सचेतन 228: शिवपुराण- वायवीय संहिता – प्राण वायु से रोगों का विनाश होता है

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सचेतन 228: शिवपुराण- वायवीय संहिता – प्राण वायु से रोगों का विनाश होता है

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हमारे पांच प्राण और पांच उप-प्राण हैं 

अध्यात्म का ज्ञान शरीर को जानने से आरंभ होता है आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करना है तो शरीर की शुद्धि आवश्यक है जो योग, ध्यान, आराधना और प्रार्थना से संभव है यानी आत्म ज्ञान का मार्ग सिद्धि कर्मों से खुलता है।  

उपमन्यु महर्षि आयोद धौम्य के शिष्यों में से एक थे और एक बार उपमन्यु  ने श्री कृष्णजी से सिद्धि कर्मों के बारे में पूछे तो उन्होंने कहा की सिद्धि कर्म का मार्ग हमारे प्राण वायु से शुरू होता है। सर्वप्रथम प्राण वायु को जीतना चाहिए क्योंकि इस पर विजय प्राप्त होने से सब वायुओं पर विजय मिल जाती है। क्रमानुसार अभ्यस्त किया गया प्राणायाम सब दोषों को हटा देता है। यह शरीर की भी रक्षा करता है। जब प्राण वायु पर विजय प्राप्त हो जाती है तो विष्ठा, मूत्र, कफ सभी मंद पड़ जाते हैं। श्वास वायु लंबी तथा देर से आने लगती है। हल्कापन, द्रुतगमन, उत्साह, बोलने में चातुर्य सभी रोगों का विनाश सब प्राणायाम की सिद्धि से पूरे हो जाते हैं।

प्राण समस्त जीवन का आधार और सार है; यह वह ऊर्जा है जो तेज है, और सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। प्राण उस प्रत्येक वस्तु में प्रवाहित होता है जिसका अस्तित्व है।

प्राण भौतिक संसार में चेतना और मन के मध्य का सम्पर्क सूत्र है। यही तो भौतिक स्तर पर जीवन को संभव बनाता है। प्राण सभी शारीरिक कार्यों को विनियमित करता है, उदाहरणार्थ श्वास, ऑक्सीजन की आपूर्ति, पाचन, निष्कासन-अपसर्जन और बहुत कुछ। मानव शरीर का कार्य एक ट्रांसफॉर्मर की भांति है, जो विश्व भर में प्रवाहित प्राण से ऊर्जा प्राप्त करता है, इस ऊर्जा का आवंटन करता है और फिर इसे समाप्त कर देता है। यदि किसी व्यक्ति या कमरे में स्वस्थ, व्यवस्थित स्पंदन है, तो हम कहते हैं “यहां अच्छा प्राण है”।

इसके विपरीत रुग्णता, प्राण के प्रवाह में बाधा डालती है या रोकती है। हम ज्यों-ज्यों प्राण को नियन्त्रित करने की योग्यता विकसित करते हैं, हम शरीर और मन दोनों के स्वास्थ्य व समन्वय को प्राप्त कर लेते हैं। इसके साथ ही दीर्घ और अनवरत अभ्यास के साथ चेतना के विस्तार का भी अनुभव होने लगता है।

प्राण दस मुख्य कार्यों में विभाजित है :-

पांच प्राण : प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान।

पांच उप-प्राण : नाग, कूर्मा, देवदत्त, कृकला और धनन्जय

प्राण, ब्रह्माण्ड-प्राण का वह विशेष कार्य है, जो मानव-शरीर को अनिवार्य ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। इसकी ऊर्जा नासिका-छिद्रों से हृदय-स्तर तक प्रवाहित होती है।

अपान प्राण शरीर के निम्न-भाग को, नाभि से पैरों के तलवों तक को प्रभावित करता है। यह प्राण निष्कासन-प्रक्रिया को विनियमित करता है। 

व्यान प्राण मानव शरीर के नाड़ी मार्ग से प्रवाहित होता है। इसका प्रभाव पूरे शरीर पर और विशेष रूप में नाडिय़ों पर होता है। 

उदान प्राण वह उच्च आरोही ऊर्जा है, जो हृदय से सिर और मस्तिष्क में प्रवाहित होती है। उदान प्राण कुण्डलिनि शक्ति के जाग्रत होने पर उसके साथ होती है। 

समान अति महत्त्वपूर्ण प्राण है, जो दो मुख्य चक्रों- अनाहत एवं मणिपुर चक्रों को जोड़ता है।समान प्राण आहार की ऊर्जा को सम्पूर्ण शरीर में वितरित करता है। 

पांच उप-प्राण

नाग – डकारना, कूर्मा – झपकना, देवदत्त (जम्हाई), कृकला – छींकना, धनन्जय – हृदय वाल्वों का खुलना व बन्द होना।

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