सचेतन 2.23: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – अथक परिश्रम के लिए पराक्रमी, और वीर्यवान बनना पड़ता है।

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पवनपुत्र हनुमान् ने लंका का अवलोकन किया। 

आज हम सुंदरकांड के द्वितीयः सर्गः की शुरुआत कर रहे हैं जिसमें लंकापुरी का वर्णन है और, उसमें हनुमान जी के लंका में प्रवेश करने के विषय में विचार लिखा गया  है जिसमें उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन किया गया है। 

महाबली हनुमान् जी अलङ्घनीय समुद्र को पार करके त्रिकूट (लम्ब) नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भाव से खड़े हो लंकापुरी की शोभा देखने लगे और तभी उनके ऊपर वहाँ वृक्षों से झड़े हुए फूलों की वर्षा होने लगी। इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूल के बने हुए वानर के समान प्रतीत होने लगे। 

उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लम्बी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानि का या आलस्य का ही अनुभव करते थे। उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनों के बहुत से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्र को पार करना कौन बड़ी बात है? बलवानों में श्रेष्ठ तथा वानरों में उत्तम वे वेगवान् पवन-कुमार महासागर को लाँघकर शीघ्र ही लंका में जा पहुँचे थे। 

बिना थके लगातार किया जाने वाला, अथक परिश्रम कहलाता है जो पराक्रमी हो और वीरता पूर्वक कोई काम को करे। वीर व्यक्ति का अर्थ है की किसी भी काम से कभी पीछे नहीं हटना। ये गुण जन्म से नहीं मिलता, मनुष्य को अपने भीतर इस गुण का निर्माण अपने अथक परिश्रम और धैर्य से करना पड़ता है। 

हनुमान् जी वीर और पराक्रमी होने के के साथ साथ वे अत्यन्त वीर्यवान थे। शरीर की भौतिक शक्तियों का अन्तिम सार वीर्य है। जब आप भोजन करते हैं तो पहले रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से मेढ़, मेढ़ से हड्डी, हड्डी से मज्जा, मज्जा से वीर्य ; वीर्य शरीर का अन्तिम धातु है। इस के बनाने में, शरीर को, जीवन के लिये आवश्यक अन्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक मेहनत करनी पड़ती है। थोड़े – से वीर्य को बनाने के लिये रक्त की पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता पड़ती है। 

‘वीर्य’ शब्द में जादू भरा है। इसके उच्चारण करने से श्रेष्ठ महान और पवित्र भावों का संचार होने लगता है। ईश्वर वीर्यवान है, रामचंद्रजी बड़े यशस्वी वीर्यवान राजा थे, भीष्म ने आयु भर वीर्य का निग्रह अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण किया, वीर्यवान पुरुष क्या नहीं कर सकता, वीर्यवती जाति ही संसार में अपना साम्राज्य स्थापित कर सकती है।

हनुमान जी के पराक्रम और वीरता को नमन करने के लिए वृक्षों ने फूलों की वर्षा किया तो पराक्रमी हनुमान् फूल के बने हुए वानर के समान प्रतीत होने लगे। आप यह समझो की संसार में जो कुछ निरोग, सुन्दर, स्वरूपवान, कान्तिमय, मनोहर है, जो कुछ वीर, ओज, पराक्रम, पौरुष, तेज विशेषणों से प्रकट होता है तथा धैर्य, निर्भीकता, बुद्धिमत्ता, सौम्य, मनुष्यत्वादि गुणों से जो विचार उत्पन्न होते हैं, वे सब ‘वीर्य’ इस शब्द के अंतर्गत हैं। 

संसार में रह कर अपने जीवन की सार्थकता को सिद्ध करने की आकाँक्षा है तो इस रत्न की रक्षा करने में अपनी सब शक्तियों को लगाकर इसके द्वारा दैवी गुणों को प्राप्त करने में कटिबद्ध होना चाहिए। 

महाबली हनुमान् जी अब रास्ते में हरी-हरी दूब और वृक्षों से भरे हुए मकरन्दपूर्ण सुगन्धित वन देखते हुए वे मध्यमार्ग से जा रहे थे। तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान् वृक्षों से आच्छादित पर्वतों और फूलों से भरी हुई वन-श्रेणियों में विचरने लगे। उस पर्वत पर स्थित हो पवनपुत्र हनुमान् ने बहुत-से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वत के अग्रभाग में बसी हुई लंका का भी अवलोकन किया। 

अवलोकन’ का शाब्दिक अर्थ ‘देखना है। इसे ‘निरीक्षण’ भी कहते हैं। अवलोकन, निरीक्षण अथवा प्रेक्षण का सभी प्रकार के विज्ञानों में महत्त्वपूर्ण स्थान है; क्योंकि हम सभी प्रकार की समस्याओं एवं घटनाओं को आँखों से देखकर पहचान सकते हैं।

उन कपिश्रेष्ठ ने वहाँ सरल (चीड़), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल (चिरौंजी), मुचुलिन्द (जम्बीरीनीबू), कुटज, केतक (केवड़े), सुगन्धपूर्ण प्रियङ्ग (पिप्पली), नीप (कदम्ब या अशोक), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे। फूलों के भार से लदे हुए तथा मुकुलित (अधखिले) बहुत-से वृक्ष उन्हें दृष्टिगोचर हुए, जिनमें पक्षी भरे हुए थे और हवा के झोंके से जिनकी डालियाँ झूम रही थीं। हंसों और कारण्डवों से व्याप्त तथा कमल और उत्पल से आच्छादित हुई बहुत-सी बावड़ियाँ, भाँति-भाँति के रमणीय क्रीड़ास्थान तथा नाना प्रकार के जलाशय उनके दृष्टिपथ में आये।  

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