सचेतन 260: शिवपुराण- वायवीय संहिता – भगवान की योगमाया आपको चिन्मय बनती है

यह सनातन सत्य हैं की आप स्वयं से संबंध स्थापित कर सकते हैं 

आप अपने बाह्य दुनियाँ को देखें जिसे बहिरंग प्रकृति कहते हैं इसका नाम “माया’ है। भावयोग के ज्ञान मात्र से जब आप अपने आंतरिक प्रकृति से जुड़ने लगाते हैं तभी ही  हम भगवान की अन्तरंगा शक्ति के साथ अपना संबंध स्थापित कर लेते हैं। जिसका नाम ‘योगमाया’ है और यही भाव योग है। 

लेकिन एक माया है जिसे हम मलिन माया कहते हैं। यह बड़ा ही शक्तिशाली है हम यहाँ से ख़ुद भी निकालना नहीं चाहते हैं। आप देखेंगे की आपके आस पास व्यक्ति अपनी चतुराई से वस्तु को विपरीत रूप में दिखाता है चाहे वो कितना ही मैला, मलयुक्त, अपवित्र, नापाक, गंदा, अस्वच्छ, दागदार, धब्बेदार, धूमिल, बदरंग, क्यों ना हो यह उसकी माया है। यह माया उस व्यक्ति को मिथ्या ज्ञान से प्राप्त हुई है और यहाँ तक की यह पूरा जगत इसी से आच्छादित है।

क्या हम भगवान को नहीं ठग सकते हैं? वैसे याद करें तो हम सभी ने बहुत बार भगवान को भी ठग लिया है। प्रसाद तो उनके लिए चढ़ाते हैं लेकिन खाते ख़ुद हैं। अगर यह भाव कर लें की ईश्वर या भगवान् स्वयं योगमाया की चादर ओढ़कर, उस आवरण को स्वयं धारण कर सामने आते हैं और कह रहे हैं की प्रसाद तुम खाओ और वह मुझ तक मिल जाएगा।

वैसे भगवान् स्वयं योगमाया की चादर ओढ़कर, हर पल आपको चिन्मय स्वरूप यानी ज्ञान मय बनाना चाहते हैं आपके आंतरिक शक्ति को योगमाया द्वारा रूपान्तर करते रहते हैं, लेकिन यह अहसास यह ज्ञान और यह भाव का होना थोड़ा कठिन है क्योंकि हम भगवान् से भाव के माध्यम से जुड़े नहीं रहते हैं। आपके साथ कोई घटना घटने से पहले या किसी बीमारी के होने से पहले आपको सबकी सूचना तो मिली जरूर होगी। भगवान्‌ योगमाया से आच्छादित होकर आपको बोलते हैं, आपके अंदर से आवाज़ आती है और कभी कभी वह आप सबके सामने प्रकट होते हैं। लेकिन हमारा मलिन माया इस योगमाया तक जुड़ने नहीं देता है। 

आज हम भाव योग के बारे में बात कर रहे हैं जो एक प्राचीन योग है शिवपुराण से लिया हुआ विषय जो एक आत्मा का परमात्मा से मिलन का विज्ञान है और यह मैं  आपसे चर्चा कर रहा हूँ यह भी भगवान् के योगमाया रूप का ही प्रभाव है जिसमें आप शामिल हैं क्योंकि आप सभी के अंदर एक भक्ति है, प्रेम है और आप ईश्वर के भक्त हैं और उनके प्रिय मित्र भी हैं जहां हम आज योग यानी मिलन या जुड़ने के इस उत्तम रहस्य को चर्चा कर रहे हैं। 

मलिन माया का प्रभाव इतना तीव्र है आप इस जन्म में अपने परिवार मित्र, प्रेमी प्रेमिका को तो पहचान रहे हैं लेकिन हम सभी के अंदर भगवान के योगमाया का प्रभाव इतना कम है की उनके साथ हमारा कोई प्रेम या संबंध बन ही नहीं पा रहा है। 

चलो यहाँ तक हम मान लें की हम सभी के जन्म और कर्म में थोड़ा सा भी कुछ भक्ति या दिव्य (अलौकिक) प्रभाव कुछ तो होगा जो हमलोग आज हम भाव योग के बारे में बात कर रहे हैं। भगवान् के योगमाया रूप, भक्ति प्रेम के इस उत्तम रहस्य को समझ सकता है। आप सच मानिए तो ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को जानने का यह प्रथम सौपान है।

यह सनातन सत्य हैं की जब आप स्वयं से और अपनी आंतरिक प्रकृति से जुड़ कर कर्म करेंगे तो भगवान की अन्तरंगा शक्ति के साथ आपका संबंध स्वयं स्थापित हो जाएगा और आप अगर इस शरीर को त्याग कर जाते हैं तो इस संसार मे फ़िर से आपको जन्म प्राप्त नही होगा, बल्कि आप भगवान के सनातन धाम को प्राप्त होंगे। 

हम मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञों द्वारा देवताओं की भली-भाँति पूजा करते हैं, कुछ मनुष्य सभी ज्ञान-इन्द्रियों के विषयों को संयम-रूपी अग्नि में हवन करते हैं, कुछ मनुष्य धन-सम्पत्ति के दान द्वारा, कुछ मनुष्य तपस्या द्वारा और कुछ मनुष्य अष्टांग योग के अभ्यास द्वारा यज्ञ करते हैं, कुछ अन्य मनुष्य वेद-शास्त्रों का अध्यन करके ज्ञान में निपुण होकर और कुछ मनुष्य कठिन व्रत धारण करके यज्ञ करते है। 

इन सब में जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धावान है और जिसने मलिन माया यानी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वही मनुष्य दिव्य-ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्क्षण भगवत-प्राप्ति रूपी परम-शान्ति को प्राप्त हो जाता है। यही भाव योग है। 

लेकिन जिस मनुष्य को शास्त्रों का ज्ञान नही है, शास्त्रों पर श्रद्धा नही है और शास्त्रों को शंका की दृष्टि से देखता है वह मनुष्य निश्चित रूप से भ्रष्ट हो जाता है, इस प्रकार भ्रष्ट हुआ संशयग्रस्त मनुष्य न तो इस जीवन में और न ही अगले जीवन में सुख को प्राप्त होता है। 

अत: आपसे में यही कहूँगा की आप अपने हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय को ज्ञान-रूपी शस्त्र या सचेतन होकर इसे काट दें, और योग में स्थित होकर जीवन के सत्कर्म में जुड़े रहें।

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