सचेतन :40. श्री शिव पुराण- पंचाक्षर मन्त्र – ॐ नमः शिवाय और ​​भगवान शिव का ध्यान

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सचेतन :40. श्री शिव पुराण- पंचाक्षर मन्त्र – ॐ नमः शिवाय और ​​भगवान शिव का ध्यान

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सचेतन :40. श्री शिव पुराण- पंचाक्षर मन्त्र – ॐ नमः शिवाय और ​​भगवान शिव का ध्यान 

Sachetan:Panchakshara Mantra – Om Namah Shivay and Meditation on Lord Shiva

सृष्टि’, ‘पालन’, ‘संहार’, ‘तिरोभाव’ और ‘अनुग्रह’ – यह पांच  जगत संबंधी कार्य हैं जो नित्य सिद्ध है संस्कार है। इनमें से जो पाँचवाँ कृत्य अनुग्रह है वह मोक्ष का मार्ग है। वह सदा ही अचल भाव से हमसभी में स्थिर रहता है।

तिरोभाव यानी वैसा भाव या अवस्था जिसमें किसी भी राग के स्वरों को ऐसे क्रम में लगाना, जिससे किसी दूसरे राग की छाया दृष्टिगोचर होने लगे उसे तिरोभाव कहते हैं।

अनुग्रह की क्रियाशीलता होना यानी अनुकंपा, इनायत, करुणा, कृपा, दया, निवाजिश, फजल, रहम, रहमत, वत, शफक, शफकत, शफ़क़, शफ़क़त का होना। 

शिव जी विष्णु जी और श्री ब्रह्मा जी से कहते हैं की इन पाँच कृत्यों का भार वहन करने के लिये ही मेरे पाँच मुख हैं। चार दिशाओंमें चार मुख हैं और इनके में बीच में पाँचवाँ मुख है। अनुग्रह नामक कृत्य के लिए शिवजी कहते हैं की मैंने पूर्वकालमें अपने स्वरूपभूत मन्त्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है। वह महा मंगलकारी मन्त्र है। सबसे पहले मेरे मुखसे ओंकार (ॐ) प्रकट हुआ, मेरे स्वरूपका बोध कराने वाला है। ओंकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र में स्वरूप ही है। प्रतिदिन ओंकारका निरन्तर स्मरण करनेसे मेरा ही सदा स्मरण होता है। 

पहले मेरे उत्तरवर्ती मुखसे अकारका, पश्चिम – मुखसे उकारका, दक्षिण मुखसे मकारका हुआ इ पूर्ववर्ती मुखसे विन्दुका तथा मध्यवर्ती मुख – नादका प्राकट्य हुआ। इस प्रकार पाँच अवयवोंसे युक्त ओंकारका विस्तार है। इन सभी अवयवोंसे एकीभूत होकर वह प्रणव ‘ॐ’ नामक एक अक्षर हो गया। यह नाम-रूपात्मक सारा जगत् तथा वे उत्पन्न स्त्री-पुरुष वर्ग रूप दोनों कुल इस प्रणव- मन्त्र से व्याप्त हैं। यह मन्त्र शिव और शक्ति बोधक है। इससे पंचाक्षर- मंत्र की उत्पत्ति हुई है, जो मेरे सकल रूपका बोधक है। वह अकारादि क्रमसे और मकारादि क्रमसे क्रमशः प्रकाशमें आया है (‘ॐ नमः शिवाय’ यह पंचाक्षर मन्त्र है)। सर्वज्ञ शिव ने सम्पूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिये इस ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का प्रतिपादन किया है। 

पंचाक्षर मन्त्र के ऋषि वामदेव, छन्द पंक्ति व देवता शिव हैं। आसन लगाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके इस मन्त्र का जप करना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से जप का अनन्तगुणा फल मिलता है। स्त्री, शूद्र आदि सभी इस मन्त्र का जप कर सकते हैं। इस मन्त्र के लिए दीक्षा, होम, संस्कार, तर्पण और गुरुमुख से उपदेश की आवश्यकता नहीं है। यह मन्त्र सदा पवित्र है, इसका जप करने से पहले भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए।

“ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं,

रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृग वराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।

पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं

विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।”

अर्थात- चांदी के पर्वत के समान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो ललाट पर सुन्दर अर्धचन्द्र को आभूषण रूप में धारण करते हैं, रत्नमय अलंकारों से जिनका शरीर उज्जवल है, जिनके हाथों में परशु तथा मृग, वर और अभय मुद्राएं हैं, पद्म के आसन पर विराजमान हैं, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं, जो बाघ की खाल पहनते हैं, जो विश्व के आदि, जगत की उत्पत्ति के बीज और समस्त भयों को हरने वाले हैं, जिनके पांच मुख और तीन नेत्र हैं, उन महेश्वर का प्रतिदिन ध्यान करें।

ध्यान के बाद मन्त्र का जप करना चाहिए। लिंगपुराण में कहा गया हैं ‘जो बिना भोजन किए एकाग्रचित्त होकर आजीवन इस मन्त्र का नित्य एक हजार आठ बार जप करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है’।

इस मन्त्र के लिए लग्न, तिथि, नक्षत्र, वार और योग का विचार नहीं किया जाता। यह मन्त्र कभी सुप्त नहीं होता, सदा जाग्रत ही रहता है। अत: पंचाक्षर मन्त्र ऐसा है जिसका अनुष्ठान सब लोग सब अवस्थाओं में कर सकते हैं।


Manovikas Charitable Society 2022

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