सचेतन 242: शिवपुराण- वायवीय संहिता – मंत्रयोग

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सचेतन 242: शिवपुराण- वायवीय संहिता – मंत्रयोग

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मंत्र साधना से एकाग्रता की स्थिति प्राप्त होती है।

मुनि उपमन्यु बोले, हे केशव ! अब मैं आपको योग विधि के बारे में बताता हूं। जिसके द्वारा सभी विषयों से निवृत्ति हो और अंतःकरण की सब वृत्तियां शिवजी में स्थित हो जाएं, वह परम योग है। आपका शून्य होना ही आपका प्राकृतिक गुण है क्योंकि इस गुण के रूप में शिव आपके साथ विराजमान हैं। 

‘मंत्र’ का समान्य अर्थ है- ‘मननात् त्रायते इति मन्त्रः’। मन को त्राय (पार कराने वाला) मंत्र ही है। मन्त्र योग का सम्बन्ध मन से है, मन को इस प्रकार परिभाषित किया है- मनन इति मनः। जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है। साफ आसन पर किसी भी ध्यानात्मक आसन (सुखासन,पद्मासन या वज्रासन) में बैठकर आंखे बंद कर गहरी सांस भरते हुए ऊं मंत्र, गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर सकते हैं। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है तो वह सिद्ध होने लगता है।

मंत्र से ध्वनि तरंगें पैदा होती है मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है। मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्व है वे घटक-उच्चारण, लय व ताल हैं। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को बढ़ा देता है। मंत्रजप मुख्यरूप से चार प्रकार से किया जाता है।

(1) वाचिक (2) मानसिक (3) उपांशु (4) अजप्पा ।

वाचिक का अर्थ है वाणी के साथ यानी वाणी से किया हुआ यानी बोला या संकेत से कहा हुआ। 

मानसिक का संबंध मन से है यानी मन की कल्पना से किया हुआ कार्य।  

उपांशु का अर्थ है भजन जप, मंत्र कम स्वर में, एक murmured प्रार्थना होता है। 

अजपा: जप (या जपम) का अर्थ है किसी मंत्र (या मंत्रम) को दोहराना या याद रखना, और अजपा-जप का अर्थ है मंत्र के बारे में, निरंतर जागरूकता बना कर रखना। अजपा का अर्थ है “कोई जप नहीं”, इस प्रकार अजपा का अर्थ है किसी भी भौतिक चीज़ के बारे में सोचना बंद करना। इस प्रकार, अजपा-जप मंत्र को दोहराने के लिए सामान्य रूप से आवश्यक मानसिक प्रयास के बिना जप का अभ्यास है (प्रयास उन लोगों के लिए आवश्यक है जो खुद को पूरी तरह से भगवान को समर्पित करने के लिए पर्याप्त शुद्ध नहीं हैं, और अभी भी भौतिक इच्छाएं रखते हैं, जो है संसार सागर में बार-बार पुनर्जन्म का कारण)। दूसरे शब्दों में, यह स्वाभाविक रूप से आना शुरू हो गया है, निरंतर जागरूकता में बदल रहा है ।

आप अपने दिन-प्रतिदिन के काम के बीच में जप, किसी मंत्र या पवित्र शब्द का जाप कर सकते हैं। फिर, जब यह एक आदत बन जाती है, तब भी जब आप गहनता से काम कर रहे होते हैं तो मन का एक हिस्सा मंत्र को दोहराता रहेगा हमेशा। इसका मतलब है कि आपने अपनी श्रृंखला के एक छोर को एक पवित्र स्थान पर बंद कर दिया है, जबकि शेष श्रृंखला अभी भी बाहरी दुनिया में बनी हुई है। 

मंत्र साधना से इंसान के मन मस्तिष्क को संतुलित करने में सहायता मिलती है। मंत्र साधना से एकाग्रता की स्थिति प्राप्त होती है। मंत्र योग का माध्यम से मन,बुद्धि व चित्त का बिखराव रुकता है। मंत्र योग से सकारात्मत उर्जा का प्रवाह बढ़ता है। मंत्र में बहुत शक्ति होती है, मंत्र योग की साधना से डाकू रत्नाकर (वाल्मिकि) को लेकर किस्सा मशहूर है और कहा जाता है कि वो मंत्र योग की साधना से ब्रम्हष्रि वाल्मिकि कहलाए।

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