सचेतन 222: शिवपुराण- वायवीय संहिता – बाह्य इन्द्रियां और अन्त:करण आपके कर्म के द्वार हैं

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सचेतन 222: शिवपुराण- वायवीय संहिता – बाह्य इन्द्रियां और अन्त:करण आपके कर्म के द्वार हैं

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सचेतन 222: शिवपुराण- वायवीय संहिता – बाह्य इन्द्रियां और अन्त:करण आपके कर्म के द्वार हैं 

जीवन की शुद्धिकरण के लिए तप का प्रयोग करना होता है। 

हम चर्चा कर रहे थे की आप जब आध्यात्मिक मार्ग पर होते हैं तो आप अपने परम लक्ष्य तक पहुंचने की जल्दी में होते हैं, आप स्वयं के साक्षात्कार को जल्दी पूरा करना चाहते हैं और यह आध्यात्मिक प्रक्रिया आपके जीवन का बहुत सारे आयाम खोल देती है, ऐसा नहीं है की इस प्रक्रिया में सब कुछ सकारात्मक ही होगा, आपके साथ नकारात्मक चीजें भी होती हैं। अगर आप वाकई आध्यात्मिक मार्ग पर हैं तो आपके चारों ओर हर चीज उथल-पुथल में लगती है। लेकिन आप फिर भी बढ़ रहे हैं, तो यह ठीक है। 

कर्म की प्रधानता शिवपुराण के वायवीय संहिता बहुत ही अच्छे से किया गया है की कर्म दो प्रकार के हैं-पुण्यकर्म और पापकर्म। पुण्यकर्म का फल सुख और पापकर्म का फल दुःख है। कर्म अनादि है यानी कर्म का आदि नहीं है यह कर्म की प्रक्रिया जन्म जन्मांतर से चल रहा है जिसके आरंभ का कोई काल या स्थान नहीं है।

आप जैसे जैसे कर्म के फल का उपभोग कर लेते हैं वैसे ही उसका अन्त हो जाता है। यानी भोग कर्म का विनाश करनेवाला है, प्रकृति को भोग्य कहते हैं और भोग का साधन है शरीर। 

इस शरीर में बाह्य इन्द्रियां और अन्त:करण कर्म भोग का द्वार हैं। अतिशय भक्तिभाव से उपलब्ध हुए महेश्वर के कृपाप्रसाद से मल का नाश होता है और मल का नाश हो जाने पर पुरुष निर्मल-शिव के समान हो जाता है। मल आपका आत्माश्रित दुष्ट भाव है जैसे मिथ्या ज्ञान का होना, अधर्म का मार्ग अपनाना, शक्ति का क्षय या दुरुपयोग करना, अकारण किसी का हेतु यानी माध्यम बनाना और च्युति यानी उपयुक्त कर्म को करने से चूक जाना यानी कर्तव्यविमुखता होना।

जब हम मल का नाश करना चाहते हैं तो यह तप से ही संभव होता है। यह तो आप लोग भी जानते हैं कि बिना तपाये किसी धातु का मल नष्ट नहीं होता। धातु को यदि निर्मल बनाना है तो उसका तपना आवश्यक है। आपका यह जो जीवन है, इसे भी शास्त्रकारों ने धातु ही माना है और इस धातु को शुद्ध करने के लिए तप का प्रयोग बताया है।

पुरुष के माया से आवृत रहना ही मल का आवरण होना है । मल और कर्म के द्वारा प्रकृति का पुरुष के साथ सम्बन्ध होता है । शिव ही इन दोनों के प्रेरक ईश्वर हैं । माया महेश्वर की शक्ति है । चित्स्वरूप जीव उस माया से आवृत है । चेतन जीव को आच्छादित करनेवाला अज्ञानमय पाश ही मल कहलाता है । उससे शुद्ध हो जाने पर जीव स्वतः ही शिव हो जाता है । वह विशुद्ध ही शिवतत्व है ।

आपके व्यापक हो जाने पर भी आपके तत्त्व को मल का आंशिक आवरण प्राप्त होता है; क्योंकि कला आदि भी व्यापक हैं । भोग के लिए किया गया कर्म ही उस आवरण में कारण है। मल का नाश होने से वह आवरण दूर हो जाता है। 

विद्या पुरुष की ज्ञानशक्ति को और कला उसकी क्रियाशक्ति को अभिव्यक्त करनेवाली हैं। राग भोग्य वस्तु के लिये क्रिया में प्रवृत्त करने वाला होता है। काल उसमें अवच्छेदक होता है और नियति उसे नियन्त्रण में रखनेवाली है। अव्यक्त रूप जो कारण है, वह त्रिगुणमय है; उसी से जड जगत्की उत्पत्ति होती है और उसी में उसका लय होता है। तन्व-चिन्तक पुरुष उस अव्यक्त को ही प्रधान और प्रकृति कहते हैं।

सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण प्रकृति से प्रकट होते हैं।

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