सचेतन 101: श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता-  आत्मज्ञान और ब्रह्मविद्या 

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वामदेव नामक योगी शिव जी के भक्त थे। उन्होंने अपने समस्त शरीर पर भस्म धारण कर रखी थी। एक बार एक व्यभिचारी पापी ब्रह्मराक्षस उन्हें खाने के लिए उनके पास पहुँचा। उसने ज्यों ही वामदेव को पकड़ा, उसके शरीर पर वामदेव के शरीर की भस्म लग गयी, अत: भस्म लग जाने से उसके पापों का शमन हो गया तथा उसे शिवलोक की प्राप्ति हो गयी। वामदेव के पूछने पर ब्रह्मराक्षस ने बताया कि वह पच्चीस जन्म पूर्व दुर्जन नामक राजा था, अनाचारों के कारण मरने के बाद वह रुधिर कूप मे डाल दिया गया। फिर चौबीस बार जन्म लेने के उपरांत वह ब्रह्मराक्षस बना।

ब्रह्मराक्षस ने वामदेव से इस पूर्वजन्म के रहस्य को जानना चाहा, वैसे तो –

वामदेव की जन्म की कथा में कहा गया है की वामदेव जब माँ के गर्भ में थे तभी से उन्हें अपने पूर्वजन्म आदि का ज्ञान हो गया था। उन्होंने सोचा, माँ की योनि से तो सभी जन्म लेते हैं और यह कष्टकर है, अत: माँ का पेट फाड़ कर बाहर निकलना चाहिए। वामदेव की माँ को इसका आभास हो गया। अत: उसने अपने जीवन को संकट में पड़ा जानकर देवी अदिति से रक्षा की कामना की। 

ऋग्वेद में वामदेव ऋषि ने स्वयं अपना परिचय दिया है, तदनुसार स्पष्ट होता है कि वामदेव को गर्भ में ही आत्मज्ञान और ब्रह्म विद्या का साक्षात्कार हो गया था। वामदेव को उन्हें उनकी माता के गर्भ में ही दर्शन हो गया था, इसलिये उन्होंने माता के उदर में ही कहा था-

कि ‘अहो! कितने आश्चर्य और आनन्द की बात है कि गर्भ में रहते-रहते ही मैंने इन अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओं के अनेक जन्मों का रहस्य भली-भाँति जान लिया अर्थात् मैं इस बात को जान गया कि ये जन्म आदि वास्तव में इन अन्तःकरण और इन्द्रियों के ही होते हैं, आत्मा के नहीं। 

इस रहस्य को समझने से पहले मुझे सैकड़ों लोहे के समान कठोर शरीर रूपी पिंजरों में अवरुद्ध कर रखा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षी की भाँति ज्ञानरूप बल के वेग से उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीर रूप पिंजरों से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा, मैं सदा के लिये उन शरीरों की अहंता से मुक्त हो गया हूँ।’

गर्भस्थित वामदेव ने यह उपदेश दिया है कि देह आदि में आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिये, क्योंकि देहात्मवाद ही अविद्याजन्य बन्धन है और उस बन्धन का नाश ही मोक्ष है। जैसे पक्षी घोंसले से भिन्न है, वैसे ही यह आत्मतत्त्व भी शरीर से सर्वथा व्यतिरिक्त है। इस प्रकार गर्भज्ञानी महात्मा वामदेव ऋषि को गर्भ में भी मोह नहीं हुआ। उन्होंने विचार किया कि मेरा आविर्भाव भी सामान्य न होकर कुछ विशिष्ट ढंग से ही होना चाहिये। उन्होंने सोचा कि माता की योनि से तो सभी जन्म लेते हैं और इसमें अत्यन्त कष्ट भी है, अतः मैं माताके पार्श्व भाग का भेदन करके बाहर निकलूंगा- 

(पार्श्व भाग- शरीर का दाहिना या बाँया भाग)

इन्द्रादि देवों ने जब गर्भस्थित वामदेव को ऐसा कार्य करने से रोका तो उन्होंने अपने समस्त ज्ञान और अनुभव का परिचय देते हुए उनसे कहा- ‘हे इन्द्र ! मैं जानता हूँ कि मैं ही प्रजापति मनु हूँ, मैं ही सबको प्रेरणा देनेवाला सविता देव हूँ, मैं ही दीर्घतमा का मेधावी कक्षीवान् नामक ऋषि हूँ, मैं ही अर्जुनी का पुत्र कुत्स नामक ऋषि हूँ और मैं ही क्रान्तदर्शी उशना ऋषि हूँ। तात्पर्य यह है कि परमार्थ दृष्टिसे मैं ही सब कुछ हूँ, इसलिये मुझे आप सर्वात्मा के रूप में देखें।’

इस प्रकार वे अपने आत्मज्ञान तथा जन्मान्तरीय ज्ञान का परिचय देकर वामदेव ने अपने योगबल से श्येन (बाज ) पक्षी का रूप धारण कर लिया और बड़े वेग से वे अपनी माता की कुक्षि- प्रदेश से बाहर निकल पड़े। उनके इस कार्य से इन्द्र रुष्ट हो गये, किंतु वामदेव ने अपनी स्तुतियों द्वारा उन्हें प्रसन्न कर लिया और इन्द्र की उन पर कृपा हो गयी।

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