सचेतन 135 : श्री शिव पुराण- पशुपति मंदिर की कथा

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सचेतन 135 : श्री शिव पुराण- पशुपति मंदिर की कथा

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योगी शिव और शून्यता

पशुपति शैववाद सबसे पुराने शैव संप्रदायों में से एक है, जिसका नाम पशुपति से लिया गया है । संप्रदाय पशुपति को “सर्वोच्च देवता, सभी आत्माओं का स्वामी और सभी अस्तित्व का कारण” मानता है।

पशुपति मंदिर बागमती नदी के किनारे पर देवपाटन नामक गाँव में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध और पवित्र हिंदू मंदिर है। यह हिंदू मंदिर बागमती नदी के किनारे पर सदियों से बसाये गए मंदिरों, आश्रमों, मूर्तियों और शिलालेखों का विशाल संग्रह है। सन 1979 ईस्वी से यूनेस्को ने इस मंदिर परिसर को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया है।

पशुपतिनाथ मंदिर के बारे में कई प्रकार की कथाएँ बताई जाती  हैं। एक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव और पार्वती काठमांडू घाटी में आए और यात्रा के दौरान बागमती नदी के किनारे पर विश्राम किया। भगवान शिव यहाँ की खूबसूरती और जंगलों से इतने खुश हुए, कि उन्होंने और पार्वती ने खुद को हिरण के रूप में बदल लिया और जंगलों में घूमने चले गए। काठमांडू घाटी में कई ऐसे स्थान हैं, जहां भगवान शिव हिरण के रूप में गए हुये थे। कुछ लोग और देवता भगवान शिव की खोज करने लगे। जब भगवान शिव मिले तो भगवान शिव ने बताया कि, वह एक सुंदर हिरण का रूप धारण करके वह नदी के किनारे पर घूमने आये थे, उस दिन से भगवान शिव के इस स्वरूप को भगवान पशुपतिनाथ का रूप मानने लगे।

कुछ अन्य कथाओं के अनुसार जब पांडवों ने युद्ध जीतने के बाद उन पर लेगे भ्रात हत्या के पाप से बचने के लिए वह लोग भगवान शिव को खोज रहे थे। लेकिन भगवान शिव पांडवों से अप्रसन्न होकर उनको दर्शन नहीं देना चाहते थे। लेकिन फिर भी पांडव भगवान शिव को खोजते-खोजते केदारनाथ तक पहुँच गए थे। भगवान शिव ने उंसव बचने के लिए बैल का रूप रख लिया। लेकिन पांडवों ने उन्हे पहचान लिया और भीम ने उनको पकड़ लिया, बैल के रूप में भगवान शिव धरती के अंदर शमाने लगे। शरीर का आधा भाग धरती में शमाने के बाद भगवान शिव का सिर काठमांडू में गिरा था। उसी दिन से यहाँ भगवान शिव को पशुपतिनाथ के नाम से जाना जाता है।

पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण कार्य नेपाली शिवालय शैली के अनुसार किया गया है। पशुपतिनाथ मंदिर में शिवालय शैली में पाये जाने वाली सभी विशेषताएं विराजमान हैं। इस मंदिर परिसर में एक सोने का शिखर भी विराजमान है। मंदिर के अंदर बाहरी और भीतरी दो गर्भगृह हैं, अंदर वाले गर्भगृह में भगवान शिव जी का पंच मुखि मूर्ति रखी जाती है, बाहर वाला  गर्भगृह एक खुला गलियारा जैसा स्थान है।

मंदिर के गर्भगृह में मुख्य मूर्ति एक पत्थर का शिवलिंग है। जो चांदी की योनि आधार और चांदी के सर्प से बंधा होता है। यह शिवलिंग एक मीटर ऊँचा है। इसके पंच मुख चारों दिशाओं की ओर हैं। ये चेहरे भगवान शिव के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, सद्योजाता (बरुण के नाम से भी जाना जाता है), वामदेव (अर्धनारेश्वर के नाम से भी जाना जाता है), तत्पुरुष, अघोरा और ईशान (कल्पनाशील)। पश्चिम, उत्तर, पूर्व, दक्षिण और जेनिथ का सामना करना क्रमशः पांच प्राथमिक तत्वों अर्थात् पृथ्वी, जल, वायु, प्रकाश और आकाश का प्रतिनिधित्व करता है।

अगर आप हिंदू हैं, तो आप अपने साथ कोई सबूत (आईडी कार्ड) लेकर आएं। यह आपको आंतरिक मंदिर प्रांगण तक पहुंचने की अनुमति देगा।

मंदिर का निर्माण करते समय छत और शिखर पर भारी मात्रा में सोना का प्रयोग किया गया  है। मंदिर के दरवाजे चांदी की चादरों से सजे हैं और मंदिर के अंदर स्थित नंदी बैल मूर्ति भी सोने से बनी है।

मंदिर परिसर में जितनी भी पेंटिंग हैं, उनमे से ज्यादातर पेंटिंग सोने से बनाई गई हैं।

 यह एक बहुत ही पवित्र मंदिर है। लेकीन फिर भी इस मंदिर की छत में कई ऐसे चित्र बने हैं, जो यौन मुद्राओं का वर्णन करते हैं। इससे यह बात पता चलती है कि हिंदू धर्म के प्राचीन काल में यौन संस्कृति धर्म का एक अभिन्न अंग थी।

मंदिर में स्थित आर्य घाट को नेपाल के सभी स्थानों में सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। इन घाटियों का पानी बहुत स्वछ और साफ सुथरा है। इन घाटियों में नेपाल दरबार के शाही सदस्यों का अंतिम संस्कार भी किया जाता था।

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यदि किसी व्यक्ति ने कई पाप किए हैं, तो वह अगले जन्म में मनुष्य के रूप में जन्म नहीं लेगा। अगले जन्म में उसे जानवर के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। लेकिन ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति को भगवान पशुपतिनाथ का आशीर्वाद मिल जाता है वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।

वर्ष 2015 में जब नेपाल में सबसे तीव्र भूकंप आया तो यहाँ की भौगोलिक संरचनाओं और मानव जीवन को बहुत क्षति उठानी पड़ी थी। लेकिन उस भूकंप के दौरान भी इस मंदिर को किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ था।

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