सचेतन 194: किसी भी चीज को इकट्ठा करने से अहंकार पैदा होता है

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सचेतन 194: किसी भी चीज को इकट्ठा करने से अहंकार पैदा होता है

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त्याग करने से प्रशंसा और आदर मिलता हो तो तब भी आपके अहंकार को तृप्ति मिलती है  

पिछले विचार के सत्र में मैंने कहा था की अज्ञानता भय पैदा करती है क्योंकि जब आप स्वयं को ढूँढते हो तो आप कोई ना कोई परिचय का सहारा लेना शुरू करते हो और आप उसे पकड़ लेते हैं तब अज्ञानता ढक जाता है और स्वयं के ज्ञान बारे में जानने का कोई कारण नहीं रह जाता। ज्ञान के आगमन के लिए पहला द्वार स्वयं के भीतर अपने समग्र अज्ञान की स्वीकृति है।

मेरे उस दिन के काल्पनिक कथा में मैंने बोला था की जब कृष्णजी भोजन करते करते उठकर द्वार की तरफ भागने लगते थे और उन्होंने ऐसा कई बार किया तो भोजन कराने वाले ने पूछा आप बीच भोजन छोड़कर कहां भागते हैं? कृष्णजी ने कहा मेरे एक भक्त को एक दुष्ट उसे पत्थर से मार रहा है तो मैं उसे बचाने जाता हूँ और फिर वापिस लौट कर इसलिए आता हूँ की वह भक्त भी पत्थर अपने हाथ में उठा लिया है और अपनी रक्षा करने लगा है। अब मेरे जाने की वहां कोई जरूरत नहीं रही। 

कहानी तो काल्पनिक ही है लेकिन जब तक आप खुद को समझने के लिए बेसहारा नहीं हो जायेंगे तब तक आपको स्वयं को जानने का अवसर नहीं मिलेगा। इस अज्ञानता से बहुत बड़ा भय लगता है। हम पत्थर उठा लेते हैं यानी हम कोई न कोई परिचय पकड़ लेते हैं, कोई न कोई वस्त्र पकड़ लेते हैं, कोई न कोई रूप, कोई न कोई आकृति, कोई न कोई नाम, कोई न कोई शब्द, कोई न कोई सिद्धांत, पकड़ लेते हैं अज्ञान ढक जाता है और ज्ञान के जन्म का कोई कारण नहीं रह जाता। 

मुझे लगता है की ज्ञानी अगर आप नहीं बनते हैं तो कोई बात नहीं अपने अज्ञानी होने को जानें। ज्ञानी बनना बहुत आसान है। अपने अज्ञान को जानना और स्वीकार कर लेना बहुत दुःसाहस की बात है। क्योंकि ज्ञानी बनने में अहंकार की सहज तृप्ति होती है अज्ञान को स्वीकार करने में अहंकार एकदम टूट कर दो टुकड़े हो जाता है, उसके खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती। 

ज्ञानी होने में अहंकार की खूब तृप्ति है। ऐसा कहा गया है की पंडित यानी महा ज्ञानी  जितना अहंकारी हो जाता है उतना तो जगत में कोई अहंकारी नहीं होता। उपदेशक जितने अहंकार से भर जाते हैं उतना तो कोई अहंकारी नहीं होता। जितना ये ज्ञान की बातें करने वाले लोग अहंकार से पीड़ित हो जाते हैं उतना तो कोई और अहंकारी नहीं होता। यह जितना ज्यादा हमें यह खयाल पैदा होता है कि कुछ शब्दों को इकट्ठा करके कुछ विचारों को इकट्ठा करके हमने जान लिया, मैं जान गया हूँ। जानते तो हम कुछ भी नहीं, हमारा ‘मैं’ जरूर मजबूत होता है और भर जाता है। 

और फिर जिस चीज से भरने लगता है उसको हम और इकट्ठा करने लगते हैं। कोई धन इकट्ठा करने लगता है क्योंकि धन के इकट्ठे करने से अहंकार भरता हुआ मालूम पड़ता है। कोई बड़े महल बनाने लगता है, ताजमहल बनाने लगता है, कोई कुछ और करने लगता है क्योंकि उससे अहंकार भरता है। 

यहाँ तक की कोई त्याग करने लगता है तो भी उसका अहंकार भरने लगता है और हमारा अहंकार बड़ा सूक्ष्म है। वह निरंतर अपने को भरने की कोशिश करता है। 

अगर त्याग को प्रशंसा मिलती हो आदर मिलता हो तो हम त्याग कर सकते हैं, उपवास कर सकते हैं, धूप में खड़े रह सकते हैं, सिर के बल खड़े रह सकते हैं, शरीर को सुखा सकते हैं। अगर चारों तरफ जय जयकार होता हो तो हम मरने को राजी हो सकते हैं, नहीं तो कोई शहीद मरने को राजी होता। कोई मरने को राजी होता लेकिन अहंकार को अगर तृप्ति मिलती हो तो हम सूली पर भी लटकते वक्त मुस्कुरा सकते हैं और प्रसन्न हो सकते हैं।

एक फकीर था, नसरुद्दीन। फकीर तो बाद में हुआ उसके पहले एक राजा के घर वजीर था। राजा और नसरुद्दीन एक दफा शिकार करने एक जंगल में गए। रास्ता भटक गए और एक छोटे से गांव में सुबह-सुबह रास्ता खोजते हुए पहुंचे। भूख लगी थी। एक घर में गए और उन्होंने नाश्ते के लिए प्रार्थना की। उस गरीब आदमी के पास दो-चार अंडे थे। उसने कुछ बनाया अंडों से और उन्हें भेंट किया। चलते वक्त राजा ने कहा कि कितना पैसा हुआ? उस देश की मुद्रा में उस गरीब ने कहा पचास रुपया। राजा बहुत हैरान हुआ। दो-चार अंडों की कीमत तो दो-चार पैसे भी नहीं हैं, पचास रुपया। उसने वजीर नसरुद्दीन से पूछा, क्या बात है। आर ऐग्स सो रेयर इन दिस पार्ट ऑफ दि कंट्री? क्या इस हिस्से में अंडे इतने कम मिलते हैं? नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं। ऐग्स आर नॉट रेयर सर, बट किंग्स आर। 

अंडे नहीं, अंडे तो बहुत मिलते हैं, लेकिन इस हिस्से में राजा बहुत मुश्किल से मिलते हैं। वह राजा पचास रुपया देने की कल्पना भी नहीं करता था लेकिन जैसे ही उसे पता चला राजा बहुत मुश्किल से मिलते हैं उसने पचास रुपये दिया और पचास रुपया इनाम दिए नसरुद्दीन को कि तुमने बहुत अदभुत बात कही। पचास रुपये अंडे के भी चुकाए और पचास रुपये इनाम के भी, क्यों? बड़ी तृप्ति हुई। राजा बहुत मुश्किल से मिलते हैं।

यह जो हमारी अस्मिता है रोज-रोज इस बात की तृप्ति खोजती रहती है जिस चीज से आप न्यून होते जाते हैं वही चीज आपके अहंकार की तृप्ति करने लगती है।

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