सचेतन :90 श्री शिव पुराण- अर्धनारीश्वर का अर्थ 

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अर्धनारीश्वर का अर्थ – सृष्टि के निर्माण के लिए, शिव ने अपनी शक्ति को स्वयं से अलग किया। शिव स्वयं पुरूष लिंग के द्योतक हैं तथा उनकी शक्ति स्त्री लिंग की द्योतक हैं | पुरुष (शिव) एवं स्त्री (शक्ति) का एक होने के कारण शिव नर भी हैं और नारी भी, अतः वे अर्धनारीश्वर कहलाए जाते हैं।

कहते हैं की जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि को बनाने का कार्य आरंभ किया तब उन्होंने पाया कि उनकी रचनाएँ अपने एक निश्चित समय तक जीवन जीने के बाद स्वयं नष्ट हो जाएंगी तथा हर बार उन्हें नए सिरे से फिर से सृष्टि का निर्माण करना पड़ेगा|

उस समय तक सृष्टि में स्त्री का निर्माण नहीं हुआ था, ब्रह्मा नारी को प्रकट करने में असमर्थ थे, इसलिए जब वे इस विषय में काफी सोच विचार करने के बाद भी किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाए। तब अपनी समस्या के समाधान के लिए वे शिव की शरण में पहुँचे। उन्होंने शिव को प्रसन्न करने हेतु कठोर तप किया। ब्रह्माजी के कठोर तप से शिव प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी की समस्या के सामाधान हेतु शिव अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए। आधे भाग में वे शिव थे तथा आधे में शक्ति|

प्रकृति की रचना में प्रत्येक पुरुष के भीतर स्त्री और प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की सत्ता है। ऋग्वेद में इस तथ्य की स्पष्ट स्वीकृति पाई जाती है, जैसा अस्यवामीय सूक्त में कहा है—जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं; जिसके आँख हैं वह इस रहस्य को देखता है; अंधा इसे नहीं समझता। (स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध:। – ऋग्वेद, ३। १६४। १६)।

इस सत्य को अर्वाचीन मनोविज्ञान शास्त्री भी पूरी तरह स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि प्रत्येक पुरुष के मन में एक आदर्श सुंदरी स्त्री बसती है जिसे “अनिमा’ कहते हैं और प्रत्येक स्त्री के मन में एक आदर्श तरुण का निवास होता है जिसे “अनिमस’ कहते हैं। 

वस्तुत: न केवल भावात्मक जगत्‌ में किंतु प्राणात्मक और भौतिक स्थिति  में भी स्त्री और पुरुष की यह अन्योन्य प्रतिमा विद्यमान रहती है, ऐसा प्रकृति की रचना का विधान है। 

कायिक, प्राणिक और मानसिक, तीन ही व्यक्तित्व के परस्पर संयुक्त धरातल हैं और इन तीनों में काम का आकर्षण समस्त रागों और वासनाओं के प्रबल रूप में अपना अस्तित्व रखता है। अर्वाचीन शरीरशास्त्री इसकी व्याख्या यों करते हैं कि पुरुष में स्त्रीलिंगी हार्मोन (Female sex hormones) और स्त्री में पुरुषलिंगी हार्मोंन (male sex hormones) होते हैं। भारतीय कल्पना के अनुसार यही अर्धनारीश्वर है, अर्थात प्रत्येक प्राणी में पुरुष और स्त्री के दोनों अर्ध-अर्ध भाव में सम्मिलित रूप से विद्यमान हैं और शरीर का एक भी कोष ऐसा नहीं जो इस योषा-वृषा-भाव से शून्य हो।

मनुष्य कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित ९ भेदों से कर्म करता है।

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