सचेतन 2.44: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – धर्मलोप की आशंका

महाकपि हनुमान् जी को धर्म के भय से शंकित होना 

हनुमान जी ने अन्तःपुर और रावण की पानभूमि में सीता जी का पता लगाते लगाते वहाँ महाकाय राक्षसराज के भवन में गये जहां सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न मधुशाला थी और उसमें अलग-अलग मृगों, भैंसों और सूअरों के मांस रखे गये थे, जिन्हें हनुमान जी ने देखा। उनके साथ ही स्वच्छ दिव्य सुराएँ (जो कदम्ब आदि वृक्षों से स्वतः उत्पन्न हुई थीं) और कृत्रिम सुराएँ (जिन्हें शराब बनाने वाले लोग तैयार करते हैं) भी वहाँ रखी गयी थीं। उनमें शर्करासव, माध्वीक, पुष्पासवरे और फलासव भी थे। इन सबको नाना प्रकार के सुगन्धित चूर्णो से पृथक्-पृथक् वासित किया गया था।

उस अन्तःपुर में स्त्रियों की बहुत-सी शय्याएँ थी और कितनी ही सुवर्ण के समान कान्तिवाली सुन्दरी युवतियाँ एक-दूसरी का आलिंगन किये सो रही थीं। इस प्रकार महातेजस्वी कपिवर हनुमान् ने रावण का सारा अन्तःपुर छान डाला तो भी वहाँ उन्हें जनकनन्दिनी सीता का दर्शन नहीं हुआ।

उन सोती हुई स्त्रियों को देखते-देखते महाकपि हनुमान् जी धर्म के भय से शंकित हो उठे। उनके हृदय में बड़ा भारी संदेह उपस्थित हो गया। जिससे उनकी धर्मलोप की आशंका होने लगी हनुमान जी को लगा की क्या यह देखना अधर्म तो नहीं है।लेकिन इस शाक का स्वतः निवारण हो गया। वे सोचने लगे कि ‘इस तरह गाढ़ निद्रा में सोयी हुई परायी स्त्रियों को देखना अच्छा नहीं है। यह तो मेरे धर्म का अत्यन्त विनाश कर डालेगा। ‘मेरी दृष्टि अबतक कभी परायी स्त्रियों पर नहीं पड़ी थी। यहीं आने पर मुझे परायी स्त्रियों का अपहरण करने वाले इस पापी रावण का भी दर्शन हुआ है (ऐसे पापी को देखना भी धर्म का लोप करने वाला होता है) । 

तदनन्तर मनस्वी हनुमान जी के मन में एक दूसरी विचारधारा उत्पन्न हुई। उनका चित्त अपने लक्ष्य में सुस्थिर था; अतः यह नयी विचारधारा उन्हें अपने कर्तव्य का ही निश्चय कराने वाली थी। 

(वे सोचने लगे—) ‘इसमें संदेह नहीं कि रावण की स्त्रियाँ निःशंक सो रही थीं जैसे निर्भय और बिना किसी प्रकार के हिचक से हो और उसी अवस्था में मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है। 

सम्पूर्ण इन्द्रियों को शुभ और अशुभ अवस्थाओं में लगने की प्रेरणा देने में मन ही कारण है; किंतु मेरा वह मन पूर्णतः स्थिर है (उसका कहीं राग या द्वेष नहीं है; इसलिये मेरा यह परस्त्री-दर्शन धर्म का लोप करने वाला नहीं हो सकता)। 

विदेहनन्दिनी सीता को दूसरी जगह मैं ढूँढ़ भी तो नहीं सकता था; क्योंकि स्त्रियों को ढूँढ़ते समय उन्हें स्त्रियों के ही बीच में देखा जाता है। जिस जीव की जो जाति होती है, उसीमें उसे खोजा जाता है। खोयी हुई युवती स्त्री को हरिनियों के बीच में नहीं ढूँढ़ा जा सकता है। 

अतः मैंने रावण के इस सारे अन्तःपुर में शुद्ध हृदय से ही अन्वेषण किया है। किंतु यहाँ जानकी जी नहीं दिखायी देती हैं’।अन्तःपुर का निरीक्षण करते हुए पराक्रमी हनुमान् ने देवताओं, गन्धर्वो और नागों की कन्याओं को वहाँ देखा, किंतु जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा। 

दूसरी सुन्दरियों को देखते हुए वीर वानर हनुमान् ने जब वहाँ सीता को नहीं देखा, तब वे वहाँ से हटकर अन्यत्र जाने को उद्यत हुए। फिर तो श्रीमान् पवनकुमारने उस पानभूमि को छोड़कर अन्य सब स्थानों में उन्हें बड़े यत्न का आश्रय लेकर खोजना आरम्भ किया। 

उस राजभवन के भीतर स्थित हुए हनुमान् जी सीताजी के दर्शन के लिये उत्सुक हो क्रमशः लतामण्डपों में, चित्रशालाओं में तथा रात्रिकालिक विश्रामगृहों में गये; परंतु वहाँ भी उन्हें परम सुन्दरी सीता का दर्शन नहीं हुआ। 

रघुनन्दन श्रीराम की प्रियतमा सीता जब वहाँ भी दिखायी न दी, तब वे महाकपि हनुमान् इस प्रकार चिन्ता करने लगे- ‘निश्चय ही अब मिथिलेशकुमारी सीता जीवित नहीं हैं; इसीलिये बहुत खोजने पर भी वे मेरे दृष्टिपथ में नहीं आ रही हैं।

सती-साध्वी सीता उत्तम आर्यमार्ग पर स्थित रहने वाली थीं। वे अपने शील और सदाचार की रक्षा में तत्पर रही हैं; इसलिये निश्चय ही इस दुराचारी राक्षसराज ने उन्हें मार डाला होगा। 

इस प्रकार से सीता के मरण की आशंका से हनुमान्जी को शिथिल कर रही थी, फिर उत्साह का आश्रय ले उनकी खोज करने में हनुमान जी फिर से जुट गये और कहीं भी पता न लगने से पुनः उनका चिन्तिन शुरू हो गया।

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