सचेतन 163 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- तप की बड़ी भारी महिमा

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सचेतन 163 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- तप की बड़ी भारी महिमा

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दूसरों की भलाई के लिये अपने सूखों की परवाह न करना यही तप है।

श्री शिव पुराण के उमा संहिता में तप की बड़ी भारी महिमा बताते हुए सनत्कुमारजीने कहा-मुने! 

तप की महिमा अपार है। तपस्या या तप का मूल अर्थ था प्रकाश अथवा प्रज्वलन जो सूर्य या अग्नि में स्पष्ट होता है।आजकल धीरे-धीरे उसका एक रूढ़ार्थ विकसित हो गया और किसी उद्देश्य विशेष की प्राप्ति अथवा आत्मिक और शारीरिक अनुशासन के लिए उठाए जानेवाले दैहिक कष्ट को तप कहा जाने लगा।

कहते हैं की तपस्या से मनुष्य तेजस्वी होता है, बलवान् होता है, शत्रुओं को जीत सकने में समर्थ होता है, मनचाही इच्छाओं को पूर्ण कर सकता है, स्वस्थ रहता है, ऐश्वर्य प्राप्त करता है, सोने की तरह चमकता है, स्वर्ग प्राप्त करता है और अमर तक बन जाता है। 

पर यह तप है क्या-सुनो! दूसरों की भलाई के लिये अपने सूखों की परवाह न करना यही तप है। तुम्हारे उपकारों के बदले में यदि कोई प्रशंसा न करे, कृतज्ञता प्रगट न करे तो भी कुछ परवाह मत करो, यहाँ तक कि भोजन वस्त्र में भी न्यूनता आये और सर्दी-गर्मी से बचने का भी प्रबन्ध न हो तो इन सब कष्टों को खुशी-खुशी से सहन कर लो, यह मत सोचो कि दूसरे लोग थोड़े परिश्रम से बहुत सुख पाते हैं और तुम्हें बहुत करने पर भी कुछ सुख नहीं मिलता। 

वैसे तो आज इस्लाम पन्थ में ईद-उल-अज़हा का पर्व है। इस पर्व में क़ुर्बानी शब्द का महत्व है जिसको हम “भेंट” और सिरिएक क़ुरबाना “बलिदान”, कहते हैं जिसका संबंध एक तरह से यह है की किसी के करीब पहुंचने का साधन या निकटता बनाना। क़ुरबान शब्द कुरान शरीफ में तीन बार दिखाई देता है एक बार पशु बलि के संदर्भ में और दो बार किसी भी कार्य के सामान्य अर्थों में। दुनिया की चीज़ों को त्याग या बलिदान करके अल्लाह के करीब हुआ जा सकता है। 

तप परीक्षा है, यदि तुम इसमें उत्तीर्ण हो, खरे तपस्वी सिद्ध होते हो, तो वह सब विभूतियाँ तुम्हें प्राप्त होंगी जो कि तपस्वियों को प्राप्त होती रहती हैं। 

हमें दुनिया में भुखमरों की पलटनें दौड़ती दिखाई पड़ती हैं, यह लोग तप का महत्व भूल गये हैं और बीज बो कर फसल तक ठहरने पर विश्वास नहीं करते। प्रभु, इन्हें बीज देता है कि इसे बोओ और सींचो ताकि हजार गुना अन्न उपजे और तुम्हारे भंडार भर जावें, किन्तु इन्हें इतना धैर्य कहाँ? आज के बीज को यह आज ही कुट लेते हैं और खाली हाथ हिलाते फिरते हैं। 

तपस्या से किस प्रकार इनका पूरा पड़ेगा? तपस्वी-बुद्धिमान किसान है, वह कष्ट सह कर खेती करता है और फसल तक के लिये विश्वासपूर्वक ठहरता है। जब पौधे पकते हैं तो वह देखता है कि उसकी मेहनत अकारथ नहीं गई। जो बीज रेत में बिखेर दिया गया था वह हजार गुना होकर लौट आया है। 

तपस्या शासन की महिमा, गरिमा एवं प्रभाव को बढ़ाने वाला अदभुत कार्य है। तप वो ही करता है जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर सकता है। तप की सार्थकता के लिए मन की चंचलता को छोड़कर स्थिरता धारण करना पड़ती है। तपस्या से मन-वचन काया की पवित्रता, निर्मलता में अभिवृद्धि होती है।

संसार में ऐसा कोई सुख नहीं है जो तपस्याके बिना सुलभ होता हो। तप से ही सारा सुख मिलता है, इस बातको वेदवेत्ता पुरुष जानते हैं।

ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, सुन्दर रूप, सौभाग्य तथा शाश्वत सुख तप से ही प्राप्त होते हैं। तपस्या से ही ब्रह्मा बिना परिश्रम के ही सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि करते हैं । तपस्या से ही विष्णु इसका पालन करते हैं । तपस्या के बल से ही रुद्रदेव संहार करते हैं तथा तप के प्रभाव से ही शेष अशेष भूमण्डल को धारण करते हैं।

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