप सभी की प्रार्थना करेंगे और सबकी प्रार्थन सदैव सुनेगें भी। आपके विकसित व्यक्तित्व का अंश रुद्र है। रुद्र दु:ख का निवारण करनेवाला; दुष्टों को दंड देने वाले; रोगों का नाशकर्ता; महावीर; सभा का अध्यक्ष, जीव, परमेश्वर, प्राण, तथा राजवैद्य है।

विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र तीनों एकरूप होंगे। इनमें भेद नहीं है। 

ईश्वरीय गुण से विकसित व्यक्तित्व में आपका शिवरूप सनातन हो जाता है यानी आपका मूलभूत रूप जो जन्म से आपको मिला है। भगवान शिव भी यही कहते हैं की यह सत्य ज्ञान एवं अनंत ब्रह्म है, ऐसा जानकर मेरे यथार्थ स्वरूप का दर्शन करना चाहिए। ‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘सदा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त।

आगे बात करेंगे की एक अद्भुत सितारा (आत्मा) भृकुटि के बीच सदा चमकता है। जिससे आपके ईश्वरीय गुण से विकसित व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

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