सचेतन 102: श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तत्पुरुष  अवतार 

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सचेतन 102: श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  तत्पुरुष  अवतार 

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हम जीवन को सार्थकता बना कर क्या पाना चाहते हैं?

श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में शिवजी का सद्योजात नामक अवतार हुआ है। यही शिवजी का प्रथम अवतार कहा जाता है। सद्योजात का अर्थ है की जिसने अभी या कुछ ही समय पहले जन्म लिया हो। यह ऐसे भाव को दर्शाता है की मानो एक माँ नवजात शिशु को बार-बार दुलार रही होती है। भगवान शंकर के पश्चिमी मुख को ‘सद्योजात’ कहा जाता है, जो श्वेतवर्ण का है। सद्योजात पृथ्वी तत्व के अधिपति है और बालक के समान परम स्वच्छ, शुद्ध और निर्विकार है। सद्योजात ज्ञानमूर्ति बनकर अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करके विशुद्ध ज्ञान को प्रकाशित कर देते है।

रक्त नामक बीसवें कल्प में रक्तवर्ण वामदेव का अवतार हुआ। शिव के इस स्वरूप वामदेव, का संबंध संरक्षण से है। संरक्षण कर्म का और सही समय का होना चाहिए। 

इसके बाद इक्कीसवां कल्प आया, जिसमें ब्रह्माजी ने पीले वस्त्र धारण किए। पुत्र कामना का ध्यान करते हुए ब्रह्माजी को एक महान तेजस्वी, दीर्घ भुजाओं वाला पुत्र प्राप्त हुआ। उस पुत्र को ब्रह्माजी ने अपनी बुद्धि से ‘तत्पुरुष’ शिव समझा। तब उन्होंने गायत्री का जाप आरंभ किया। देवी गायत्री एवं शिव कृपा से उस पीत वस्त्रधारी दिव्य कुमार के अनेकों पुत्र हुए।

हम जीवन की सार्थकता को समझने के लिये शिव जी के तत्पुरुष के रूप का महत्व समझेंगे। वैसे हमारे जीवन में दो मुख्य भाग हैं पहला पूर्वपद और दूसरा उत्तरपद। जैसे जीवन और मरण, सुख और दुख और अगर आपपास के प्रकृति को देखें तो भी दो भाग है जैसे-गंगाजल। इसमें गंगा पूर्वपद और जल उत्तरपद है।

तत्पुरुष अवतार प्रायः हमारे उत्तरपद को दर्शाता है यानी हम जीवन को सार्थकता बना कर क्या पाना चाहते हैं। अगर विचार में सरलता, निश्छलता, कपटहीनता या भोलापन हो तो हमारे जीवन का पूर्वपद अर्थात प्रथम भाग गौण होता है एवं उत्तर पद की प्रधानता होती है। जैसे कहते हैं की मूर्ति को बनाने वाला — मूर्तिकार या काल को जीतने वाला — कालजयी, या राजा को धोखा देने वाला — राजद्रोही।

अगर हम लक्ष्य को सरलता से समझ लें और सहजता से योजना को साध लें तो काम करना आसान हो जाता है।  

तत्पुरुष रूप यह सिखाता है की हम जब अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं या जब  हम कोई रचना करने की प्रक्रिया करते हैं, तो उस रचना या कर्म के परिणाम से स्वयं को स्वतंत्र कैसे रखें।

भगवद गीता के अध्याय २ का ४७ वा श्लोक है, जब अर्जुन रणभूमि पर अपने सगे सम्बन्धी को देखकर, युद्ध छोड़ देना चाहते है, तब भगवान उसे गीता का उपदेश देते हैं जिसको सम्पूर्ण गीता का सार माना जाता है। कहते हैं की अगर आप इस तत्व को जान लोगे तो आपको दूसरा कुछ समझने की जरूरत ही नही पड़ेगी और सफलता आपके पीछे दोड़ेगी। इतना ही नहीं जीवन के हर क्षेत्र में जीत आप की होगी। 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन-work is worship quotes

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञाननिष्ठा में नहीं। वहाँ ( कर्ममार्ग में ) कर्म करते हुए तेरा फल में कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्था में कर्म फल की इच्छा नहीं होनी चाहिये।

यदि कर्मफल में तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफल प्राप्ति का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफलप्राप्तिका कारण तू मत बन।

क्योंकि जब मनुष्य कर्मफल की कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफल रूप पुनर्जन्मका हेतु बन ही जाता है।

यदि कर्म फल की इच्छा न करें तो दुःखरूप कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्तिप्रीति नहीं होनी चाहिये।

भगवान शिव का तत्पुरुष स्वरूप कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, संबंध और 

अधिकरण से हमसभी को स्वतंत्रता दिलाता है।

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