सचेतन 2.65: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – मनुष्य की मानसिक वृत्तियों आदतों के अनुसार उसके शरीर की बनावट भी वैसी हो जाती है।

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सचेतन 2.65: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड – मनुष्य की मानसिक वृत्तियों आदतों के अनुसार उसके शरीर की बनावट भी वैसी हो जाती है।

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अंगों के फड़कने से मिलता है शुभ-अशुभ का संकेत मिलता है।  
त्रिजट ने कहा की राक्षसियो! जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता केवल प्रणाम करने से ही प्रसन्न हो जायँगी। ये ही उस महान् भय से तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हैं।इन विशाललोचना सीता के अंगों में मुझे कोई सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी विपरीत लक्षण नहीं दिखायी देता (जिससे समझा जाय कि ये सदा कष्ट में ही रहेंगी)। 
जब हम किसी से मिलते हैं या उनको देखते हैं तो उनके औरा से पीटीए चल जाता है की वह व्यक्ति कैसा होगा। आपको पता है की मानव शरीर एक मानव जीव की संपूर्ण संरचना है, जिसमें एक सिर, गर्दन, धड़, दो हाथ और दो पैर होते हैं। किसी मानव के वयस्क होने तक उसका शरीर लगभग 50 ट्रिलियन कोशिकाओं, जो कि जीवन की आधारभूत इकाई हैं, से मिल कर बना होता है।आपके शरीर का हर एक कोशिका ऊर्जा का स्रोत है और वही ऊर्जा आपकी औरा है।   
इसके लिए शरीर शास्त्र है जो मनुष्य की मानसिक वृत्तियों आदतों के अनुसार उसके शरीर की बनावट भी हो जाती है। किसी आदत के दृढ़ होने पर उसको लक्षण शरीर पर स्पष्ट प्रतीत होने लगते हैं। इन लक्षणों द्वारा मनुष्य का स्वभाव जाना जा सकता है। जैसे की मस्तक के लक्षण में कहा जाता है की जिस मनुष्य का मस्तक ऊँचा तथा चौड़ा है वह राजा के समान ऐश्वर्य भोगता है।शरीर के कई अंगों के आकार को देखकर मनुष्य का स्वभाव जान लेने के बारे में कहा जाता है की नेत्र, कान और केशों के लक्षण को देख कर जिस प्रकार नाड़ी परीक्षा के लिए अनेक रोगियों की गाड़ी देखने के बाद ही नये चिकित्सक को भली प्रकार ज्ञान हो पाता है। उसी प्रकार शारीरिक लक्षणों के संबंध में भी अनेक व्यक्तियों पर परीक्षा की जा सकती है। 
त्रिजट अपनी राक्षसी से कहा की मैं तो समझती हूँ कि सीता जी को जो वर्तमान दुःख प्राप्त हुआ है, वह ग्रहण के समय चन्द्रमा पर पड़ी हुई छाया के समान थोड़ी ही देर का है; क्योंकि ये देवी सीता मुझे स्वप्न में विमान पर बैठी दिखायी दी हैं, अतः ये दुःख भोगने के योग्य कदापि नहीं हैं। मुझे तो अब जानकीजी के अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि उपस्थित दिखाई देती है। राक्षसराज रावण के विनाश और रघुनाथ जी की विजय में अब अधिक विलम्ब नहीं है। 
कमलदल के समान इनका विशाल बायाँ नेत्र फड़कता दिखायी देता है। यह इस बात का सूचक है कि इन्हें शीघ्र ही अत्यन्त प्रिय संवाद सुनने को मिलेगा। इन उदारहृदया विदेहराजकुमारी की एक बायीं बाँह कुछ रोमाञ्चित होकर सहसा काँपने लगी है (यह भी शुभ का ही सूचक है)। 
अंगों के फड़कने से मिलता है शुभ-अशुभ का संकेत मिलता है। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में कई स्थानों पर अंग फड़कने के फल का उल्लेख किया है। समुद्रशास्त्र में भी बताया गया है कि व्यक्ति के किसी खास अंग का फड़कने का अलग-अलग परिणाम होता है।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥
भावार्थ:-गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदय को जो हर्ष हुआ, वह कहा नहीं जा सकता। सुंदर मंगलों के मूल उनके बाएँ अंग फड़कने लगे॥
तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में अंगों के फड़कने के बारे में विस्तार से बताया है।  समुद्रशास्त्र के अनुसार हमारा शरीर बहुत संवेदनशील और शक्तिशाली होता है और यह भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में पहले ही संकेत देता है।
सीता जी के हाथी की सूंड़ के समान जो इनकी परम उत्तम बायीं जाँघ है, वह भी कम्पित होकर मानो यह सूचित कर रही है कि अब श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे। 
देखो, सामने यह पक्षी शाखा के ऊपर अपने घोंसले में बैठकर बारम्बार उत्तम सान्त्वनापूर्ण मीठी बोली बोल रहा है। इसकी वाणी से ‘सुस्वागतम्’ की ध्वनि निकल रही है और इसके द्वारा यह हर्ष में भरकर मानो पुनः-पुनः मंगलप्राप्ति की सूचना दे रहा है अथवा आने वाले प्रियतम की अगवानी के लिये प्रेरित कर रहा है। 
इस प्रकार पतिदेव की विजयके संवाद से हर्ष में भरी हुई लजीली सीता उन सबसे बोलीं-‘यदि तुम्हारी बात ठीक हुई तो मैं अवश्य ही तुम सबकी रक्षा करूँगी।

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