सचेतन 2.89 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – हनुमान जी ने घोषणा करते हुए कहा मैं वायु का पुत्र तथा शत्रु सेना का संहार करने वाला हूँ।

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राक्षसियाँ, रावण से आगे कहती हैं, ‘प्रमदावन का कोई भी ऐसा भाग नहीं है, जिसको उसने नष्ट न कर डाला हो। केवल वह स्थान, जहाँ जानकी देवी रहती हैं, उसने नष्ट नहीं किया है। जानकीजी की रक्षा के लिये उसने उस स्थान को बचा दिया है या परिश्रम से थककर—यह निश्चित रूप से नहीं जान पड़ता है। अथवा उसे परिश्रम तो क्या हुआ होगा? उसने उस स्थान को बचाकर सीता की ही रक्षा की है।

राक्षसराज! जिन्हें आपने अपने हृदय में स्थान दिया है, उन सीता देवी से कौन बातें कर सकता है? जिसने अपने प्राणों का मोह नहीं छोड़ा है, वह उनसे वार्तालाप कैसे कर सकता है?

राक्षसियों की यह बात सुनकर राक्षसों का राजा रावण प्रज्वलित चिता की भाँति क्रोध से जल उठा। उसके नेत्र रोष से घूमने लगे। क्रोध में भरे हुए रावण की आँखों से आँसू की बूंदें टपकने लगीं, मानो जलते हुए दो दीपकों से आग की लपटों के साथ तेल की बूंदें झर रही हों।

हनुमानजी  का मुकाबला अब राक्षस के साथ शुरू होता है-  

उस महातेजस्वी निशाचर ने हनुमान जी को कैद करने के लिये अपने ही समान वीर किंकर नामधारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दी। राजा की आज्ञा पाकर अस्सी हजार वेगवान् किंकर हाथों में कूट और मुद्गर लिये उस महल से बाहर निकले।

“उनकी दाढ़ें विशाल, पेट बड़ा और रूप भयानक था। वे सब-के-सब महान् बली, युद्ध के अभिलाषी और हनुमान जी को पकड़ने के लिये उत्सुक थे।

हनुमान का पराक्रम भी उससे विशाल था। 

प्रमदावन के फाटक पर खड़े हुए उन वानरवीर के पास पहुँचकर वे महान् वेगशाली निशाचर उनपर चारों ओर से इस प्रकार झपटे, जैसे फतिंगे आग पर टूट पड़े हों। वे विचित्र गदाओं, सोने से मढ़े हुए परिघों और सूर्य के समान प्रज्वलित बाणों के साथ वानरश्रेष्ठ हनुमान् पर चढ़ आये।हनुमान जी ने अपनी पूँछ को पृथ्वी पर पटककर बड़े जोर से गर्जने लगे। पवनपुत्र हनुमान् अत्यन्त विशाल शरीर धारण करके अपनी पूँछ फटकारने और उसके शब्द से लंका को प्रतिध्वनित करने लगे। उनकी पूँछ फटकारने का गम्भीर घोष बहुत दूर तक गूंज उठता था।

हनुमानजी अब घोषणा करते हैं और कहते हैं की – अत्यन्त बलवान् भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो। मैं अनायास ही महान पराक्रम करने वाले कौशल नरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रु सेना का संहार करने वाला हूँ।

जब मैं हजारों वृक्ष और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लंकापुरी को तहस नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’।

हनुमान का प्रहार बढ़ता ही जा रहा था। 

हनुमान जी की इस गर्जना से समस्त राक्षसों पर भय एवं आतंक छा गया। वे नाना प्रकार के भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए चारों ओर से उन पर टूट पड़े।उन शूरवीर राक्षसों द्वारा सब ओर से घिर जाने पर महाबली हनुमान् ने फाटक पर रखा हुआ एक भयंकर लोहे का परिघ उठा लिया।”

जैसे विनतानन्दन गरुड़ ने छटपटाते हुए सर्प को पंजों में दाब रखा हो, उसी प्रकार उस परिघ को हाथ में लेकर हनुमान जी ने उन निशाचरों का संहार आरम्भ किया। वीर पवनकुमार उस परिघ को लेकर आकाश में विचरने लगे। जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र अपने वज्र से दैत्यों का वध करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघ से सामने आये हुए समस्त राक्षसों को मार डाला।

अब रावण की प्रतिक्रिया आग के समान तेज हो गई थी। 

तदनन्तर वहाँ उस भय से मुक्त हुए कुछ राक्षसों ने जाकर रावण को यह समाचार निवेदन किया कि समस्त किंकर नामक राक्षस मार डाले गये। राक्षसों की उस विशाल सेना को मारी गयी सुनकर राक्षसराज रावण की आँखें चढ़ गयीं और उसने प्रहस्त के पुत्र को जिसके पराक्रम की कहीं तुलना नहीं थी तथा युद्ध में जिसे परास्त करना नितान्त कठिन था, हनुमान जी का सामना करने के लिये भेजा।

हनुमान जी का पराक्रम देखकर लंका में चारों ओर भय और आतंक फैल गया था। रावण ने हनुमान को रोकने के लिए प्रहस्त के पुत्र को भेजा, लेकिन हनुमान जी के अदम्य साहस और पराक्रम के सामने किसी का टिकना असंभव था।

प्रहस्त का आगमन और पराजय

हनुमान जी के अद्भुत पराक्रम को देखकर रावण घबरा गया। उसने अपने सबसे वीर योद्धा, अपने पुत्र प्रहस्त को हनुमान जी को रोकने के लिए भेजा। प्रहस्त भीषण युद्ध के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन हनुमान जी के समक्ष उसकी कोई बिसात नहीं चली। हनुमान जी ने प्रहस्त को आसानी से हरा दिया और उसे वापस रावण के दरबार में भेज दिया।

रावण का भय

अशोक वाटिका के नाश होने से और राक्षसों को पराजित करने के बाद, हनुमान जी सीता माता से विदा लेकर वापस भगवान राम के पास जाने के लिए तैयार हो गए। जाते समय, उन्होंने रावण को एक कड़ा संदेश दिया: “सीता माता को वापस लौटा दो, नहीं तो भगवान राम आपकी लंका को जलाकर राख कर देंगे।” हनुमान जी लंका से निकल गए, जिससे रावण भयभीत और क्रोधित हो गया। उसने महसूस किया कि भगवान राम एक साधारण शत्रु नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा बल है जिसे कम आंकना मूर्खता होगी।

हनुमान जी का अशोक वाटिका को नाश करने का रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह उनकी शक्ति, भक्ति और राम के प्रति समर्पण का प्रतीक है। इस घटना ने न केवल रावण की शक्ति को कमजोर किया बल्कि सीता माता को भी आशा प्रदान की और भगवान राम के आने वाले युद्ध के लिए रणनीति बनाने में मदद मिली।

तो ये थी हनुमान जी के लंका में पराक्रम की कहानी। आशा करते हैं कि आपको ये कथा पसंद आई होगी। हमारे अगले एपिसोड में, हम लाएंगे रामायण की एक और रोमांचक कथा। तब तक के लिए, जय श्रीराम!

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