सचेतन 2.17: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – पराक्रम की परीक्षा से स्वयं के शक्ति और ज्ञान का आकलन होता है

देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा सूर्यतुल्य तेजस्विनी नागमाता सुरसा के द्वारा लिया। 

हनुमान जी मैंनाक पर्वत से सत्कार पा कहा – मैनाक मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है मेरा आतिथ्य हो गया और महाबली वांशिरोमणि हनुमान ने अपने हाथ से मैंनाक का स्पर्श किया और आकाश में ऊपर उठकर चलने लगे। 

हनुमान जी का यह अत्यन्त दुष्कर कर्म (कठिन कार्य) देखकर सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और महर्षिगण उनकी प्रशंसा करने लगे। वहाँ आकाश में ठहरे हुए देवता तथा सहस्र नेत्रधारी इन्द्र उस सुन्दर मध्य भागवाले सुवर्णमय मैनाक पर्वत के उस कार्य से बहुत प्रसन्न हुए। उस समय स्वयं बुद्धिमान् शचीपति इन्द्र ने अत्यन्त संतुष्ट होकर पर्वतश्रेष्ठ सुनाभ नाक या सुदर्शन चक्र समान सुदर एव सुडौल नासिका वाला मैनाक पर्वत से गद्गद वाणी में कहा- ‘सुवर्णमय शैलराज मैनाक! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। सौम्य! तुम्हें अभय दान देता हूँ। तुम सुखपूर्वक जहाँ चाहो, जाओ।

हनुमान जी को सौ योजन समुद्र को लाँघते समय उनके मन में कोई भय नहीं रहा है, फिर भी शचीपति इन्द्र के हृदय में यह भय था कि पता नहीं इनका क्या होगा? मैनाक ने  हनुमान जी को विश्राम का अवसर देकर तुमने उनकी बहुत बड़ी सहायता की है। ‘ये वानरश्रेष्ठ हनुमान् दशरथनन्दन श्रीराम की सहायता के लिये ही जा रहे हैं। तुमने यथाशक्ति इनका सत्कार करके मुझे पूर्ण संतोष प्रदान किया है’। देवताओं के स्वामी शतक्रतु इन्द्र को संतुष्ट देखकर पर्वतों में श्रेष्ठ मैनाक को बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। शतक्रतु इन्द्र यानी एक वृहदाकार देवता जिनका शरीर पृथ्वी के विस्तार से कम से कम दस गुना है। सौ गुना शक्तियों वाला देवता। इस प्रकार इन्द्र का दिया हुआ वर पाकर मैनाक उस समय जल में स्थित हो गया और हनुमान जी समुद्र के उस प्रदेश को उसी मुहूर्त में लाँघ गये। 

अगर किसी के मन में सच्ची प्रत्युपकार (किसी उपकार के बदले में सत्कार ग्रहण करने से सम्मान होना) की भावना होती है तो सिर्फ़ उसे उसका उपकारी व्यक्ति ही नहीं अपितु दूसरे भी उससे प्रभावित होते है जैसे मैंनाक पर्वत के हनुमान जी  के लिए प्रत्युपकार की भावना और भाव की अभिव्यक्ति से शचीपति इन्द्र को मैनाक के प्रति संतुष्ट और बड़ा हर्ष हुआ। 

तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने सूर्यतुल्य तेजस्विनी नागमाता सुरसा से कहा- ‘ये पवननन्दन श्रीमान् हनुमान जी समुद्र के ऊपर होकर जा रहे हैं। तुम दो घड़ी के लिये इनके मार्ग में विघ्न डाल दो। ‘तुम पर्वत के समान अत्यन्त भयंकर राक्षसी का रूप धारण करो। उसमें विकराल दाढ़ें, पीले नेत्र और आकाश को स्पर्श करने वाला विकट मुँह बनाओ। ‘हमलोग पुनः हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेना चाहते हैं। या तो किसी उपाय से ये तुम्हें जीत लेंगे अथवा विषाद में पड़ जायँगे (इससे इनके बलाबल होने का ज्ञान हो जायगा)’। 

देवताओं के सत्कारपूर्वक इस प्रकार कहने पर देवी सुरसा ने समुद्र के बीच में राक्षसी का रूप धारण किया। उसका वह रूप बड़ा ही विकट, बेडौल और सबके लिये भयावना था। वह समुद्र के पार जाते हुए हनुमान् जी को घेरकर उनसे इस प्रकार बोली- ‘कपिश्रेष्ठ! देवेश्वरों ने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताकर मुझे अर्पित कर दिया है, अतः मैं तुम्हें खाऊँगी तुम मेरे इस मुँह में चले आओ। ‘पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने मुझे यह वर दिया था।’ ऐसा कहकर वह तुरंत ही अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान् जी के सामने खड़ी हो गयी। 

कभी कभी आपके बल और पराक्रम की परीक्षा देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि या गुरु या माता पिता या फिर पूरा समाज लेता है कि आप सच में महान कार्य कर सकेंगे या की नहीं। आप अगर डटकर मुक़ाबला करते हैं या ज्ञान से उपाय ढूँढते हैं तो आप जीत जाते हैं अथवा आप विषाद यानी दुःख, अवसाद, उदासी या ग़म में भी पड़ सकते हैं की मुझसे इतनी परीक्षा क्यों ली जाती है। आप इस प्रकार के परीक्षा को समझें की वह आपको अपने ही शक्ति या ज्ञान को समझने का मौक़ा मिल रहा है। देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने भी यही सोचकर नागमाता सुरसा को हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेना चाहा जिससे उनके बलाबल का ज्ञान हो जायगा।

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