सचेतन 190: कोई विश्वास कभी ज्ञान नहीं होता

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स्वयं की स्मृति में, स्वयं के संबंध में प्रचलित सिद्धांत सबसे बड़ी बाधाएं हैं।

हमने कहा था की समय रहते ही हम आज के लिए सचेत हो जायें। जीवन का संबंध उस तथ्य से है की जिस भांति हम जीवन को जी रहे हैं इसीलिए कल की आशा पर की कल सब ठीक हो जाएगा यह सब मात्र आपकी आशा का विस्तार है जो अंधकारपूर्ण है। 

मैं आपसे कहता हूँ कि निश्चित ही कल के प्रति कोई आशा रखने का कारण नहीं है। लेकिन इससे निराश होने का भी कोई कारण नहीं है। आज के प्रति आशा से भरा जा सकता है। आज को परिवर्तित किया जा सकता है। मैं जो हूँ उस होने में क्रांति लाई जा सकती है। यही आत्म स्मृति है जो क्रांति उत्पन्न कर सकती है।

यदि मैं जान सकूं स्वयं को तो वह दीया उपलब्ध हो जाएगा जो मेरे जीवन से अंधकार को नष्ट कर देगा और स्वयं को जाने बिना और न कोई दीया है और न कोई प्रकाश है, न कोई आशा है। 

पहली बात हम स्वयं को नहीं जानते हैं। ये जान लेना स्वयं को जानने के प्रति पहला चरण है। 

कोई सोचता हो कि मैं स्वयं को जानता हूँ तो स्वयं को जानने के प्रति द्वार बंद हो जायेंगे और धर्म की बहुत सी शिक्षाओं ने, संस्कृति ने इधर हजारों वर्ष से दोहराए गए सिद्धांतों ने, आत्मा और परमात्मा की बातों ने हम में से बहुतों को यह भ्रम पैदा कर दिया है कि हम अपने को जानते हैं। 

इस भ्रम ने हमारे आत्म-अज्ञान को गहरा किया है। इन शब्दों और सिद्धांतों के आधार पर स्वयं को जानने के भ्रम से बड़ा और सच कहूँ तो आत्म-ज्ञान के लिए और कोई दूसरा अटकाव कोई दूसरी दीवाल, कोई दूसरा अवरोध नहीं है। 

छोटे से बच्चे भी जानते हैं कि हम आत्मा हैं और बूढ़े भी दोहराते हैं कि हम आत्मा हैं। यह सत्य है। एक बार सत्ता का अनुभव हो तो जीवन बिलकुल बदल जाएगा। ये सिद्धान्त हैं, ये स्वयं की प्रतीति और साक्षात हो तो जीवन नया हो जाएगा और जीवन आनंद से भर जाएगा।

लेकिन इन शब्दों को हमने सहारों की भांति पकड़ा हुआ है। यह पकडे रहने का अनुभव भी अज्ञान है लेकिन इस झूठे ज्ञान को हमने बहुत तीव्रता से पकडे  हैं और उसे छोड़ने में भी भय मालूम होता है। 

इसलिए जैसे-जैसे आदमी मृत्यु के करीब पहुंचता है वैसे-वैसे इन शब्दों को और जोर से पकड़ लेता है। वैसे-वैसे गीता, कुरान और बाइबिल उसके मस्तिष्क पर और जोर से बैठते जाते हैं। वैसे-वैसे वह मंदिरों के द्वार खटखटाने लगता है। और साधु-संन्यासियों के सत्संग में बैठने लगता है ताकि इन शब्दों को जोर से पकड़ ले, ताकि आती हुई मौत के विरोध में कोई सुरक्षा का उपाय बना ले। इसलिए जितने लोग मृत्यु से भयभीत होते हैं वे सभी आत्मा की अमरता में विश्वास कर लेते हैं।

उनका यह विश्वास उनका ज्ञान नहीं है। कोई विश्वास कभी ज्ञान नहीं होता। सब विश्वास अज्ञान होते हैं। जीवन के प्रति जो भी हम माने हुए बैठे हैं वह सब हमारा अज्ञान है और उस मानने के कारण ज्ञान तक जाने का सारा द्वार बंद है। 

स्वयं की स्मृति में, स्वयं के संबंध में प्रचलित सिद्धांत सबसे बड़ी बाधाएं हैं। सिद्धांत तो क्या बाधा हैं हम उन पर विश्वास कर लेते हैं ये बाधा है। हमारे विश्वास बाधा हैं। और जो व्यक्ति जितने ज्यादा विश्वासों से ग्रसित हो जाता है उसके जीवन में विवेक के अवतरण का, विवेक के आगमन का, विवेक के उठने और जगने की संभावना का, उतना ही उसी मात्रा में ह्रास हो जाता है। असंभव हो जाती है यह बात कि हम स्वयं को जान सकें। क्योंकि स्वयं को जानने के सिद्धांत हमें यह भ्रम पैदा कर देते हैं कि हम जानते हैं और ये भ्रम बहुत तलों पर हैं।

एक संन्यासी एक राजा के घर मेहमान था। उस राजा ने सुबह ही आकर उस संन्यासी को पूछा, मैं सुनता हूं कि आप परमात्मा की बातें करते हैं। क्या मुझे परमात्मा से मिला दे सकेंगे? यह बात उस राजा ने अपने जीवन में और भी न मालूम कितने संन्यासियों से पूछी थी। इस संन्यासी से भी पूछी। और जो अपेक्षा थी और जो संन्यासियों ने बातें कही थीं सोचा वही बातें यह संन्यासी भी कहेगा। करीब-करीब संन्यासी एक ही जैसी बातें दोहराते हैं। सोचा यह भी वही कहेगा, कुछ उपनिषद, कुछ वेदों की, कुछ ग्रंथों की, कुछ उद्धरण देगा, कुछ गीता की, कुछ ज्ञान की बातें समझाएगा। लेकिन उस संन्यासी ने क्या पूछा? उस संन्यासी ने कहाः आप ईश्वर से मिलना चाहते हैं तो थोड़ी देर रुक सकते हैं या बिलकुल अभी मिलने की इच्छा है?

वह राजा थोड़ा हैरान हुआ। कोई भी हैरान होता। यह खयाल न था कि बात इस भांति पूछी जाएगी। सोचा शायद समझने में भूल हो गई हैै। उसने कहा कि शायद आप समझे नहीं मैं परमात्मा से, ऊपर जो परमात्मा है उससे मिलने की बात कर रहा हूँ। उस संन्यासी ने कहा कि समझने में भूल का कोई कारण नहीं। मैं तो उस परमात्मा के सिवाय और किसी की बात करता ही नहीं। अभी मिलना चाहते हैं या थोड़ी देर ठहर सकते हैं? उस राजा ने कहा कि जब आप कहते ही हैं तो मैं अभी ही मिलना चाहूँगा। ऐसे उसकी कोई तैयारी नहीं थी इतने जल्दी परमात्मा से मिलने की। और किसी की भी इतने जल्दी कोई तैयारी नहीं होती। ईश्वर के खोजियों से पूछा जाए अभी मिलना चाहेंगे। तो वे भी कहेंगे कि हम थोड़ा सोच कर आते हैं विचार करके आते हैं। हम थोड़ा मित्रों से पूछ लें पति हो तो पत्नी से पूछ ले, पत्नी हो तो पति से पूछ ले, हम जरा अपने घर के लोगों से पूछ लें फिर हम लौट कर आते हैं। इसी वक्त तो ईश्वर से मिलने को कौन तैयार होगा। वह राजा भी तैयार नहीं था लेकिन जब बात ही मुसीबत ही आ पड़ी थी सिर पर तो उसने कहा कि ठीक है आप कहते हैं तो मैं अभी मिल लूंगा। ******

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