सचेतन 191: जिस दिन स्वयं को पा लोगे उस दिन परमात्मा को भी पा लोगे 

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सचेतन 191: जिस दिन स्वयं को पा लोगे उस दिन परमात्मा को भी पा लोगे 

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जो मेरे भीतर है और जो किसी और के भीतर है और जो सबके भीतर है, वह बहुत गहरे में संयुक्त है, और एक है और समग्र है। 

कहानी में एक संन्यासी एक राजा के घर मेहमान था। उस राजा ने सुबह ही आकर उस संन्यासी को पूछा, मैं सुनता हूं कि आप परमात्मा की बातें करते हैं। क्या मुझे परमात्मा से मिला सकेंगे? यह बात उस राजा ने अपने जीवन में और भी न मालूम कितने संन्यासियों से पूछी थी। इस संन्यासी से भी पूछी। और जो अपेक्षा थी और जो संन्यासियों ने बातें कही थीं सोचा वही बातें यह संन्यासी भी कहेगा। करीब-करीब संन्यासी एक ही जैसी बातें दोहराते हैं। सोचा यह भी वही कहेगा, कुछ उपनिषद, कुछ वेदों की, कुछ ग्रंथों की, कुछ उद्धरण देगा, कुछ गीता की, कुछ ज्ञान की बातें समझाएगा। 

लेकिन उस संन्यासी ने क्या पूछा? उस संन्यासी ने कहाः आप ईश्वर से मिलना चाहते हैं तो थोड़ी देर रुक सकते हैं या बिलकुल अभी मिलने की इच्छा है?

वह राजा थोड़ा हैरान हुआ। कोई भी हैरान होता। यह खयाल न था कि बात इस भांति पूछी जाएगी। सोचा शायद समझने में भूल हो गई हैै। उसने कहा कि शायद आप समझे नहीं मैं परमात्मा से, ऊपर जो परमात्मा है उससे मिलने की बात कर रहा हूँ। उस संन्यासी ने कहा कि समझने में भूल का कोई कारण नहीं। मैं तो उस परमात्मा के सिवाय और किसी की बात करता ही नहीं। 

आप अभी मिलना चाहते हैं या थोड़ी देर ठहर सकते हैं? उस राजा ने कहा कि जब आप कहते हैं तो मैं अभी ही मिलना चाहूँगा। ऐसे उसकी कोई तैयारी नहीं थी इतने जल्दी परमात्मा से मिलने की। और किसी की भी इतने जल्दी कोई तैयारी नहीं होती।

ईश्वर के खोजियों से पूछा जाए अभी मिलना चाहेंगे। तो वे भी कहेंगे कि हम थोड़ा सोच कर आते हैं विचार करके आते हैं। हम थोड़ा मित्रों से पूछ लें पति हो तो पत्नी से पूछ ले, पत्नी हो तो पति से पूछ ले, हम जरा अपने घर के लोगों से पूछ लें फिर हम लौट कर आते हैं। इसी वक्त तो ईश्वर से मिलने को कौन तैयार होगा। वह राजा भी तैयार नहीं था लेकिन जब बात ही मुसीबत ही आ पड़ी थी सिर पर तो उसने कहा कि ठीक है आप कहते हैं तो मैं अभी मिल लूंगा। 

संन्यासी ने कहा लेकिन इसके पहले मैं आपको परमात्मा से मिलाऊं यह छोटा सा कागज है इस पर अपना परिचय लिख दें और राजा ने लिखा जो उसका परिचय था। बड़े राज्य का राजा था, महल का पता, वह सब लिखा।

संन्यासी ने पूछा कि क्या मैं मान लूं कि यही आपका परिचय है? क्या मैं मान लूं कि कल आप भिखारी हो जाएं और राज्य छिन जाए तो बदल जाएंगे?

उस राजा ने कहा कि नहीं, राज्य छिन जाए तो भी मैं तो मैं ही रहूंगा। तो संन्यासी ने कहा कि फिर राजा होना आपका परिचय नहीं हो सकता, क्योंकि राज्य छिन जाने पर भी आप रहेंगे और आप ही रहेंगे व भिखारी होने पर भी आप ही रहेंगे। तो फिर राजा होना आपका परिचय नहीं हो सकता। 

और यह जो नाम लिखा है, मां-बाप दूसरा नाम भी दे सकते थे और आप भी चाहें तो दूसरा नाम रख ले सकते हैं, उससे भी बदल नहीं जाएंगे। उस राजा ने कहा नाम से क्या फर्क पड़ता है, मैं तो मैं ही रहूँगा, नाम कोई भी हो। तो संन्यासी ने कहा कि इसका अर्थ हुआ कि आपका कोई नाम नहीं है। नाम केवल कामचलाऊ बात है। कोई भी नाम काम दे सकता है। इसलिए नाम भी आपका परिचय नहीं है। 

तो फिर क्या मैं मानूँ कि आपको अपना परिचय पता नहीं है? क्योंकि दो ही बातें आपने लिखी हैं राजा होना और अपना नाम। उस राजा ने वह कागज वापस ले लिया और कहाः मुझे क्षमा करें। अगर मेरा नाम, मेरा धन, मेरा पद और मेरी प्रतिष्ठा मेरा परिचय नहीं है तो फिर मुझे पता नहीं कि मैं कौन हूं? उस संन्यासी ने कहा फिर परमात्मा से मिलाना बहुत कठिन है क्योंकि मैं किसको मिलाऊं, मैं किसकी खबर भेजूं, कौन मिलना चाहता है?

जाओ और खोजो कि कौन हो और जिस दिन खोज लोगे उस दिन मेरे पास नहीं आओगे कि परमात्मा से मिला दो क्योंकि तुम जिस दिन स्वयं को पा लोगे उस दिन उसे भी पा लोगे जो सबके भीतर है। 

क्योंकि जो मेरे भीतर है और जो किसी और के भीतर है और जो सबके भीतर है, वह बहुत गहरे में संयुक्त है, और एक है और समग्र है।

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