सचेतन 2.82: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – इंद्र के पुत्र जयंत नामक के कौवे पर श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र चलाया

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सचेतन 2.82: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – इंद्र के पुत्र जयंत नामक के कौवे पर श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र चलाया

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पिछले विचार के सत्र में एक मांसलोलुप कौआ सीता जी को चोंच मारने लगा और सीता जी उस पक्षी पर बहुत कुपित होकर दृढ़तापूर्वक अपने लहँगे को कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी तो उस समय उनक वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में श्री राम ने उनको देख लिया।अब आगे- 

सीता जी कहती हैं कि कौवों चहचहाहट करता हुआ बार बार मुझे परेशान करने लगा यह देखकर आपने (श्री राम ने) मेरी हँसी उड़ायी। इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लज्जित हो गयी। इतने में ही उस भक्ष्य-लोलुप कौएने फिर चोंच मारकर मुझे क्षत-विक्षत कर दिया और उसी अवस्था में मैं आपके पास आयी।

आप वहाँ बैठे हुए थे। मैं उस कौए की हरकत से तंग आ गयी थी। अतः थककर आपकी गोद में आ बैठी। उस समय मैं कुपित-सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी।

सीता जी ने हनुमान जी को मृदु वाणी में कहा “‘नाथ! कौए ने मुझे कुपित कर दिया था। मेरे मुखपर आँसुओं की धारा बह रही थी और मैं धीरे-धीरे आँखें पोंछ रही थी। आपने मेरी उस अवस्था को लक्ष्य किया।

क्या कहूँ ‘हनुमान्! मैं तो थक जाने के कारण उस दिन बहुत देर तक श्रीरघुनाथजी की गोद में सोयी रही। फिर उनकी बारी आयी और वे भी मेरी गोद में सिर रखकर सो रहे थे। इसी समय वह कौआ फिर वहाँ आया। मैं सोकर जगने के बाद श्रीरघुनाथजी की गोद से उठकर बैठी ही थी कि उस कौए ने सहसा झपटकर मेरी छाती में चोंच मार दी।

यह दृश्य दर्दनाक सा बन गया था। 

सीता जी ने कहा “उस कौवे ने बारंबार उड़कर मुझे अत्यन्त घायल कर दिया। मेरे शरीर से रक्त की बूंदें झरने लगीं, इससे श्रीरामचन्द्रजी की नींद खुल गयी और वे जागकर उठ बैठे। मेरी छाती में घाव हुआ देख महाबाहु श्रीराम उस समय कुपित हो उठे और फुफकारते हुए विषधर सर्प के समान जोर-जोर से साँस लेते हुए बोले- सुन्दरी! किसने तुम्हारी छाती को क्षत-विक्षत किया है ? कौन रोष से भरे हुए पाँच मुखवाले सर्प के साथ खेल रहा है?’ ‘इतना कहकर जब उन्होंने इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उस कौए को देखा, जो मेरी ओर ही मुँह किये बैठा था। उसके तीखे पंजे खून से रँग गये थे। वह पक्षियों में श्रेष्ठ, कौए के वेश में इंद्र का पुत्र जयंत था। उसकी गति वायु के समान तीव्र थी। वह शीघ्र ही स्वर्ग से उड़कर पृथ्वी पर आ पहुँचा था।

जब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महाबाहु श्रीराम के नेत्र क्रोध से घूमने लगे, तो क्या होगा और उन्होंने उस कौवे को कठोर दण्ड देने का विचार किया।

“श्रीराम ने कुश की चटाई से एक कुश निकाला और उसे ब्रह्मास्त्र के मन्त्र से अभिमन्त्रित किया। अभिमन्त्रित करते ही वह कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा।

श्रीराघुनाथजी ने वह प्रज्वलित कुश उस कौए की ओर छोड़ा। फिर तो वह आकाश में उसका पीछा करने लगा। उस कौए ने अपने प्राण बचाने के लिए सम्पूर्ण जगत् में भागते फिरे, लेकिन उस बाण ने कहीं भी उसका पीछा नहीं छोड़ा।

उसके पिता इन्द्र तथा समस्त श्रेष्ठ महर्षियों ने भी उसका परित्याग कर दिया। तीनों लोकों में घूमकर अन्त में वह पुनः भगवान् श्रीराम की ही शरण में आया।

रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं। उन्हें उस पर दया आ गयी; अतः वध के योग्य होने पर भी उस कौए को उन्होंने मारा नहीं, उबारा।

उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी और वह उदास होकर सामने गिरा था। इस अवस्था में उसको लक्ष्यकर के भगवान् बोले—ब्रह्मास्त्र को तो व्यर्थ किया नहीं जा सकता। अतः बताओ, इसके द्वारा तुम्हारा कौन-सा अङ्ग-भङ्ग किया जाय’॥

“फिर उसकी सम्मति के अनुसार श्रीराम ने उस अस्त्र से उस कौए की दाहिनी आँख नष्ट कर दी। इस प्रकार दायाँ नेत्र देकर वह अपने प्राण बचा सका।”

“तदनन्तर दशरथनन्दन राजा राम को नमस्कार करके उस कौए ने विदा लेकर वह अपने निवासस्थान को चला गया”

सीता जी हनुमान जी से कहती हैं की “‘कपिश्रेष्ठ! तुम मेरे स्वामी से जाकर कहना —’प्राणनाथ! पृथ्वीपते! आपने मेरे लिये एक साधारण अपराध करने वाले कौए पर भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था; फिर जो आपके पास से मुझे हर ले आया, उसको आप कैसे क्षमा कर रहे हैं?”

“‘नरश्रेष्ठ! मेरे ऊपर महान् उत्साहसे पूर्ण कृपा कीजिये। प्राणनाथ! जो सदा आपसे सनाथ है, वह सीता आज अनाथ-सी दिखायी देती है।”

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ।।

मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ।।

भावार्थः- हे तात! इंद्रपुत्र जयंत की कथा ( घटना ) सुनाना और प्रभु को उसके बाण का प्रताप समझाना ( स्मरण कराना ) । यदि महीने भर मे नाथ न आए तो फिर मुझे जीती न पाएँगे ।।

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