सचेतन 187: जब तक आप स्वयं को नही जानते हैं तक आप अंधकार में रहेंगे  

मन भी वस्त्रों से ज्यादा गहरा नहीं है।

सचेतन का अर्थ तब आपको साकार दिखेगा जब हम स्मरण से इन वस्त्र, धन, पदवी, पद, सामाजिक प्रतिष्ठा, अहंकार, उपाधि को भूलना शुरू करेंगे। 

सचेतन में इन वस्त्रों के बाहर जो हमारा होना है उस तरफ, उस दिशा में कुछ बातें आपसे कहना चाहूँगा और यह स्मरण दिलाना चाहूंगा कि जो वस्त्रों में खोया है वह अपने जीवन को गवां रहा है। और जो केवल वस्त्रों में अपने को पहचान रहा है, वह अपने को पहचान ही नहीं रहा है, वह अपने को पा भी नहीं सकेगा। और जो व्यक्ति अपने को ही ना पा सके उसके और कुछ भी पा लेने का कोई भी मूल्य नहीं है। अपने को खोकर अगर सारी दुनियां भी पाई जा सके तो उसका कोई मूल्य नहीं है।

एक और छोटी कहानी मुझे स्मरण आ रही है और वह मैं कहूँगा। तीन मित्र यात्रा पर निकले। पहली ही रात एक जंगल में उन्हें विश्राम करना पड़ा। खतरनाक स्थान था जंगली जानवरों का डर था। डाकू और लूटेरों का भी भय था। अंधेरी रात थी तो उन तीनों ने तय किया कि एक-एक व्यक्ति जागता रहे, दो सोएं और एक जागा हुआ पहरा दे। 

एक तो उनमें गांव का पंडित था, एक उनमें गांव का लड़ाका बहादुर क्षत्रिय था, एक गांव का नाई था। नाई को ही सबसे पहले पासा फेंका गया और उसका ही सबसे पहले नाम पड़ा। वह रात पहरा देने के लिए पहले पहर बैठा। 

नाई को नींद जल्दी आने लगी। दिन भर की थकान थी तो किसी भांति अपने को जगाए रखने के लिए उसने बगल में सोए हुए क्षत्रिय मित्र की हजामत बनानी शुरू कर दी। जागे रखने के लिए अपने को उसने अपने मित्र के सारे बाल काट डाले। उसका समय पूरा हुआ। 

तीसरा जो मित्र था वह था, रात्रि के अंतिम पहर में उस पंडित को पहरा देने को था। उसके तो बाल नहीं थे उसका तो सिर पहले से ही साफ था, उसके सारे बाल गिर गए थे। 

दूसरे मित्र का जैसे ही मौका आया उस नाई ने उसे उठाया और कहा कि मित्र उठो! तुम्हारा समय आ गया। अब मैं सोऊं। उस क्षत्रिय ने अपने सिर पर हाथ फेरा और देखा बाल बिलकुल भी नहीं हैं तो उसने कहा कि मालूम होता है कि तुमने मेरी जगह भूल से पंडितजी को उठा दिया है। उसने अपने सिर पर हाथ फेरा और कहा मालूम होता है कि भूल से मेरी जगह पंडितजी को उठा दिया था और वह वापस सो गया। 

हम अपने को इसी भांति पहचानते हैं। हमारी पहचान हमारे वस्त्रों तक है। अगर बहुत गहरी जाती है तो अपने शरीर तक जाती है। पर वह भी वस्त्र से ज्यादा गहरा नहीं है। और भी गहरी जाती हो तो मन तक जाती है।

मन भी वस्त्रों से ज्यादा गहरा नहीं है। लेकिन उससे गहरी हमारी कोई पहचान नहीं जाती। जीवन में सारा दुख और सारा अंधकार इस आत्म-अज्ञान से पैदा होता है। केंद्र पर, अपने स्वयं के केंद्र पर अंधकार होता है और हम सारे रास्तों पर दीये जलाने की कोशिश करते हैं। वे सब दीये काम नहीं पड़ते। क्योंकि मेरे भीतर अंधकार होता है तो मैं जहां भी जाता हूं अपने साथ अंधकार ले जाता हूँ। उन रास्तों पर भी जहां कि मैने प्रकाश के दीये जलाए हैं, मेरे पहुंचने से अंधकार हो जाता है क्योंकि मैं अंधकार हूँ। जब तक मैं स्वयं को नही जानता तब तक मैं अंधकार हूँ। मैं अपने अंधकार को लिए फिरता हूं जीवन में और सारे लोग अपने-अपने अंधकार को लिए फिरते हैं। हम सब जहां इकट्ठे हो जाते हैं वहाँ अंधकार बहुत घना हो जाता है। 


Posted

in

by

Tags:

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *