सचेतन 2.63: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना

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सचेतन 2.63: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना

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स्वप्न- आपके विचार का एक “सेंसर” की तरह है जो एक अंतरात्मिक बल के अधीन रहता है 

सीता जी ने कहा की इन राक्षसियों के संरक्षण में रहकर तो मैं अपने श्रीराम को कदापि नहीं पा सकती, इसलिये महान् शोक से घिर गयी हूँ और इससे तंग आकर अपने जीवन का अन्त कर देना चाहती हूँ। ‘इस मानव-जीवन और परतन्त्रता को धिक्कार है, जहाँ अपनी इच्छा के अनुसार प्राणों का परित्याग भी नहीं किया जा सकता’।

सीता ने जब ऐसी भयंकर बात कही, तब वे राक्षसियाँ क्रोध से अचेत-सी हो गयीं और उनमें से कुछ उस दुरात्मा रावण से वह संवाद कहने के लिये चल दीं. तत्पश्चात् भयंकर दिखायी देने वाली वे राक्षसियाँ सीता के पास आकर पुनः एक ही प्रयोजन से सम्बन्ध रखने वाली कठोर बातें, जो उनके लिये ही अनर्थकारिणी थीं, कहने लगीं- पापपूर्ण विचार रखने वाली अनार्ये सीते! आज इसी समय ये सब राक्षसियाँ मौज के साथ तेरा यह मांस खायेंगी। 

उन दुष्ट निशाचरियों के द्वारा सीता को इस प्रकार डरायी जाती देख बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा, जो तत्काल सोकर उठी थी, उन सबसे कहने लगी— नीच निशाचरियो! तुमलोग अपने-आपको ही खा जाओ। राजा जनक की प्यारी बेटी तथा महाराज दशरथ की प्रिय पुत्रवधू सीताजी को नहीं खा सकोगी। आज मैंने बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी स्वप्न देखा है, जो राक्षसोंके विनाश और सीतापति के अभ्युदय की सूचना देनेवाला है। 

त्रिजटा के ऐसा कहने पर वे सब राक्षसियाँ, जो पहले क्रोध से मूर्च्छित हो रही थीं, भयभीत हो उठीं और त्रिजटा से इस प्रकार बोलीं- अरी! बताओ तो सही, तुमने आज रात में यह कैसा स्वप्न देखा है?’ उन राक्षसियों के मुख से निकली हुई यह बात सुनकर त्रिजटा ने उस समय वह स्वप्न-सम्बन्धी बात इस प्रकार कही- आज स्वप्न में मैंने देखा है कि आकाश में चलने वाली एक दिव्य शिबिका (पालकी) है। वह हाथी दाँत की बनी हुई है। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए हैं और श्वेत पुष्पों की माला तथा श्वेत वस्त्र धारण किये स्वयं श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण के साथ उस शिबिका पर चढ़कर यहाँ पधारे हैं।

आज स्वप्न में मैंने यह भी देखा है कि सीता श्वेत वस्त्र धारण किये श्वेत पर्वत के शिखर पर बैठी हैं और वह पर्वत समुद्र से घिरा हुआ है, वहाँ जैसे सूर्यदेव से उनकी प्रभा मिलती है, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी से मिली हैं। मैंने श्रीरघुनाथजी को फिर देखा, वे चार दाँतवाले विशाल गजराजपर, जो पर्वत के समान ऊँचा था,लक्ष्मण के साथ बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। तदनन्तर अपने तेज से सूर्य के समान प्रकाशित होते तथा श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किये वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जानकीजी के पास आये। फिर उस पर्वत-शिखर पर आकाश में ही खड़े हुए और पति द्वारा पकड़े गये उस हाथी के कंधे पर जानकीजी भी आ पहुँचीं। इसके बाद कमलनयनी सीता अपने पति के अङ्क से ऊपर को उछलकर चन्द्रमा और सूर्य के पास पहुँच गयीं। वहाँ मैंने देखा, वे अपने दोनों हाथों से चन्द्रमा और सूर्य को पोंछ रही हैं उन पर हाथ फेर रही हैं* ॥

*जो स्त्री या पुरुष स्वप्नमें अपने दोनों हाथोंसे सूर्यमण्डल अथवा चन्द्रमण्डलको छू लेता है, उसे विशाल राज्यकी प्राप्ति होती है। जैसा कि स्वप्नाध्यायका वचन है। तत्पश्चात् जिस पर वे दोनों राजकुमार और विशाललोचना सीताजी विराजमान थीं, वह महान् गजराज लङ्का के ऊपर आकर खड़ा हो गया। फिर मैंने देखा कि आठ सफेद बैलों से जुते हुए एक रथ पर आरूढ़ हो ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी श्वेत पुष्पों की माला और वस्त्र धारण किये अपनी धर्मपत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ यहाँ पधारे हैं।इसके बाद दूसरी जगह मैंने देखा, सत्यपराक्रमी और बल-विक्रमशाली पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो उत्तर दिशा को लक्ष्य करके यहाँ से प्रस्थित हुए हैं। 

‘इस प्रकार मैंने स्वप्न में भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी श्रीराम का उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ दर्शन किया। श्रीरामचन्द्रजी महातेजस्वी हैं। उन्हें देवता, असुर, राक्षस तथा दूसरे लोग भी कदापि जीत नहीं सकते। ठीक उसी तरह, जैसे पापी मनुष्य स्वर्गलोक पर विजय नहीं पा सकते। 

कि सिगमंड फ्रायड ने पहली बार यह तर्क दिया था कि सपनों की तथाकथित “प्रकट विष्यवस्तु” अवचेतन में उपस्थित अव्यक्त स्वप्न-विचारों का परिणामस्वरूप स्वप्न का वास्तविक महत्त्व छुपा रहता है। फ्रायड के मूल निरूपण में अव्यक्त स्वप्न-विचार का “सेंसर” नामक एक अंतरात्मिक बल के अधीन होना वर्णित किया गया था; तथापि बाद के वर्षों में उनकी अधिक परिष्कृत शब्दावली में, चर्चा पराहम् तथा “अहं के रक्षा बलों के कार्य” के रूप में होती थी।

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