सचेतन 220: शिवपुराण- वायवीय संहिता – कर्म की बेड़ियों को ढीला कैसे करेंगे?

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सचेतन 220: शिवपुराण- वायवीय संहिता – कर्म की बेड़ियों को ढीला कैसे करेंगे?

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आध्यात्मिक प्रक्रिया जीवन में बहुत सारे आयाम खोल देती है।

सामान्यतः  कर्म फल का नियम मन से प्रेरित क्रियाओं में ही लागू होता है। वैसे दो  प्रकार के कर्म होते हैं संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म ।

संचित कर्म यह कर्म का गोदाम है, वहाँ सारी जानकारी मौजूद है। अगर आप अपनी आंखें बंद करते हैं, और पर्याप्त जागरूक बन जाते हैं और अपने अंदर देखते हैं, तो आप ब्रह्माण्ड की प्रकृति को जान जाएंगे। 

प्रारब्ध कर्म इस जीवन के लिए आबंटित एक खास मात्रा में जानकारी है। आपके जीवन की जीवंतता के आधार पर, जीवन अपने लिए जितनी मात्रा में जानकारी ले सकता है, उतनी ले लेता है। 

आपके पास जिस भी तरह का कर्म है, वह एक सीमित संभावना है और यही आपको एक सीमित इंसान बनाता है।आपका हर काम अतीत द्वारा संचालित होता है। अगर आप मुक्ति की दिशा में बढ़ना चाहते हैं, तो पहली चीज जो आपको करने की जरूरत है, वह है कर्म की बेड़ियों को ढीला करना। वरना, आगे बढ़ना नहीं होगा। 

अगर आप ईमानदारी से आध्यात्मिक मार्ग पर हैं, तो कुछ भी स्पष्ट नहीं होगा। हर चीज धुंधली होगी। 

कर्म की बेड़ियों को ढीला कैसे करेंगे? एक आसन तरीका है शारीरिक स्तर पर कर्म को तोड़ना। अगर आपका कर्म सुबह 8 बजे जागने का है, तो आप 5 बजे का अलार्म लगाइए। आपके शरीर का कर्म है कि वह जागना नहीं चाहेगा। लेकिन आप कहिए, ‘नहीं, मैं जरूर उठूंगा।’ अगर आप उठ भी जाते हैं, तो आपका शरीर कॉफी पीना चाहता है। लेकिन आप उसे ठंडे पानी से नहला दीजिए। अब आप बस कुछ चीजें करके पुरानी कर्म प्रक्रिया को जागरूकता पूर्वक तोड़ रहे हैं। जो आपको पसंद है उसे आप अचेतना में कर सकते हैं, है न? जो आपको नापसंद है, उसे आपको सचेतन होकर करना होता है। यही एकमात्र तरीका नहीं है, दूसरे सूक्ष्म और ज्यादा असरदार तरीके भी हैं, मैं आपको बस सबसे साधारण तरीका बता रहा हूँ। 

एक बार जब आप आध्यात्मिक मार्ग पर आते हैं, तो आप कह रहे होते हैं, ‘मैं अपने परम लक्ष्य तक पहुंचने की जल्दी में हूँ।’ आप उसके लिए सौ जीवनकाल नहीं लेना चाहते। और सौ जीवनकाल की इस प्रक्रिया में आप इतने ज्यादा कर्म इकट्ठा कर सकते हैं जो आगे हजार साल तक चलते रह सकते हैं। आप इसे जल्दी पूरा करना चाहते हैं। एक बार जब आध्यात्मिक प्रक्रिया शुरू होती है, बहुत सारे आयाम खोल देती है। अगर आप आध्यात्मिक नहीं होते तो आपने शायद एक ज्यादा शांतिमय जीवन जिया होता, लेकिन वह एक अधिक जीवनहीन जीवन भी होता, जीवन के बजाय मृत्यु के ज्यादा करीब। आपके अंदर किसी बुनियादी चीज के हिले बगैर, आप शायद आराम से गुजरे होते। 

क्या इसका मतलब है कि जब आप आध्यात्मिक मार्ग पर होते हैं, तो आपके साथ सारी नकारात्मक चीजें होती हैं? ऐसा नहीं है। बात बस इतनी है कि जब जीवन एक जबरदस्त गति से बढ़ता है – एक ऐसी गति जो आपके आस-पास के लोगों से कहीं ज्यादा तेज है – तो आपको लगता है कि आपके साथ कोई त्रासदी हो रही है। आपके साथ कोई त्रासदी नहीं हो रही है। बात बस इतनी है कि वे लोग सामान्य गति से जा रहे हैं, लेकिन आपका जीवन फास्ट-फारवर्ड में बढ़ रहा है।

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