सचेतन 172 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दान से बड़ा दान देने और लेने की भावना है

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सचेतन 172 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दान से बड़ा दान देने और लेने की भावना है

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दान देने के लिये कायिक, वाचिक और मानसिक संकल्प की आवश्यकता होती है।

दान का साधारण अर्थ है देना और किसी भी सराहनीय कार्य और अवश्य किए जाने काम के लिए अग्र आप कुछ भी देते हैं तो उसका अर्थ दान से बढकर सेवा और सहायता हो जाता है। इस प्रकार का दान किसी न किसी तरह से समाज को समृद्ध और समर्थ बनाता है। देने का यह भाव खुद की दुनिया का फैलाव करता है। अपना दायरा उन लोगों तक फैला देता है जिन्हें दिया जा रहा है। दान का सर्वाधिक लोकप्रिय अर्थ किसी जरूरतमन्द को सहायता के रूप में कुछ देना है। यह भी सही है कि किसी को कुछ देना हो तो वह वस्तु पर्याप्त रूप में पास होना जरूरी है। इसीलिए धन का महत्व क्योंकि सभी स्थूल पदार्थों में सबसे ज्यादा है।

दान में कुछ कर्म को बर्जित किया गया है जैसे बिना दिये हुए दूसरे की वस्तु लेना, शास्त्र में वर्जित है हिंसा के साथ या हिंसा के लिए दान नहीं करना चाहिए। 

कटु बोलकर, झुठ बोलकर,परोक्ष में किसी का निंदा करके तथा निष्प्रयोजन बातें करके दान नहीं देना चाहिए।

दुसरे के द्रव्य को अन्यायसे लेने का विचार करके दान करना, मन से दूसरे का अनिष्ट चिंतन करते हुए दान करना तथा नास्तिक बुद्धि रखकर दान करना पाप के श्रेणी में आता है।  

अतः दान देने के लिये कायिक, वाचिक और मानसिक संकल्प की आवश्यकता होती है। संकल्पपूर्वक जो शारीरिक रूप से यानी कायिक भाव से किसी की सेवा करता है या उसके पास सूवर्ण, रजत आदि हो तो उसका दान करना चाहिए। किसी को माफ करना या अपने निकट किसी भयभीत व्यक्ति के आने पर अभय दान देना या आपके सुविचार से विद्या का दान देना आपका वाचिक दान है और इस दान से आपको आत्मिक संतुष्टि प्राप्त होती है। आप मानसिक रूप से किसी के प्रति अगर सद्भावना, सहनशीलता या सकारात्मकता ला कर किसी के हरेक भाव को स्वीकार करते हैं तो यह दान मानसिक दान है, और ऐसा करने के लिए आपको धर्म, जप और ध्यान की प्रभृति का उपार्जन करना होता है। 

किस भाव से दान देते हैं और दान लेते हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है एक कथा है- एक व्यक्ति को ईश्वर ने प्रसन्न होकर तीन गोले दान में दिए और कहा, हर गोले को भूमि पर गिराकर वह जो तीन बातें बोलेगा, वे पूरी हो जाएंगी। 

वह व्यक्ति ईश्वर का दान प्राप्त करके खुशी-खुशी घर में घुस ही रहा था कि उसका बेटा आकर उससे लिपट गया, जिससे एक गोला गिर गया। और वह गुस्से से बोला, ‘तेरी आंखें नहीं हैं?’ इतना कहते ही बच्चे की आंखें चली गईं। 

अब वह व्यक्ति घबराकर उसने झट दूसरा गोला जमीन पर गिरा कर कहा, ‘मेरे बेटे के चेहरे पर आंखें लग जाएं।’ बच्चे के चेहरे पर कई आंखें लग गईं। और बच्चे की सूरत बिगड़ गई क्योंकि वह आँख उसके गाल पर लग गया। उसकी भयानक सूरत देख कर उस व्यक्ति ने झट तीसरे गोले को नीचे गिराया और कहा, बेटे का चेहरा सामान्य हो जाए। इस तरह उसके तीनों वर वाणी की असंयमता के कारण बेकार हो गए।

दान में ध्यान का बहुत महत्व है की आप उस प्राप्त धन या मिली वस्तु का उपयोग सोच समझ कर करें। 

कायिक, वाचिक और मानसिक संकल्प से हम अपने आप से दान को देने या लेने का पहचान करते हैं और कहते हैं की जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी, अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे वैसी ही मूरत नज़र आती है।यहाँ दान की देने या लेने की भावना ही हमारा दृष्टिकोण है और उसकी उपयोगिता को सिद्ध करना हमारा संकल्प है। दान का प्रभाव एक मूरत यानी ईश्वरीय रूप में निकल कर आता है, वह किसी के कल्याण की बात हो या कोई भव्य निर्माण की बात हो या किसी के चेहरे पर ख़ुशी या मुस्कान लानी की बात हो यह सब आपके कुछ भी किसी को देने की भावना पर निर्भर करता है। 

वाणी और सद्भावयुक्त व्यवहार से अगर आप कुछ भी देते हैं तो  द्वेषभाव भी समाप्त हो सकता है। एक महात्मा ने अपनी आत्मकथा में कही है की एक बार जब वे महात्मा तप कर रहे थे तो एक शेर स्वामी गंगागिरि के पास आ गया। स्वामी जी घबराए नहीं। जब शेर उनके पास आया, तो उन्होंने उसे प्यार-दुलार किया। शायद अहिंसा से दिया गया दान परम धर्म है, जिस दान से बैर, भय और आशंका ये सब भी दूर हो जाते हैं।

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