सचेतन 181: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- नरक की कल्पना

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सचेतन 181: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- नरक की कल्पना

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पाप या अपराध का दंड ज़रूर मिलता है

पाप या गुनाह या सामान्य भाषा में कहे तो बुरे कार्यों कई प्रकर के होते हैं जैसे 

हिंसा किसी जीव को मारना,उसे दुख देना हिंसा हैं, असत्य झूठ बोलना, चोरी किसी वस्तु को बिना आज्ञा ग्रहण करना,चुराना, कुशील व्यभिचार रूप गलत कार्यों को करना यहाँ तक की परिग्रह यानी अपरिग्रह गैर-अधिकार की भावना, गैर लोभी या गैर लोभ की अवधारणा यह सब पाप की श्रेणी में आता है। 

प्रत्येक पाप का फल मिलता है। जिसको हम नरक भी कहते हैं। यज्ञ और ग्राम को नष्ट करने वाले को घोर वैतरणी नदी पार करना पड़ता है यानी वह नदी जिसमें प्रायः बाढ़ हुआ करती है, धर्म की मर्यादा को तोड़ते से अपवित्र आचार-विचार और छल-कपट से जीविका चलाने वाले को कृत्य नामक नरक में जाना पड़ता है। जो अकारण ही वृक्षों को काटता है, वह असि-पत्रवन नामक नरक में जाता है जहां पुराणों के अनुसार वह सहस्त्र योजन की जलती भूमि है, जिसके बीच में एक जंगल है जिसके पत्ते तलवार के समान हैं वह असिपत्रवन कहलाता है। 

भेंड़ों को बेचकर जीविका चलाने वाले तथा पशुओं की हिंसा करने वाले कसाई वहिनिज्चवाल नामक नरक में गिरते हैं। भ्रष्टाचारी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा जो कच्चे खपड़ों अथवा ईंट आदि को पकाने के लिये पजावे में आग देता है, वे सब उसी वहिनिच्चाल नरक में गिरते हैं। जो व्रतोंका लोप करने वाले तथा अपने आश्रम से गिरे हुए हैं, वे दोनों ही प्रकार के पुरुष अत्यन्त दारुण संदंश नामक नरक की यातना में पड़ते हैं यानी ये ऐसे घुमावदार संदंश उपकरण है जो कैंची की तरह दिखते हैं। 

नरक, स्वर्ग का विलोमार्थक है। विश्व की प्राय: सभी जातियों और धर्मों की आदिम तथा प्राचीन मान्यता के अनुसार मरणोत्तर अधोलोक यानी नीचे का लोक पाताल में यानी वह स्थान या अवस्था जहाँ किसी देवता, देवदूत या राक्षस द्वारा अधर्मी, नास्तिक, पापी और अपराधी दुष्टात्माएँ दंडित होती हैं वहाँ जाना पड़ता है। यह विभिन्न संस्कृतियों में नरक की कल्पना है।

सामान्यतः ठंडे देशों में नरक की कल्पना हिमाच्छादित लोक और गर्म देशों में अग्नितप्त लोक के रूप में मिलती है। इसकी स्थिति, संख्या, प्रकार और दंडयातना के संबंध में विविध कल्पनाएँ हैं।

हिंदू धर्म में नरक को दक्षिण में सूचित किया गया है और पाताल के निम्नतल भाग में कल्पित कहा गया है, जहाँ चित्रगुप्त की पुष्टि पर यमदेवता पापी को उसके अपराध के अनुसार 28 प्रकार के नरकों में से किन्हीं की यातना देने का निर्णय अपने दूतों को देते हैं। अथर्ववेद से भागवत पुराण तक आते आते नरकों की संख्या 50 करोड़ हो गई हैं।

मुस्लिम नरक (‘नरक (दोजख)’ और ‘जहन्नुम’) विशाल अग्निपुंज के समान है और सातवें तबके में तहत-उल-शरी में स्थित है जहाँ मालिक नामक देवदूत के अनुशासन में 19 स्वीरों (जबानिया) या दूतों द्वारा ईश्वरी कृपा से वंचित गुनहगारों को धकेल दिया जाता है।जबानिया यानी पापियों को नरक में पीड़ा देने वाले। वे कुरान की आयत 96:18 में प्रकट होते हैं।

पारसी नरक (गाथा के अनुसार ‘द्रूजो देमन’, ‘पहलवी’ द्रूजोत्मन) उत्तर दिशा में स्थित अंधकार तथा दुर्गंधपूर्ण, आर्तनाद से मुखरित और असह्य शीतल है।

ईसाई नरक तिमिराच्छन्न बृहत्‌ गर्त, यंत्रणाभोग का कारागार, चिर प्रज्वलित अग्निलोक और अग्निसरोवर के रूप में वर्णित है।

इस प्रकार मुख्यतः दो ढंग के नरकों का उल्लेख मिलता है – शीतकर और दाहकर। बौद्धधर्म में इन दोनों प्रकार के नरकों की अलग अलग संख्याएँ क्रमश: आठ और सात हैं। विद्वानों का मत है कि आग्नेय नरक की कल्पना ईसाई मूल की है किंतु इसे पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता।

नरक के स्वरूपों और परलोक में पापियों के प्रति दंड की धारणा का क्रमिक विकास हुआ है। भारतीय नरक कल्पना का इतिहास ऋग्वैदिक अथवा उससे भी प्राचीन हो सकता है।

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