सचेतन :44. श्री शिव पुराण-त्रिपदा गायत्री

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सचेतन :44. श्री शिव पुराण-त्रिपदा गायत्री

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सचेतन :44. श्री शिव पुराण-त्रिपदा गायत्री 

Sachetan:Tripada Gayatri

मातृका में बावन अक्षर बताये गए हैं । इनमें सबसे प्रथम अक्षर ॐकार है । उसके सिवा चौदह स्वर, तैतीस व्यंजन, अनुस्वर, विसर्ग, जिव्हामूलीय तथा उप्षमानीय – ये सब मिला कर बावन मातृका वर्ण माने गए हैं । मातृका शब्द से प्राण-शक्ति का बोध होता है | मातृका वर्ण रूपिणी है ..मातृका को पांच भागों में वर्गीकृत किया गया है –

स्वर –अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ,.. लृ.., ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: | (कुल संख्या -१६ )

स्पर्श- क वर्ग- क, ख, ग, घ, …|

च वर्ग– च, छ, ज, झ,,…|

ट वर्ग- ट, ठ, ड, ढ, ण |

त वर्ग- त, थ, द, ध, न |

प वर्ग- प, फ, ब, भ, म |

अन्तस्थ- य वर्ग – य, र, ल, व, श |

उष्माण- श वर्ग- श, ष, स, ह |

कूटस्थ- क्ष कार |

सप्तमातृकाएं में सात देवियां ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, ऐन्द्री, कौमारी, वाराही और नारसिंही है। शुंभ और निशुंभ राक्षसों से लड़ते समय देवी की सहायता के लिए सभी देवो ने अपनी-अपनी सात शक्तियां भेजी थी। सात शक्तियां ही सप्तमातृकाएं हैं जो शरीर के मूल जीवंत अस्तित्व पर शासन करती हैं। • ब्राह्मणी: त्वचा, • माहेश्वरी: रक्त, • कौमारी: मांसपेशियां • वैष्णवी: हड्डी, • ऐंद्री: अस्थि मज्जा, • चामुंडा: वीर्य।

इस पंचाक्षर-मंत्र से मातृका वर्ण प्रकट हुए हैं। उसी से शिरो मंत्र सहित त्रिपदा गायत्रीका प्राकट्य हुआ है। उस गायत्री से सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं और उन वेदोंसे करोड़ों मन्त्र निकले हैं। उन-उन मन्त्रों भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है; परंतु इस प्रणव एवं पंचाक्षर से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है। इस मन्त्र समुदाय से भोग और मोक्ष दोनों सिद्ध होते हैं। मेरे सकल स्वरूपसे सम्बन्ध रखने वाले सभी मन्त्रराज साक्षात् भोग प्रदान करनेवाले और शुभकारक और मोक्षप्रद हैं।

गायत्री मन्त्र का देवी के रूप में चित्रण ॐ भूर् भुवः स्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं।

भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

हिन्दी में भावार्थ: उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

गायत्री मन्त्र में चौबीस अक्षर होते हैं, यह 24 अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं।

यह मन्त्र सर्वप्रथम ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मन्त्र विश्वामित्र के इस सूक्त के 18 मन्त्रों में केवल एक है, किन्तु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरम्भ में ही ऋषियों ने कर लिया था और सम्पूर्ण ऋग्वेद के 10 सहस्र मन्त्रों में इस मन्त्र के अर्थ की गम्भीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मन्त्र में 24 अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों में और कालान्तर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मन्त्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ:

(१) ॐ

(२) भूर्भव: स्व:

(३) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री के पूर्व में जो तीन व्याहृतियाँ हैं, वे भी सहेतुक हैं। भू पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है। भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है। स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है। इस त्रिक के अन्य अनेक प्रतीक ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराणों में कहे गए हैं, किन्तु यदि त्रिक के विस्तार में व्याप्त निखिल विश्व को वाक के अक्षरों के संक्षिप्त संकेत में समझना चाहें तो उसके लिए ही यह ॐ संक्षिप्त संकेत गायत्री के आरम्भ में रखा गया है। अ, उ, म इन तीनों मात्राओं से ॐ का स्वरूप बना है। अ अग्नि, उ वायु और म आदित्य का प्रतीक है। यह विश्व प्रजापति की वाक है। वाक का अनन्त विस्तार है किंतु यदि उसका एक संक्षिप्त नमूना लेकर सारे विश्व का स्वरूप बताना चाहें तो अ, उ, म या ॐ कहने से उस त्रिक का परिचय प्राप्त होगा जिसका स्फुट प्रतीक त्रिपदा गायत्री है।


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